'1920’ और ‘13B’ जैसी भूतिया फिल्मों का डर कहां खो गया? कैसे बॉलीवुड ने अपने ही हॉरर जॉनर की हत्या कर दी

बॉलीवुड में हॉरर फिल्में कभी दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देती थीं, लेकिन आज वे या तो हंसी उड़ाती हैं या OTT पर गुमनामी में खो जाती हैं. 'रात' और '13B' जैसे क्लासिक्स का डर अब गायब हो चुका है, क्योंकि जॉनर ने अपनी आत्मा खो दी है.

By :  हेमा पंत
Updated On : 11 March 2026 3:45 PM IST

कभी बॉलीवुड की हॉरर फिल्में दर्शकों को सच में डराने की ताकत रखती थीं. ‘रात’ में रेवती का भूतिया चेहरा हो या ‘13B’ की रहस्यमयी कहानी, इन फिल्मों ने बिना भारी-भरकम VFX के भी ऐसा माहौल बनाया कि दर्शक देर रात तक लाइट बंद करने से डर जाते थे. कम बजट, सीमित लोकेशन और दमदार बैकग्राउंड म्यूजिक के सहारे भी इन फिल्मों ने साबित किया था कि डर पैदा करने के लिए सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि मजबूत कहानी और सही ट्रीटमेंट जरूरी होता है.

लेकिन समय के साथ बॉलीवुड का हॉरर जॉनर धीरे-धीरे बदलता गया. असली डर की जगह हॉरर-कॉमेडी, ज्यादा VFX और मसालेदार फॉर्मूले ने ले ली. नतीजा यह हुआ कि जहां पहले भूत देखकर रोंगटे खड़े हो जाते थे, वहीं अब कई फिल्मों में डर की जगह हंसी ज्यादा आती है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वो सिहरन कहां खो गई, जिसने कभी हिंदी हॉरर फिल्मों को खास बनाया था?

जब बॉलीवुड में दिखा भूतों का डर

 1990 के दशक में निर्देशक राम गोपाल वर्मा ने अपनी फिल्म ‘रात’ (1992) के जरिए हॉरर सिनेमा को एक नया अंदाज दिया. यह फिल्म बड़े बजट या भारी-भरकम वीएफएक्स के बिना भी दर्शकों को डराने में कामयाब रही. कहानी में घर जैसे सामान्य और सुरक्षित माने जाने वाले माहौल को ही डरावना बना दिया गया था. फिल्म में एक्ट्रेस रेवती का भूत वाला किरदार इतना इम्पैक्टफुल था कि आज भी उसे हिंदी हॉरर फिल्मों के सबसे डरावने किरदारों में गिना जाता है.

जब बदला हॉरर सिनेमा का ट्रेंड

हिंदी हॉरर सिनेमा की बात करें तो रामसे ब्रदर्स का नाम भी आता है. 1970 और 1980 के दशक में उन्होंने ‘वीराना’ और ‘पुराना मंदिर’ जैसी फिल्मों के जरिए हॉरर का अलग ही ट्रेंड शुरू किया. इन फिल्मों में डर के साथ ग्लैमर और मसाला भी शामिल किया जाता था, जिसे अक्सर “स्लीज़ हॉरर” कहा गया. कम सोर्सिस के बावजूद इन फिल्मों ने दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचा और कई जगहों पर टिकटों की ब्लैक मार्केटिंग तक होने लगी. इन उदाहरणों से साफ है कि हिंदी सिनेमा में हॉरर फिल्मों ने हमेशा बड़े बजट पर नहीं, बल्कि दमदार कहानी, माहौल और निर्देशन के दम पर दर्शकों को डराने और बांधे रखने का काम किया है.

क्या आपने देखी है ‘13B’ फिल्म?

इसी तरह साल 2009 में आई फिल्म ‘13B’ ने भी कम बजट में जबरदस्त सस्पेंस और साइकोलॉजिकल हॉरर पेश किया. लगभग 12 करोड़ रुपये के बजट में बनी इस फिल्म की कहानी एक ऐसे परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे अपने घर के टीवी और आईने से जुड़ी रहस्यमयी घटनाओं का सामना करना पड़ता है. फिल्म ने ऑडियंस को डर के साथ-साथ गहरी मानसिक बेचैनी का एक्सपीरियंस कराया और बॉक्स ऑफिस पर अच्छी सफलता भी हासिल कीय

मॉर्डन हॉरर फिल्मों ने किया बुरा हाल

अब इसी बीच निर्देशक विक्रम भट्ट एक बार फिर हॉरर जॉनर को बड़े पर्दे पर लाने की तैयारी कर रहे हैं. उनकी आने वाली फिल्म ‘हॉन्टेड 3D: घोस्ट्स ऑफ द पास्ट’ (2025) की घोषणा भी हो चुकी है. दिलचस्प बात यह है कि फिल्म का पहला पोस्टर AI की मदद से तैयार किया गया था, जिसने लोगों को पुराने दौर की हॉरर फिल्मों के उसी पारंपरिक और थोड़ा जेनेरिक लुक की याद दिला दी.

