कहानी बैग्या नैनू पवार की, 15 साल पहले पुलिस कस्टडी में हुई थी मौत, अब 9 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद; 10 Point में समझें पूरा मामला
2011 में चोरी के शक में हिरासत में लिए गए बैग्या पवार की पुलिस कस्टडी में मौत हो गई थी. 15 साल लंबी सुनवाई, CID जांच और 47 गवाहों की गवाही के बाद अदालत ने 9 पुलिसकर्मियों को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई. आइए जानते हैं पूरा मामला...
करीब 15 साल पहले महाराष्ट्र के वाशिम जिले में एक ऐसी घटना हुई थी जिसने पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे. चोरी के शक में उठाए गए एक युवक की पुलिस कस्टडी में मौत हो गई. परिवार ने पुलिस पर बेरहमी से पीट-पीटकर हत्या करने का आरोप लगाया. लंबी कानूनी लड़ाई, सीआईडी जांच और 47 गवाहों की गवाही के बाद आखिरकार अदालत ने 9 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है. आइए जानते हैं पूरा मामला...
1. चोरी के शक में घर से उठा ले गई थी पुलिस
यह मामला महाराष्ट्र के वाशिम जिले के सेनगांव तहसील के वढोणा गांव का है. मृतक का नाम बैग्या नैनू पवार था, जो पारधी समुदाय से संबंध रखते थे. परिवार के अनुसार, 10 मई 2011 की तड़के करीब साढ़े तीन बजे रिसोड़ पुलिस की एक टीम अचानक उनके घर पहुंची. पुलिस ने बैग्या पवार और गांव के ही राजू शेषराव पवार को चोरी के संदेह में हिरासत में लिया. परिवार का कहना था कि बैग्या के खिलाफ उस समय कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं था, फिर भी बिना स्पष्ट कारण उन्हें उठा लिया गया.
2. थाने में हुई बेरहमी से पिटाई
दोनों युवकों को पूछताछ के लिए रिसोड़ पुलिस थाने ले जाया गया. आरोप है कि वहां दोनों के साथ जमकर मारपीट की गई. इस दौरान बैग्या पवार की हालत गंभीर हो गई और पुलिस हिरासत में ही उनकी मौत हो गई. वहीं दूसरे युवक राजू पवार गंभीर रूप से घायल हो गए, जिन्हें इलाज के लिए अस्पताल भेजा गया. बैग्या के शव का पोस्टमार्टम यवतमाल अस्पताल में कराया गया.
3. परिवार ने लगाया हत्या का आरोप
बैग्या पवार के परिवार ने आरोप लगाया कि पुलिस ने बिना किसी कानूनी आधार के उनके बेटे को हिरासत में लिया और थाने में उसकी बेरहमी से पिटाई कर हत्या कर दी. परिजनों ने रिसोड़ पुलिस के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई और निष्पक्ष जांच की मांग की.
4. CID को सौंपी गई जांच
मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच महाराष्ट्र सीआईडी को सौंप दी गई. तत्कालीन सीआईडी उपाधीक्षक अनवर शेख के नेतृत्व में जांच शुरू हुई. करीब 34 दिनों की जांच के बाद सीआईडी ने पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या, साक्ष्य मिटाने और अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया. इसके बाद अदालत में विस्तृत चार्जशीट दाखिल की गई.
5. 47 गवाहों की गवाही बनी सबसे बड़ा आधार
सुनवाई के दौरान अदालत में 47 गवाहों के बयान दर्ज किए गए. सरकारी पक्ष ने मेडिकल रिपोर्ट, गवाहों के बयान और सीआईडी जांच रिपोर्ट के आधार पर यह साबित करने की कोशिश की कि बैग्या की मौत सामान्य नहीं बल्कि पुलिस की मारपीट के कारण हुई थी.
6. 15 साल बाद अदालत का बड़ा फैसला
करीब डेढ़ दशक तक चले मुकदमे के बाद वाशिम के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय के न्यायाधीश जयसिंह झपाटे ने फैसला सुनाया. अदालत ने तत्कालीन रिसोड़ पुलिस थाने के 9 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराते हुए:
- हत्या (धारा 302) में आजीवन कारावास
- सबूत मिटाने के अपराध में 7 वर्ष की सजा
- अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत 5 वर्ष की अतिरिक्त सजा सुनाई.
7. किन पुलिसकर्मियों को हुई सजा?
अदालत ने जिन नौ पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया, उनमें तत्कालीन पुलिस निरीक्षक माधव धांडे, मदन पवार, रमेश पवार, हिरालाल ताराम, शिवाजी खिल्लारी, अशोक वैद्य, वसंत जाधव, नागोराव खांडके और पंजाब पाटकर शामिल हैं.
8. पिता ने सुनाई उस रात की दर्दनाक कहानी
फैसला आने के बाद बैग्या पवार के पिता नैनू पवार ने कहा कि उस रात उनका बेटा खेत से काम करके घर लौटा था. पूरा परिवार सो रहा था, तभी आधी रात के बाद पुलिस घर पहुंची और बैग्या को पीटते हुए अपने साथ ले गई. परिवार ने जब पूछा कि उसे क्यों ले जाया जा रहा है तो पुलिस ने सिर्फ इतना कहा कि पूछताछ करनी है. कुछ ही घंटों बाद परिवार को पता चला कि उनका बेटा पुलिस हिरासत में दम तोड़ चुका है.
9. सरकारी वकील ने क्या कहा?
सरकारी पक्ष के वकील श्रीराम काळू ने फैसले को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यह निर्णय इस बात का संदेश देता है कि कानून सबके लिए बराबर है. समाज के सबसे कमजोर वर्ग के लोगों को भी न्याय मिल सकता है और कोई भी कानून से ऊपर नहीं है.
10. क्यों अहम है यह फैसला?
यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पुलिस हिरासत में मौत के मामलों में दोष सिद्ध होना आसान नहीं होता. लगभग 15 साल तक चली सुनवाई, सीआईडी की विस्तृत जांच और दर्जनों गवाहों के आधार पर अदालत ने पुलिसकर्मियों को दोषी माना. इस फैसले को पुलिस जवाबदेही और हिरासत में मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है.




