Iran War: क्या बदल गया खेल, साथ देने से हिचक रहे सदस्य देश! अमेरिका के इशारे पर अब क्यों नहीं नाच रहा NATO?
मिडिल ईस्ट युद्ध में NATO की सीमित भूमिका ने अमेरिका की वैश्विक ताकत पर सवाल खड़े कर दिए हैं. ट्रंप की नीतियों और यूरोप की प्राथमिकताओं ने इस दूरी को और गहरा कर दिया है.
मिडिल ईस्ट जंग ने दुनिया की सबसे ताकतवर सैन्य गठबंधन NATO की भूमिका पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं. ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच यह साफ दिख रहा है कि अमेरिका को इस बार वैसा सामूहिक समर्थन नहीं मिल रहा, जैसा पहले के बड़े संघर्षों में मिला था. खासकर डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक विदेश नीति और America First दृष्टिकोण के बाद यूरोपीय देशों का रुख ज्यादा सतर्क और सीमित हो गया है. सवाल यह है कि क्या NATO की एकजुटता कमजोर पड़ रही है या फिर बदलती वैश्विक प्राथमिकताओं के बीच यह गठबंधन अब अपने हितों के हिसाब से फैसले ले रहा है? आखिर नाटो के सदस्य देश ट्रंप के इशारे पर इस वार में हां में हां क्यों नहीं मिला रहे? क्या 77 साल पुराना NATO अब पहले जैसा प्रभावी नहीं रहा?जानिए, पूरी कहानी का केंद्र क्या है?
1. NATO की सीमा और ‘Article 5’ का सच
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि NATO का मूल उद्देश्य यूरोप और उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र की रक्षा है. इसका सबसे ताकतवर प्रावधान Article 5 तभी लागू होता है जब किसी सदस्य देश पर हमला उसके निर्धारित क्षेत्र में हो. मिडिल ईस्ट इस दायरे में नहीं आता. इसलिए, भले ही Donald Trump या कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति चाहे, NATO देशों के लिए सैन्य रूप से शामिल होना “अनिवार्य” नहीं है.
2. यूरोप की प्राथमिकताएं: ‘रूस पहले, ईरान बाद में’
यूरोपीय देशों के लिए इस समय सबसे बड़ा खतरा Russia है. खासकर रूस यूक्रेन वार के बाद से.जर्मनी, फ्रांस और इटली जैसे देश पहले ही यूक्रेन को हथियार, पैसा और राजनीतिक समर्थन दे रहे हैं. ऐसे में ईयू में शामिल देश एक और बड़े युद्ध, वो भी मिडिल ईस्ट वार यानी ईरान अमेरिका और इजरायल युद्ध में कूदने से बचना चाहते हैं.
3. ट्रंप की ‘America First’ नीति का उल्टा असर
Donald Trump की America First नीति ने NATO के अंदर भरोसे को कमजोर किया. अपने पिछले कार्यकाल में उन्होंने कई बार यूरोपीय देशों को कम योगदान के लिए आलोचना की और यहां तक कि NATO की प्रासंगिकता पर भी सवाल उठाए. इसका असर यह हुआ कि आज जब अमेरिका समर्थन चाहता है, तो कई यूरोपीय देश शर्तों के साथ या सीमित सहयोग की नीति अपनाते हैं. यानी पूरी तरह से अमेरिका के साथ खड़े होने से हिचकते हैं.
4. ऊर्जा और अर्थव्यवस्था का दबाव
मिडिल ईस्ट में युद्ध का सीधा असर तेल और गैस की कीमतों पर पड़ता है. Iran के खिलाफ खुला युद्ध यूरोप के लिए ऊर्जा संकट को और गहरा कर सकता है. European Union पहले ही महंगाई, ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक सुस्ती से जूझ रहा है. ऐसे में युद्ध में कूदना ईयू के देशों के लिए जोखिम भरा हो सकता है.
5. इजरायल समर्थन पर भी मतभेद
हालांकि, NATO के कई देश Israel के समर्थक हैं, लेकिन कितना और कैसे समर्थन दिया जाए, इस पर सदस्य देशों में गहरे मतभेद हैं. कुछ देश मानवीय संकट और अंतरराष्ट्रीय कानून का हवाला देकर सीमित समर्थन की बात करते हैं. जबकि अमेरिका खुलकर इजरायल के साथ खड़ा दिखता है. यही अंतर NATO की एकजुटता को कमजोर करता है.
6. क्या सच में ‘अकेला’ है अमेरिका?
तकनीकी रूप से देखें तो United States पूरी तरह अकेला नहीं है. उसे ब्रिटेन जैसे करीबी सहयोगियों का समर्थन मिलता है. लेकिन पूर्ण NATO एक्शन जैसा कि अफगानिस्तान या 9/11 के बाद दिखा था, इस बार नहीं दिख रहा. यही वजह है कि यह स्थिति “अकेलेपन” जैसी है.
7. अब ट्रंप के पास क्या विकल्प?
अगर Donald Trump इस संकट में नेतृत्व कर रहे होते (या भविष्य में करते हैं), तो उनके पास कुछ रास्ते हैं, जिस पर वो अमल कर सकते हैं. इनमें पूरे NATO के बजाय उसके इच्छुक देशों के साथ मिलकर छोटा गठबंधन बनाना. Iran पर और कड़े प्रतिबंध लगाना. डिप्लोमैसी की राह पर चलकर बैक-चैनल से बातचीत के जरिए तनाव कम करना. बड़े युद्ध से बचते हुए सिर्फ टार्गेटेड स्ट्राइक करना.
8. NATO कमजोर नहीं, ‘सावधान’ है
इसके बावजूद यह कहना गलत होगा कि NATO “नाच नहीं रहा” या खत्म हो गया है. असल में NATO अब ज्यादा सलेक्टिव हो गया है. यूरोप अपने हित, अपनी सीमाएं और अपनी राजनीतिक मजबूरियों को ध्यान में रखकर फैसले लेने लगा है. मिडिल ईस्ट का यह संकट सिर्फ युद्ध नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन के बदलते समीकरण की कहानी भी है, जहां अमेरिका की अगुवाई को अब पहले जैसी बिना शर्त स्वीकार्यता नहीं मिल रही.