डरानवी फिल्में लेकिन कम सक्सेस

पिछले एक-डेढ़ दशक में हिंदी सिनेमा में शुद्ध हॉरर फिल्मों का नंबर काफी कम होता दिखाई दी है. 2014 से 2026 के बीच ऐसी बहुत कम फिल्में आईं जो सच में डर और रहस्य के दम पर दर्शकों को लुभा सके. इस दौर में ‘तुम्बाड़’ (2018), ‘परी’ (2018) और ‘बुलबुल’ (2020) जैसी कुछ ही फिल्मों का नाम लिया जाता है, जिन्होंने हॉरर को अलग अंदाज में पेश करने की कोशिश की. हालांकि इन फिल्मों को वह कमर्शिय सक्सेस नहीं मिल पाई, जिसकी उम्मीद की जा रही थी. उदाहरण के तौर पर ‘तुम्बाड़’ को आज एक शानदार हॉरर फिल्म माना जाता है, लेकिन रिलीज के समय इसे बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा सफलता नहीं मिली थी. बाद में जब इसे दोबारा सिनेमाघरों में रिलीज किया गया, तब जाकर इसे दर्शकों और समीक्षकों की बड़ी सराहना मिली. वहीं अनुष्का शर्मा की फिल्म ‘परी’ अपने अलग और डार्क हॉरर टोन के बावजूद बॉक्स ऑफिस पर बजट तक नहीं निकाल सकी. दूसरी ओर ‘बुलबुल’ ने अपने विजुअल स्टाइल और फोकलोर आधारित कहानी से लोगों का ध्यान जरूर खींचा, लेकिन यह फिल्म सिनेमाघरों की बजाय सीधे ओटीटी प्लेटफॉर्म Netflix पर रिलीज हुई.

हॉरर कॉमेडी की शुरुआत

हाल के सालों में हिंदी फिल्मों में हॉरर का फॉर्मेट काफी बदल गया है. पहले जहां फिल्मों का मकसद दर्शकों को डराना होता था, वहीं अब हॉरर अक्सर कॉमेडी के साथ मिलकर एक नए तरह का “हॉरर-कॉमेडी” जॉनर बन चुका है. 2018 में आई ‘स्त्री’ इसका एक सफल उदाहरण मानी जाती है, जहां डर और कॉमेडी का बैलेंस देखने को मिला था. फिल्म में रहस्य, लोककथा और हल्की-फुल्की कॉमेडी का ऐसा मिश्रण था जिसने दर्शकों को डराने के साथ मनोरंजन भी किया.

जब हॉरर कॉमेडी से निकाल दिया डर

लेकिन इसके बाद आई कई फिल्मों में यह बैलेंस धीरे-धीरे बिगड़ता नजर आया. ‘स्त्री 2’, ‘मुंज्या’ और ‘भेड़िया’ जैसी फिल्मों में डर का एलिमेंट काफी कम हो गया और कॉमेडी ने सारी जगह ले ली. इन फिल्मों में हॉरर का इस्तेमाल अक्सर सिर्फ कहानी को मजेदार बनाने के लिए किया गया, जिससे असली डर का असर कमजोर पड़ गया. इसी तरह ‘भूल भुलैया 2’ और ‘भूल भुलैया 3’ में भी पहले पार्ट की मनोवैज्ञानिक गहराई और सस्पेंस की जगह हल्की-फुल्की कॉमेडी और मनोरंजन पर ज्यादा जोर दिया गया. फिल्म इंडस्ट्री में इस बदलाव की शुरुआत कुछ हद तक उन निर्देशकों से जुड़ी मानी जाती है, जिन्होंने हॉरर को नए अंदाज में पेश करने की कोशिश की. राज एंड डीके जैसे फिल्ममेकरों ने अपनी फिल्मों और प्रोजेक्ट्स में हॉरर के साथ कॉमेडी का एक्सपेरीमेंट कर एक अलग ट्रेंड शुरू किया. हालांकि बाद में कई फिल्मों ने इसी फॉर्मूले को कॉपी करने की कोशिश की, लेकिन मजबूत कहानी और माहौल की कमी के कारण जॉनर की क्वालिटी खराब होने लगी..

