कौन हैं अमेरिका का पहला मुस्लिम सीनेटर? जिसे ट्रंप ने कभी बताया था 'जिहादी', कर्नाटक से हैं ये कनेक्शन
अब्दुल अल-सैयद अमेरिका के पहले मुस्लिम सीनेटर बनकर इतिहास रच चुके हैं. ट्रंप ने उन्हें 'जिहादी' कहा था. जानिए उनकी शिक्षा, राजनीतिक सफर और कर्नाटक कनेक्शन.
अमेरिका के राजनीतिक इतिहास में 4 नवंबर 2026 की तारीख एक नई पहचान के साथ दर्ज हो गई है. मिशिगन में हुए सीनेट चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार अब्दुल अल-सैयद ने रिपब्लिकन प्रत्याशी माइक रोजर्स को शिकस्त देकर इतिहास रच दिया. इस जीत के साथ ही वह अमेरिकी सीनेट पहुंचने वाले पहले मुस्लिम बन गए हैं. खास बात यह है कि जिस चुनाव में उनकी उम्मीदवारी को लेकर लगातार सवाल उठाए गए, उसी चुनाव में जनता ने उन्हें अपना प्रतिनिधि चुन लिया.
42 वर्षीय अब्दुल अल-सैयद को 50 फीसदी से अधिक वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी माइक रोजर्स करीब 45 फीसदी मतों पर सिमट गए. यह सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रगतिशील धड़े के लिए भी बड़ी कामयाबी मानी जा रही है. उनकी जीत से मिशिगन की वह सीनेट सीट डेमोक्रेट्स के पास बनी रही, जो मौजूदा सीनेटर गैरी पीटर्स के रिटायर होने के बाद खाली हुई थी.
लेकिन अल-सैयद की इस जीत तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं रहा. चुनाव प्रचार के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें 'जिहादी' तक कह दिया था. रिपब्लिकन खेमे ने उन पर मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंध रखने और कट्टरपंथ का समर्थन करने जैसे आरोप लगाए. अल-सैयद ने इन आरोपों को खारिज किया. उनके समर्थकों ने भी इसे उनकी धार्मिक पहचान को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश बताया.
डॉक्टर से राजनेता बनने तक का सफर
अब्दुल अल-सैयद का जन्म 31 अक्टूबर 1984 को मिशिगन के रोचेस्टर हिल्स में हुआ था. उनके पिता मोहम्मद मिस्र से अमेरिका आए थे. जब अल-सैयद महज तीन साल के थे, तभी उनके माता-पिता का तलाक हो गया. इसके बाद उनका पालन-पोषण पिता और सौतेली मां जैकी ने किया. पढ़ाई में उनकी दिलचस्पी शुरू से रही. उन्होंने मिशिगन यूनिवर्सिटी से उच्च सम्मान के साथ ग्रेजुएशन किया.
इसके बाद कोलंबिया यूनिवर्सिटी से मेडिकल की पढ़ाई पूरी की और महामारी विज्ञान में विशेषज्ञता हासिल की. उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से दूसरी डॉक्टरेट डिग्री भी प्राप्त की. हालांकि, उनकी पहचान केवल एक डॉक्टर तक सीमित नहीं रही. उन्होंने महसूस किया कि लोगों की सेहत का सीधा संबंध सरकारी नीतियों और व्यवस्था से है. इसी सोच ने उन्हें सार्वजनिक सेवा की ओर मोड़ दिया.
डेट्रॉइट के स्वास्थ्य विभाग से मिली राष्ट्रीय पहचान
साल 2015 में अल-सैयद को डेट्रॉइट के स्वास्थ्य विभाग का कार्यकारी निदेशक नियुक्त किया गया. यह उनके करियर का अहम मोड़ साबित हुआ. डेट्रॉइट आर्थिक संकट से गुजर रहा था और स्वास्थ्य विभाग को दोबारा खड़ा करना बड़ी चुनौती थी. अल-सैयद ने विभाग के पुनर्गठन पर काम किया. इसके बाद वे वेन काउंटी के स्वास्थ्य, मानव एवं वेटरन्स सेवा विभाग के नेतृत्व से भी जुड़े. इस विभाग के जरिए करीब 18 लाख लोगों तक सेवाएं पहुंचती थीं.
उनके कार्यकाल में बच्चों को मुफ्त चश्मे उपलब्ध कराने, पर्यावरण प्रदूषण फैलाने वाली कंपनियों पर कार्रवाई और जीवनरक्षक दवा नारकन की उपलब्धता बढ़ाने जैसे कदम उठाए गए. इसके अलावा मेडिकल कर्ज से परेशान लोगों को राहत देने के लिए एक कार्यक्रम भी शुरू किया गया, जिसके जरिए करीब 3 लाख लोगों का 70 करोड़ डॉलर तक का मेडिकल कर्ज माफ होने का अनुमान था.
गवर्नर चुनाव में मिली हार, फिर सीनेट तक पहुंचे
सार्वजनिक सेवा में पहचान बनाने के बाद अल-सैयद ने राजनीति में कदम रखा. साल 2018 में उन्होंने मिशिगन के गवर्नर पद के लिए चुनाव लड़ा. हालांकि, डेमोक्रेटिक पार्टी के प्राइमरी चुनाव में वह ग्रेचेन व्हिटमर से हार गए. दोनों के बीच वोटों का अंतर 20 फीसदी से अधिक था. उस समय मिली हार के बावजूद उन्होंने राजनीति से दूरी नहीं बनाई. 2026 में उन्होंने अमेरिकी सीनेट के चुनाव में उतरने का फैसला किया.
