सरोज राज चौधरी: वो वन अधिकारी जिन्‍होंने बाघिन को बेटी बनाया, खैरी की परवरिश की वो कहानी जिसने भारत में बाघों को बचाया

सरोज राज चौधरी ने सिमलीपाल टाइगर रिज़र्व में मिली अनाथ बाघिन 'खैरी' को बेटी की तरह पाला। इसी रिश्ते ने जन्म दिया पगमार्क तकनीक को, जो प्रोजेक्ट टाइगर की नींव बनी.;

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By :  रूपाली राय
Updated On : 17 Feb 2026 9:20 AM IST

भारत के वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में कुछ कहानियां ऐसी हैं जो दिल को छू जाती हैं. ऐसी ही एक कहानी है सरोज राज चौधरी की, जो न सिर्फ बाघों के संरक्षण के लिए जाने गए, बल्कि एक अनाथ बाघिन को अपनी बेटी की तरह पाला. उनकी ये कहानी प्यार, समर्पण और विज्ञान का अनोखा मिश्रण है. 5 अक्टूबर 1974 का दिन था. ओडिशा के मयूरभंज जिले में स्थित सिमिलिपाल टाइगर रिज़र्व के पूर्वी घाट की तलहटी में खैरी नदी के किनारे कुछ खारिया आदिवासी शहद इकट्ठा कर रहे थे. अचानक उन्हें एक छोटा-सा बाघ का बच्चा मिला, जो लावारिस और कमजोर हालत में था. मां बाघिन कहीं नहीं दिख रही थी.

आदिवासियों ने दया करके उस बच्चे को टाइगर रिज़र्व के फ़ाउंडिंग रीजनल डायरेक्टर सरोज राज चौधरी के पास पहुंचाया. चौधरी ने बिना सोचे-समझे उस मादा बाघिन के बच्चे को गोद ले लिया और उसका नाम रखा खैरी, ठीक उसी नदी के नाम पर जहां से वो मिली थी. यहीं से शुरू हुआ एक सात साल लंबा अनोखा रिश्ता, जिसने पूरे देश और दुनिया भर के वाइल्डलाइफ लवर्स  का ध्यान खींच लिया. खैरी को जंगल में छोड़ने की बजाय चौधरी ने उसे अपने जशीपुर स्थित सरकारी बंगले में घर के सदस्य की तरह रखा. वहां वह स्वतंत्र घूमती-फिरती, उनके बिस्तर पर सोती, खेलती और परिवार का हिस्सा बन गई. चौधरी की पत्नी निहार नलिनी ने खैरी की मां की तरह देखभाल की.

एक जंगली जानवर से ज्यादा पालतू बाघिन 

खैरी उनके साथ बिस्तर पर सोती, निहार के साथ खेलती और घर के अन्य पालतू जानवरों जैसे नेवला, लकड़बग्घा, कुत्ता और यहां तक कि मगरमच्छ के साथ रहती. खैरी को मटन और दूध का पाउडर खिलाया जाता था. वह घर में खुलकर घूमती, कभी-कभी चौधरी के सीने पर पंजे रखकर सोती. चौधरी ने खैरी के व्यवहार को बहुत बारीकी से देखा और नोट किया. उन्होंने बाघों के फेरोमोन (गंध चिह्न), मैच के तरीके, क्षेत्रीय व्यवहार जैसे कई वैज्ञानिक पहलुओं का स्टडी की. खैरी उनके लिए सिर्फ पालतू नहीं, बल्कि एक लाइव रिसर्च टॉपिक भी थी. लेकिन चौधरी का नाम सिर्फ खैरी की वजह से ही मशहूर नहीं हुआ. उसने चौधरी को पगमार्क टेक्नोलॉजी का अविष्कार करने में मदद की. 

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कौन थे सरोज राज चौधरी?