क्यों अब भूतिया पिक्चर डराती नहीं है?

पहले के दौर की हॉरर फिल्मों में डर पैदा करने के लिए तकनीक से ज्यादा माहौल, एक्टिंग और कैमरा वर्क पर भरोसा किया जाता था. सीमित बजट होने के बावजूद फिल्में मेकअप, बैकग्राउंड म्यूजिक और लाइटिंग के जरिए ऐसा माहौल बना देती थीं कि दर्शक सच में सिहर उठते थे. उदाहरण के तौर पर ‘भूत’ (2003) और ‘वास्तु शास्त्र’ (2004) जैसी फिल्मों को देखा जा सकता है. लगभग 5 करोड़ रुपये के बजट में बनी ‘वास्तु शास्त्र’ ने बिना बड़े विजुअल इफेक्ट्स के भी डर दिखाया. वहीं ‘रात’ में रेवती का भूतिया रूप सिर्फ मेकअप, एक्सप्रेशन और कैमरे के इस्तेमाल से इतना असरदार बना कि वह आज भी याद किया जाता है. इसके उल्ट आज की कई हॉरर फिल्मों में CGI और VFX पर जरूरत से ज्यादा डिपेंडेंसी देखने को मिलती है. कई बार ये इफेक्ट्स इतने आर्टिफिशियल लगते हैं कि डर की जगह भूत कार्टून जैसे नजर आने लगते हैं. उदाहरण के तौर पर ‘मां’ (2022) में काजोल के भूत वाले सीन को लेकर दर्शकों ने यही कहा कि भारी VFX के बावजूद उसमें वह असली खौफ नहीं दिखा, जो पुराने दौर की फिल्मों में नजर आता था. इसी तरह ‘छोरी 2’ (2023) में भी विजुअल इफेक्ट्स पर ज्यादा जोर देने के कारण पहली फिल्म ‘छोरी’ का सादा लेकिन प्रभावशाली डर कमजोर पड़ता महसूस हुआ. दिलचस्प बात यह है कि जहां हिंदी सिनेमा में हॉरर अक्सर तकनीकी चमक-दमक पर निर्भर होता जा रहा है, वहीं कुछ रिजनल फिल्म इंडस्ट्रीज अब भी एनवायरमेंट और कहानी के जरिए डर पैदा करने पर जोर देती हैं. मलयालम सिनेमा की ‘भूतकालम’ और ‘ब्रह्म युगम’ जैसी फिल्मों को इसके अच्छे उदाहरण के रूप में देखा जाता है. इन फिल्मों में डर पैदा करने के लिए बड़े VFX या गिमिक्स का सहारा नहीं लिया गया, बल्कि साउंड, लोकेशन और माहौल के जरिए दर्शकों के मन में बेचैनी और डर का एहसास कराया गया. इससे साफ होता है कि हॉरर फिल्मों में सिर्फ तकनीक ही सब कुछ नहीं होती. कई बार सही माहौल, कहानी और प्रेजेंटेशन ही दर्शकों को सबसे ज्यादा डराने में कामयाब होती है.