डेमोक्रेटिक पार्टी के नामांकन के लिए उनका मुकाबला हेली स्टीवंस से हुआ. अल-सैयद ने मामूली अंतर से उन्हें हरा दिया. यही जीत आगे चलकर उनके लिए बड़ी राजनीतिक परीक्षा बन गई. हेली स्टीवंस ने प्राइमरी में हारने के बाद चुनाव के आखिरी दिनों में रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रोजर्स का समर्थन कर दिया. इससे डेमोक्रेटिक खेमे में भी असहज स्थिति पैदा हुई. इसके बावजूद अल-सैयद को बर्नी सैंडर्स, एलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज़ और पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा जैसे नेताओं का समर्थन मिला.
ट्रंप के हमलों के बीच अल-सैयद ने उठाए आम लोगों के मुद्दे
अल-सैयद के चुनाव प्रचार का सबसे बड़ा आधार आम अमेरिकी परिवारों की आर्थिक परेशानियां रहीं. उन्होंने महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं की महंगी लागत, कॉरपोरेट कंपनियों के राजनीतिक प्रभाव और अरबपतियों पर अधिक टैक्स लगाने जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी. उनका कहना था कि सरकार के पास आने वाला टैक्स जनता की जिंदगी बेहतर बनाने पर खर्च होना चाहिए. स्कूल, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार के अवसरों पर पैसा लगाने के बजाय विदेशों में सैन्य अभियानों के लिए अमेरिकी धन भेजने पर भी उन्होंने सवाल उठाए.
इजरायल को अमेरिकी सैन्य सहायता देने की नीति के वह आलोचक रहे हैं. गाजा में इजरायल की सैन्य कार्रवाई को उन्होंने जनसंहार बताया, हालांकि इजरायल इस आरोप को सिरे से खारिज करता है. उन्होंने वेस्ट बैंक में फिलिस्तीनियों के साथ इजरायल के व्यवहार को भी रंगभेद करार दिया. उनका यह रुख चुनाव में एक बड़ा विवाद बन गया. माइक रोजर्स ने यहूदी मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश की, जबकि अल-सैयद की इजरायल नीति को लेकर मिशिगन के यहूदी समुदाय के एक हिस्से में असहजता देखी गई.
मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंधों के आरोप, अल-सैयद ने किया इनकार
चुनाव के दौरान अल-सैयद को केवल उनकी नीतियों के कारण ही नहीं, बल्कि उनकी धार्मिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि को लेकर भी निशाना बनाया गया. रिपब्लिकन नेताओं ने उन पर मिस्र के संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंध होने का आरोप लगाया. इन आरोपों के समर्थन में उनके विरोधियों ने साल 2012 के एक खुले पत्र का हवाला दिया, जिस पर अल-सैयद के हस्ताक्षर थे. इस पत्र में तत्कालीन मिस्र के राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी से मीडिया और पुलिस के प्रति अपना रुख स्पष्ट करने की अपील की गई थी. हालांकि, अल-सैयद ने मुस्लिम ब्रदरहुड से किसी भी तरह का संबंध होने से इनकार किया.
वामपंथी टिप्पणीकार हसन पीकर से उनके संबंधों को लेकर भी विवाद हुआ. पीकर ने 9/11 हमलों को लेकर विवादित टिप्पणी की थी. इसके अलावा डेट्रॉइट के एक यहूदी प्रार्थना स्थल पर अरब अमेरिकी व्यक्ति के हिंसक हमले पर उनकी टिप्पणियों को लेकर भी अल-सैयद को मिशिगन के यहूदी समुदाय से माफी मांगनी पड़ी थी.
'मेरा नाम और धर्म नहीं, मेरी नीतियां देखिए'
लगातार हो रहे हमलों के बीच अल-सैयद ने मतदाताओं से अपील की कि वे उनकी धार्मिक पहचान के बजाय उनके काम और नीतियों के आधार पर फैसला करें. उन्होंने कहा था कि उनका नाम और धर्म इस बात की वजह नहीं है कि लोग पेट्रोल और किराने का सामान नहीं खरीद पा रहे हैं, डॉक्टर को नहीं दिखा पा रहे हैं या जिस हवा में सांस लेते हैं और जिस पानी को पीते हैं, उसकी गुणवत्ता को लेकर परेशान हैं.
उन्होंने यह भी कहा कि भले ही उनकी प्रार्थना करने का तरीका दूसरे अमेरिकियों से अलग हो, लेकिन उनकी उम्मीदें और जरूरतें वही हैं. चुनाव से ठीक पहले उन्होंने मिशिगन के लोगों को संबोधित करते हुए कहा था कि उनका ध्यान राज्य के उन लोगों पर है, जिनकी समस्याओं पर पर्याप्त चर्चा नहीं होती. अब चुनावी नतीजों ने उनके राजनीतिक सफर को एक नया मुकाम दे दिया है. डॉक्टर से सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारी और फिर अमेरिकी सीनेट तक पहुंचने वाले अब्दुल अल-सैयद की जीत ने अमेरिका की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है.




