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Explainer: क्या फिर बंट रही है दुनिया? यूक्रेन, ईरान और ताइवान से समझें 'Yalta 2.0' की कहानी

यूक्रेन युद्ध, ताइवान संकट और ईरान तनाव के बीच क्या दुनिया फिर महाशक्तियों के प्रभाव क्षेत्रों में बंट रही है? Yalta 2.0 की पूरी कहानी और वैश्विक असर समझें.

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द्वितीय विश्व युद्ध खत्म हुए 81 साल होने वाले हैं. लेकिन दुनिया फिर उसी मोड़ पर लौट रही है, जहां ताकतवर देश तय करते थे कि किस इलाके में किसका दबदबा होगा? यूक्रेन में रूस की जंग, ताइवान के आसपास चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियां, अमेरिका के नए रक्षा गठबंधन और वेस्ट एशिया में बदलते पॉवर बैलेंस एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहे हैं. क्या नियमों पर आधारित विश्व व्यवस्था कमजोर पड़ रही है और उसकी जगह फिर "जिसकी ताकत, उसका प्रभाव" वाला दौर लौट रहा है?

इसी बदलते भू-राजनीतिक (जियो पॉलिटिक्स) को स्ट्रेटजिक एक्सपर्ट 'Yalta 2.0' का नाम दे रहे हैं. आखिर 1945 के Yalta 1.0 से इसका क्या संबंध है और यह दुनिया के भविष्य के लिए कितना बड़ा संकेत है?

क्या दुनिया फिर से बंटने की राह पर है?

1945 में द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद दुनिया की नई व्यवस्था तय हुई थी. उस व्यवस्था की नींव क्रीमिया के याल्टा शहर में हुए ऐतिहासिक सम्मेलन में रखी गई, जहां अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ (रूस) के नेताओं ने युद्ध के बाद की वैश्विक शक्ति-संतुलन की रूपरेखा तैयार की. जिसके बाद चार दशक से ज्यादा समय तक पूरी दुनिया दो बड़े शक्ति गुटों में बंटी रही. शीत युद्ध (Cold War) उसी व्यवस्था का नतीजा था.

आज रूस-यूक्रेन युद्ध, ताइवान को लेकर चीन और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव, पश्चिम एशिया में ईरान-इजरायल संघर्ष, नाटो का विस्तार और इंडो-पैसिफिक में तेज होती स्ट्रेटजिक प्रतिस्पर्धा ने फिर वही सवाल खड़ा कर दिया है. क्या दुनिया एक बार फिर प्रभाव क्षेत्रों (Spheres of Influence) में बंट रही है? इन्हीं परिस्थितियों के लिए अंतरराष्ट्रीय मामलों के एक्सपर्ट Yalta 2.0 का इस्तेमाल कर रहे हैं.

Yalta 1.0 क्या था?

फरवरी 1945 में क्रीमिया के याल्टा शहर में अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट, ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल और सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन की ऐतिहासिक बैठक हुई. उस समय नाजी जर्मनी की हार लगभग तय थी, इसलिए चर्चा का मुख्य विषय युद्ध के बाद दुनिया की नई राजनीतिक और सुरक्षा व्यवस्था तय करना था. सम्मेलन में जर्मनी को चार कब्जे वाले क्षेत्रों में बांटने, बर्लिन के विभाजन, संयुक्त राष्ट्र की स्थापना, पोलैंड समेत पूर्वी यूरोप की नई राजनीतिक व्यवस्था और जापान के खिलाफ सोवियत संघ की सैन्य भागीदारी जैसे अहम फैसले हुए. इन निर्णयों ने आने वाले दशकों की वैश्विक राजनीति की दिशा तय कर दी.

Yalta 1.0 के बाद दुनिया कैसे बदल गई?

याल्टा सम्मेलन के बाद दुनिया दो पॉवर ब्लॉक में बंट गई. पश्चिमी यूरोप, जापान, कनाडा और बाद में नाटो के सदस्य देश अमेरिका के प्रभाव क्षेत्र में आ गए. जबकि पोलैंड, हंगरी, रोमानिया, बुल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया और पूर्वी जर्मनी सोवियत संघ के प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा बन गए. इस विभाजन ने लगभग 45 वर्षों तक चले शीत युद्ध, हथियारों की दौड़, वैचारिक संघर्ष और अनेक प्रॉक्सी युद्धों की नींव रखी.

जियो पॉलिटिक्स में 'प्रभाव क्षेत्र' क्या?

इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में 'प्रभाव क्षेत्र' का मतलब किसी देश पर प्रत्यक्ष कब्जा करना नहीं होता, बल्कि किसी महाशक्ति द्वारा किसी क्षेत्र की सुरक्षा, विदेश नीति, सैन्य व्यवस्था और आर्थिक फैसलों पर प्रभाव थोपना होता है. ऐसे देशों को अक्सर अपनी रणनीतिक नीतियां, उस गुट की बड़ी शक्ति के हितों के अनुरूप बनानी पड़ती हैं. शीत युद्ध के दौरान पूर्वी यूरोप सोवियत संघ का प्रभाव क्षेत्र था, जबकि पश्चिमी यूरोप अमेरिकी सुरक्षा छाते के तहत था. आज भी कई विशेषज्ञ मानते हैं कि महाशक्तियां इसी मॉडल को नए रूप में लागू करने की कोशिश कर रही हैं.

Yalta 2.0 की चर्चा क्यों?

पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक राजनीति में कई ऐसे घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने प्रभाव क्षेत्रों की अवधारणा को फिर चर्चा में ला दिया है. रूस लगातार कहता रहा है कि यूक्रेन का नाटो में शामिल होना, उसकी सुरक्षा के लिए खतरा है. चीन ताइवान को अपना हिस्सा बताते हुए वहां सैन्य दबाव बढ़ा रहा है. अमेरिका इंडो-पैसिफिक में जापान, ऑस्ट्रेलिया, फिलीपींस और दक्षिण कोरिया के साथ अपने रक्षा गठबंधनों को मजबूत कर रहा है.

पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल, अमेरिका और खाड़ी देशों के बीच नए शक्ति समीकरण बन रहे हैं. इन सभी घटनाओं को जोड़कर देखा जाए तो यह संकेत मिलता है कि महाशक्तियां अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों को सुरक्षित करने की कोशिश कर रही हैं.

यूक्रेन युद्ध: रूस का सुरक्षा क्षेत्र या विस्तारवाद?

रूस लंबे समय से दावा करता रहा है कि नाटो का पूर्व की ओर विस्तार उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है. मॉस्को का मानना है कि यूक्रेन यदि नाटो का सदस्य बन जाता है, तो पश्चिमी सैन्य ताकतें सीधे रूस की सीमाओं तक पहुंच जाएंगी. इसी तर्क के आधार पर रूस ने 2022 में यूक्रेन पर हमला किया. पश्चिमी देशों ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन और विस्तारवादी नीति बताया, जबकि रूस इसे अपने पारंपरिक सुरक्षा क्षेत्र की रक्षा का कदम बताता है. यही विवाद आज Yalta 2.0 की बहस का सबसे बड़ा उदाहरण है.

ताइवान: चीन का किस तरह बढ़ा रहा प्रभाव?

चीन, ताइवान को एक स्वतंत्र देश नहीं बल्कि अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है. पिछले कुछ वर्षों में चीन ने ताइवान के आसपास बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास किए हैं. लड़ाकू विमानों और नौसैनिक जहाजों की गतिविधियां बढ़ाई हैं तथा ताइवान पर दबाव बनाने के लिए मिसाइल परीक्षण भी किए हैं. दूसरी ओर अमेरिका ताइवान को हथियार उपलब्ध करा रहा है और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी लगातार बढ़ा रहा है. यह टकराव केवल ताइवान तक सीमित नहीं है, बल्कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में प्रभाव और प्रभुत्व की लड़ाई का प्रतीक बन चुका है.

ईरान और वेस्ट एशिया: नया शक्ति संतुलन कैसे?

वेस्ट एशिया में अब केवल तेल और ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय प्रभाव की नई प्रतिस्पर्धा भी चल रही है. ईरान अपने सहयोगी संगठनों और क्षेत्रीय साझेदारों के माध्यम से अपना प्रभाव बढ़ा रहा है. जबकि अमेरिका इजरायल, खाड़ी देशों और अपने सैन्य ठिकानों के जरिए अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है. रूस और तुर्किये भी इस क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं.

पिछले कुछ वर्षों में ईरान-इजरायल तनाव और अमेरिकी सैन्य गतिविधियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिम एशिया भी महाशक्तियों की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है.

अमेरिका, रूस और चीन की स्ट्रेटजी में कॉमन क्या?

अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र को लेकर तीनों महाशक्तियों की रणनीति अलग-अलग दिखती है, लेकिन उनका मकसद अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों को सुरक्षित रखना है. अमेरिका अपने गठबंधनों (नाटो, क्वाड और AUKUS) को मजबूत कर रहा है. रूस अपने पड़ोसी देशों को पश्चिमी सैन्य गठबंधनों से दूर रखना चाहता है.

चीन ताइवान, दक्षिण चीन सागर और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के जरिए अपने आर्थिक और सामरिक प्रभाव का विस्तार कर रहा है. तीनों देशों की नीतियों में एक समान तत्व यह है कि वे अपने आसपास के क्षेत्रों में बाहरी शक्तियों का प्रभाव सीमित करना चाहते हैं.

ऐसे में Rules-Based Order का क्या होगा?

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था (Rules-Based Order) का आधार यह था कि सभी देश समान संप्रभु होंगे, अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान करेंगे और विवादों का समाधान संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थानों के माध्यम से करेंगे.

इसके उलट प्रभाव क्षेत्रों का कॉसेप्ट यह मानती है कि बड़ी शक्तियां अपने पड़ोसी क्षेत्रों में विशेष अधिकार और प्रभाव रखती हैं तथा छोटे देशों की रणनीतिक स्वतंत्रता सीमित हो सकती है. आज की सबसे बड़ी बहस यही है कि क्या दुनिया नियम-आधारित व्यवस्था से हटकर फिर से शक्ति-आधारित व्यवस्था की ओर लौट रही है.

Yalta 1.0 और Yalta 2.0 में अंतर क्या?

  • 1945 का याल्टा सम्मेलन एक औपचारिक समझौता था, जिसमें केवल तीन महाशक्तियों ने दुनिया के भविष्य की रूपरेखा तय की थी. आज ऐसी कोई औपचारिक बैठक नहीं हुई है और दुनिया भी केवल दो शक्ति गुटों में नहीं बंटी है.
  • अब भारत, यूरोपीय संघ, तुर्किये, सऊदी अरब और अन्य उभरती शक्तियां भी वैश्विक राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.
  • इसके अलावा आज प्रतिस्पर्धा केवल सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार तक फैल चुकी है.
  • इसलिए Yalta 2.0 एक वास्तविक समझौता नहीं बल्कि वर्तमान वैश्विक शक्ति-संतुलन को समझाने वाला विश्लेषणात्मक विचार है.

क्या दुनिया Yalta 2.0 की ओर बढ़ रही है?

इस सवाल का अभी किसी के पास दावे के साथ जवाब नहीं है. कई जियो पॉलिटिक्स के एक्सपर्ट मानते हैं कि रूस, चीन और अमेरिका की मौजूदा नीतियां प्रभाव क्षेत्रों की वापसी का संकेत देती हैं. वहीं अन्य विशेषज्ञों का तर्क है कि आज की दुनिया 1945 से कहीं अधिक जटिल और बहुध्रुवीय है, जहां संयुक्त राष्ट्र, वैश्विक व्यापार, क्षेत्रीय संगठन और मध्यम शक्तियां किसी एक देश को पूरी दुनिया बांटने की अनुमति नहीं देतीं.

बावजूद इसके इतना तय है कि वैश्विक राजनीति एक ऐसे दौर में है, जहां शक्ति संतुलन, सैन्य गठबंधन और रणनीतिक प्रभाव पहले की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं.

द्वितीय विश्व युद्ध कब से कब तक चला था?

द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत 1 सितंबर 1939 को हुई थी, जब नाजी जर्मनी ने पोलैंड पर हमला किया. इसके दो दिन बाद 3 सितंबर 1939 को ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी. इसके साथ ही यह संघर्ष यूरोप से निकलकर धीरे-धीरे वैश्विक युद्ध में बदल गया.

8 मई 1945 को यूरोप में युद्ध समाप्त हुआ था. इस दिन नाजी जर्मनी ने बिना शर्त आत्मसमर्पण किया. इसे Victory in Europe Day (VE Day) कहा जाता है. 2 सितंबर 1945 को विश्व स्तर पर द्वितीय विश्व युद्ध आधिकारिक रूप से समाप्त हुआ. इस दिन जापान ने अमेरिकी युद्धपोत USS Missouri पर आत्मसमर्पण के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए. इससे पैसिफिक ओशन में भी त्रयुद्ध भी खत्म हो गया. इसके बाद 1945 में याल्टा सम्मेलन एक हुआ था और दुनिया कैसे चलेगी, इसको लेकर भविष्य की रुपरेखा तैयार हुई थी.

ईरान इजरायल युद्धस्टेट मिरर स्पेशल
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