13 अगस्त 1924 को ओडिशा के कटक के पास एक गांव में जन्मे सरोज राज चौधरी का बचपन जंगलों और वन्यजीवों के बीच बीता. 1930 के दशक में उनके गांव के आसपास बाघ घूमते थे. उन्होंने बाद में अपने रिसर्च पेपर में लिखा, 'वे अच्छे पुराने दिन थे, जब बाघ हमारे घर के पास रहते थे.' 1 अप्रैल 1949 को उन्होंने ओडिशा सरकार में वन अधिकारी के रूप में नौकरी शुरू की. मेहनत से तरक्की करते हुए 1966 में वे ओडिशा के पहले वाइल्डलाइफ रिज़र्व अधिकारी बने. 1960 के दशक में ही वे बाघ संरक्षण के क्षेत्र में बड़ा नाम बन चुके थे. उन्होंने कई आदमखोर बाघों को नियंत्रित किया, जिससे स्थानीय लोगों और बाघों दोनों की जान बची. 1968 में उन्होंने ओडिशा में एक व्यापक बाघ जनगणना कराई. फिर देहरादून के फारेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट (FRI) में सीनियर रिसर्च अफसर बने, जहां उन्होंने वाइल्डलाइफ मैनेजमेंट पर कई ऑफिसर को ट्रेन किया. यहीं उन्होंने पगमार्क (पदचिह्न) जनगणना तकनीक को विकसित किया. 1970 में उनकी ये तकनीक 'चीतल' मैगज़ीन में पब्लिश हुई. 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू होने पर वे टाइगर रिज़र्व के फाउंडिंग रीजनल डायरेक्टर बने. 

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कैसे किया पगमार्क तकनीक अविष्कार?

उस समय बाघों की संख्या गिनना मुश्किल था, क्योंकि बाघ छिपकर रहते हैं. चौधरी ने एक साधारण लेकिन प्रभावी तरीका ईजाद किया - टाइगर ट्रेसर. ये एक कांच की प्लेट थी, जिसे पगमार्क पर रखकर उसकी शेप ट्रेस की जाती, फिर ट्रांसपेरेंट पेपर पर कॉपी करके रखा जाता. इस तकनीक से 1972 में भारत की पहली अखिल भारतीय बाघ जनगणना हुई, जिसमें सिर्फ 1827-1840 बाघ बचे पाए गए. इसी के आधार पर प्रोजेक्ट टाइगर शुरू हुआ और 9 नेशनल पार्क की शुरुआत हुई (सिमिलिपाल सहित), जो आज 50+ हो चुके हैं. ये तकनीक 2004 तक भारत में बाघ जनगणना का आधार रही. बाद में कैमरा ट्रैप आई, लेकिन पगमार्क आज भी प्रभावी तरीका है. चौधरी ने कई अधिकारियों को ट्रेन किया, जैसे फतेह सिंह राठौर (रणथंबोर के हीरो), जिन्हें उन्होंने फील्डवर्क सिखाया. वे जोर देते थे कि सड़कें घुमावदार हों, जानवरों के पानी पहुंचने में रुकावट न आए और जंगल की प्राकृतिक बनावट न बिगड़े.

खैरी के साथ रिश्ता और दुखद अंत

खैरी के साथ चौधरी का रिश्ता बहुत गहरा था. वे उसे जंगल में छोड़ने की कोशिश करते, लेकिन वो वापस लौट आती. खैरी कभी गर्भवती नहीं हुई, शायद पालतू जीवन की वजह से. 1981 में खैरी सिर्फ 7 साल की थी जब एक आवारा पागल कुत्ते ने उसे काट लिया और रेबीज हो गया.  इलाज संभव नहीं रहा. चौधरी दिल्ली में थे, लौटते-लौटते बहुत देर हो चुकी थी. आखिरकार दर्दनाक इच्छामृत्यु देनी पड़ी. खैरी उनके लिए बेटी जैसी थी. उसकी मौत ने उन्हें तोड़ दिया. एक साल बाद, 4 मई 1982 को सरोज राज चौधरी का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. कुछ लोग कहते हैं कि खैरी के सदमे से वे कभी उबर नहीं पाए. 1983 में उन्हें मरणोपरांत पद्म श्री से सम्मानित किया गया. चौधरी ने एक किताब भी लिखी, 'खैरी: द बिलव्ड टाइग्रेस' उनकी विरासत आज भी जिंदा है- पगमार्क तकनीक, प्रोजेक्ट टाइगर की नींव और वो अनोखा प्यार जो इंसान और बाघ के बीच हो सकता है. वे साबित करते हैं कि प्रोटेक्शन सिर्फ नियम नहीं, बल्कि दिल से दिल का रिश्ता भी होता है. आज जब हम बाघों की बढ़ती संख्या देखते हैं, तो याद रखें इसके पीछे सरोज राज चौधरी जैसे समर्पित लोगों की मेहनत है, जिन्होंने जंगल को अपना घर और बाघिन को बेटी माना. 

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