अनएक्सप्लोर्ड सब-जॉनर्स

हिंदी सिनेमा में हॉरर जॉनर की एक बड़ी कमी यह भी रही है कि इसे अलग-अलग सब-जॉनर में ज्यादा एक्सप्लोर नहीं किया गया. ‘13B’ जैसी फिल्म के बाद भी साइकोलॉजिकल हॉरर पर बहुत कम काम हुआ. बाद के सालों में कुछ इंडिपेंडेंट फिल्मों ने जरूर इस दिशा में कोशिश की, जैसे ‘वेलकम होम’, लेकिन यह मुख्यधारा के बड़े प्रोजेक्ट्स का हिस्सा नहीं बन पाईं. इसी तरह क्रिएचर हॉरर यानी राक्षस या अजीब जीवों पर आधारित फिल्मों में भी बॉलीवुड का प्रयोग सीमित रहा. ‘क्रिएचर 3D’ और ‘हिस्स’ जैसी फिल्मों ने इस जॉनर को छूने की कोशिश की, लेकिन कमजोर कहानी और तकनीकी खामियों की वजह से वे बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हो सकीं. अगर पुराने दौर को देखें तो ‘जुनून’ (1992) जैसी फिल्मों में असली जानवरों के फुटेज का इस्तेमाल किया गया था, जिससे कहानी में एक वास्तविकता का एहसास मिलता था. लेकिन आज जब कई फिल्मों में VFX पर ज्यादा भरोसा किया जाता है, तो कई बार वही प्रभाव नहीं बन पाता और सीन आर्टिफिशियल लगने लगते हैं. वहीं गोर हॉरर-यानी खून-खराबे और ज्यादा डरावने वाली फिल्मों का एक्सपेरिमेंट हिंदी सिनेमा में लगभग नहीं के बराबर रहा. इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा कोशिश रामसे ब्रदर्स ने की थी, लेकिन बाद के समय में जो कम बजट की हॉरर फिल्में आईं, जैसे ‘अमावस’ या ‘ककूड़ा’, वे दर्शकों को प्रभावित करने में असफल रहीं.

विजनरी डायरेक्टर्स की कमी

हिंदी हॉरर सिनेमा की गिरती हालत का एक बड़ा कारण यह भी माना जाता है कि इस जॉनर से जुड़े डेडिकेटेड फिल्ममेकर अब पहले की तरह एक्टिव नहीं रहे. एक समय था जब रामसे ब्रदर्स, राम गोपाल वर्मा (RGV) और विक्रम भट्ट जैसे नाम लगातार हॉरर फिल्में बना रहे थे और इस जॉनर को पहचान दे रहे थे. उनकी फिल्मों में डर, रहस्य और सस्पेंस को खास इंपोर्टेंस दिया जाता था. लेकिन समय के साथ ऐसे डायरेक्टर्स की संख्या कम होती चली गई, जिससे हॉरर का मेनस्ट्रीम में डेवलेपमेंट भी रुक गया. हालांकि नई पीढ़ी के कुछ हैं, जो इस जॉनर में प्रयोग करने की कोशिश कर रहे हैं. उदाहरण के तौर पर अविता दत्त की फिल्म ‘बुलबुल’ और स्मिता सिंह का प्रोजेक्ट ‘खौफ’ अलग तरह की हॉरर कहानियां लेकर आए. इन प्रोजेक्ट्स में माहौल और लोककथाओं के जरिए डर पैदा करने की कोशिश की गई. लेकिन समस्या यह है कि ऐसी फिल्मों को बड़े लेवल पर वह प्लेटफॉर्म या थिएटर रिलीज नहीं मिल पाती, जो दूसरी फिल्मों को मिलती है. एंथोलॉजी फिल्म ‘घोस्ट स्टोरीज’ में राज एंड डीके जैसे फिल्ममेकरों ने यह दिखाया था कि अगर सही तरीके से बनाया जाए तो हॉरर आज भी दर्शकों को आकर्षित कर सकता है. लेकिन बाद में उन्होंने भी हॉरर से ज्यादा कॉमेडी और थ्रिलर की दिशा में काम करना शुरू कर दिया. इसी बीच आने वाले समय में ‘भूत बंगला’ और ‘हॉन्टेड 3D’ जैसी फिल्मों की चर्चा जरूर है, लेकिन मौजूदा ट्रेंड्स को देखते हुए उनसे बड़े बदलाव की उम्मीद कम ही जताई जा रही है. आज की कंडीशन यह है कि हॉरर-कॉमेडी का चलन तेजी से बढ़ रहा है, जबकि प्योर हॉरर अभी भी एक सीमित दर्शकों वाला जॉनर बना हुआ है. दिलचस्प बात यह भी है कि भारतीय दर्शक हॉलीवुड की हॉरर फिल्मों को काफी पसंद करते हैं और वे यहां अच्छी कमाई भी करती हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि जब विदेशी हॉरर फिल्में भारत में चल सकती हैं, तो हिंदी फिल्मों को वही सफलता क्यों नहीं मिलती. शायद इसका जवाब बेहतर कहानी, मजबूत विजन और जॉनर को गंभीरता से लेने में छिपा है. अगर फिल्म इंडस्ट्री इस दिशा में बदलाव लाती है, तो संभव है कि फ्यूचर में हिंदी हॉरर सिनेमा एक बार फिर नई एनर्जी के साथ लौटे.

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