BMC Mayor Race: एकनाथ शिंदे की खींचतान में फंसी मुंबई मेयर की कुर्सी, इसके पीछे उद्धव ठाकरे तो नहीं?

बीएमसी चुनाव नतीजों के बाद मुंबई की राजनीति में असली लड़ाई अब मेयर पद को लेकर शुरू हो गई है. भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन बहुमत का अंतर कम होने के कारण सियासी उठापटक तेज हो गई है. डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे को अपनी शिवसेना में टूट का डर सता रहा है, यही वजह है कि उन्होंने अपने 29 पार्षदों को बांद्रा के फाइव-स्टार होटल में शिफ्ट कर दिया है.;

( Image Source:  ANI )
Edited By :  नवनीत कुमार
Updated On : 18 Jan 2026 10:27 AM IST

बीएमसी चुनाव के नतीजे आ चुके हैं, लेकिन मुंबई की राजनीति अब असली मोड़ पर पहुंची है. सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी भाजपा के बावजूद मेयर पद को लेकर तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है. सत्ता का गणित कागज़ पर भले स्पष्ट दिखे, लेकिन मुंबई की सियासत में आख़िरी बाज़ी हमेशा विश्वास और टूट-फूट पर निर्भर करती है. यही वजह है कि नतीजों के बाद भी राजनीतिक हलचल तेज होती जा रही है.

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने साफ कर दिया है कि मेयर का फैसला एकनाथ शिंदे की शिवसेना से बातचीत के बाद ही होगा. यह बयान जहां गठबंधन धर्म निभाने का संकेत देता है, वहीं शिंदे खेमे की चिंता भी उजागर करता है. उद्धव ठाकरे के हालिया बयान के बाद शिवसेना (शिंदे गुट) में असहजता बढ़ गई है. हालात इतने संवेदनशील हो गए कि शिंदे को अपने ही पार्षदों को होटल में सुरक्षित रखने का फैसला लेना पड़ा.

क्यों शिंदे को डर सता रहा है?

डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे को सबसे बड़ा डर पार्टी में दोबारा टूट का है. बीएमसी नतीजों के बाद उन्होंने अपने 29 नवनिर्वाचित शिवसेना पार्षदों को बांद्रा के ताज लैंड्स एंड होटल में ठहरा दिया है. यह कदम इसलिए उठाया गया ताकि कोई भी आखिरी वक्त में पाला न बदल सके. महाराष्ट्र की राजनीति में “रिसॉर्ट पॉलिटिक्स” कोई नई बात नहीं, और शिंदे कोई जोखिम नहीं लेना चाहते.

उद्धव ठाकरे के बयान से बढ़ी बेचैनी

उद्धव ठाकरे ने साफ कहा है कि बीएमसी से सत्ता जाने के बावजूद उनका सपना मुंबई में शिवसेना (UBT) का मेयर देखने का है. उनके इस बयान ने शिंदे कैंप में खलबली मचा दी है. शिंदे जानते हैं कि उनके कई पार्षद पहले उद्धव ठाकरे के साथ ही राजनीति कर चुके हैं. ऐसे में भावनात्मक अपील और सत्ता का लालच किसी भी वक्त समीकरण बदल सकता है.

बीजेपी–शिंदे शिवसेना में खींचतान की आहट

सूत्रों के मुताबिक, शिंदे गुट की शिवसेना बीएमसी मेयर पद पर ढाई-ढाई साल के कार्यकाल की मांग कर रही है. उधर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते पूरा कार्यकाल अपने पास रखना चाहती है. यही वजह है कि दोनों सहयोगी दलों के बीच अंदरखाने खींचतान की खबरें सामने आ रही हैं. फडणवीस का बयान फिलहाल इस तनाव को संभालने की कोशिश माना जा रहा है.

बीएमसी का नंबर गेम: कहां टिकता है बहुमत?

बीएमसी में कुल 227 सदस्य हैं और बहुमत का आंकड़ा 114 है. भाजपा ने 89 सीटें जीती हैं, जबकि शिंदे गुट की शिवसेना के पास 29 सीटें हैं. अजित पवार की एनसीपी की 3 सीटें जोड़ दें तो महायुति 121 के आंकड़े पर पहुंच जाती है. यानी कागज़ पर भाजपा गठबंधन के पास स्पष्ट बहुमत है, लेकिन यह बढ़त सिर्फ 7 सीटों की है.

क्या पलट सकता है खेल?

विपक्षी खेमे में शिवसेना (UBT) के पास 65 सीटें हैं, मनसे की 6 और कांग्रेस की 24 सीटें. इसके अलावा AIMIM और अन्य दलों की सीटें मिलाकर आंकड़ा करीब 106 तक पहुंचता है. बहुमत से यह अभी भी 8 सीटें कम है. यानी शिंदे कैंप को तोड़े बिना विपक्ष के लिए मेयर बनाना लगभग नामुमकिन है.

शिंदे कैंप टूटा तो बदल सकती है तस्वीर

अगर शिंदे गुट के 15–20 पार्षद टूटते हैं, तो पूरा समीकरण पलट सकता है. यही वजह है कि शिंदे सबसे ज्यादा सतर्क हैं. बीएमसी पर पिछले 25 सालों तक अविभाजित शिवसेना का कब्जा रहा है, और शिंदे गुट उस विरासत पर अपना दावा छोड़ना नहीं चाहता. इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ने तनाव को और गहरा कर दिया है.

फिलहाल भाजपा का पलड़ा भारी, लेकिन सस्पेंस कायम

वर्तमान स्थिति में संख्याबल भाजपा के पक्ष में है और यही वजह है कि मेयर भाजपा का बनना सबसे संभावित विकल्प माना जा रहा है. हालांकि मुंबई की राजनीति में आख़िरी फैसला हमेशा नंबर और नीयत दोनों तय करते हैं. शिंदे की सतर्कता, उद्धव की रणनीति और भाजपा की मजबूती—इन तीनों के बीच मेयर की कुर्सी फिलहाल सस्पेंस में है. आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि बीएमसी में सत्ता का ताज किसके सिर सजेगा.

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