Iran War ने हिलाई पूरी दुनिया! तेल, गैस, शेयर बाजार सब पर वार, क्या वैश्विक मंदी अब दूर नहीं?
ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच बढ़ते टकराव ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है. तेल और गैस की कीमतों में तेज उछाल, शेयर बाजार में गिरावट और महंगाई के खतरे ने चिंता बढ़ा दी है. हालात ऐसे बन रहे हैं कि अगर जंग लंबी चली, तो दुनिया एक बड़े आर्थिक संकट या मंदी की ओर बढ़ सकती है.
Iran War Impact on World Economy: अमेरिका और इज़राइल के जरिए ईरान पर किए गए हमलों और इसके जवाब में ईरान की खाड़ी क्षेत्र में की गई कार्रवाई ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला दिया है. इससे ऊर्जा बाजार, शेयर बाजार और वैश्विक व्यापार पर बड़ा असर पड़ा है. हालात ऐसे बन रहे हैं कि दुनिया एक बड़े आर्थिक संकट या मंदी की तरफ बढ़ सकती है.
इस जंग से पूरी दुनिया महंगाई की तरफ बढ़ रही है. तेल, गैस, सब्जियां और दूसरी चीजों की भारी किल्लत होने लगी है. आइये आसान भाषा में समझते हैं कि इजराइल-यूएस-ईरान वॉर से पूरी दुनिया पर क्या असर पड़ रहा है?
ऊर्जा कीमतों का क्या है हाल?
28 फरवरी से शुरू हुए हमलों के बाद ईरान ने इज़राइल, अमेरिकी सैन्य ठिकानों, तेल भंडार और खाड़ी क्षेत्र की कई अहम जगहों पर मिसाइल हमले किए. इसके साथ ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर हमलों की वजह से वहां से तेल और गैस की आवाजाही बहुत कम हो गई है. यह रास्ता दुनिया की करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस सप्लाई के लिए बेहद अहम है.
ईरान ने इराक के पानी में ईंधन टैंकरों को भी निशाना बनाया, जिससे हालात और खराब हो गए. इसका सीधा असर यह हुआ कि कच्चे तेल की कीमत तेजी से बढ़ गई. ब्रेंट क्रूड की कीमत 72 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 106 डॉलर प्रति बैरल हो गई, यानी 40 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी.
एलएनजी यानी तरलीकृत प्राकृतिक गैस की कीमतों में तो करीब 60 प्रतिशत तक उछाल आ गया. 2 मार्च को कतर की कंपनी ने ड्रोन हमले के बाद अपना उत्पादन रोक दिया था, जबकि कतर दुनिया की करीब 20 प्रतिशत एलएनजी सप्लाई करता है. पेट्रोल, डीजल और जेट ईंधन की कीमतें भी लगातार बढ़ रही हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से सप्लाई लंबे समय तक बाधित रही तो कीमतें और बढ़ सकती हैं. एशिया के देश जैसे चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया इस रास्ते पर सबसे ज्यादा निर्भर हैं, इसलिए उन पर असर ज्यादा दिख रहा है.
कितनी बढ़ सकती हैं तेल की कीमतें?
अगर युद्ध जल्दी खत्म हो जाता है तो तेल की कीमत साल के अंत तक 65 डॉलर प्रति बैरल तक गिर सकती है. लेकिन अगर युद्ध लंबा चलता है तो कीमतें 130 डॉलर या उससे भी ज्यादा पहुंच सकती हैं. कुछ अनुमान तो 150 डॉलर प्रति बैरल तक की बात कर रहे हैं.
उत्पादन और कामकाज पर क्या पड़ रहा है असर?
ऊर्जा की कीमत बढ़ने से उन देशों की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ रहा है जो ज्यादा तेल और गैस इस्तेमाल करते हैं. 85 से ज्यादा देशों में पेट्रोल की कीमत बढ़ चुकी है. कंबोडिया में पेट्रोल करीब 68 प्रतिशत महंगा हुआ है. वियतनाम में 50 प्रतिशत, नाइजीरिया में 35 प्रतिशत, लाओस में 33 प्रतिशत और कनाडा में 28 प्रतिशत तक कीमत बढ़ी है.
इसका असर आम जिंदगी पर भी दिख रहा है. कई देशों की सरकारों ने ईंधन बचाने के लिए कदम उठाए हैं. पाकिस्तान और फिलीपींस में सरकारी दफ्तरों के लिए चार दिन का कार्य सप्ताह लागू किया गया है. थाईलैंड में वर्क फ्रॉम होम अनिवार्य कर दिया गया है. म्यांमार में गाड़ियों को एक दिन छोड़कर चलाने का नियम बनाया गया है. श्रीलंका में पेट्रोल खरीदने के लिए रजिस्ट्रेशन और क्यूआर कोड सिस्टम लागू किया गया है.
शेयर बज़ार पर क्या पड़ रहा है असर?
युद्ध शुरू होने के बाद दुनिया भर के शेयर बाजारों में गिरावट देखी गई है. कुल मिलाकर वैश्विक शेयर बाजार करीब 5.5 प्रतिशत तक गिर चुके हैं. न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में 6 प्रतिशत गिरावट आई है, जबकि नैस्डैक में 2.4 प्रतिशत की गिरावट हुई है. जापान का निक्केई 225 करीब 11 प्रतिशत गिरा है. भारत का निफ्टी 50 करीब 7 प्रतिशत नीचे आया है. लंदन का एफटीएसई 100 करीब 5.3 प्रतिशत गिरा है और सऊदी अरब का बाजार करीब 9.6 प्रतिशत गिरा है.
विशेषज्ञों का कहना है कि एशियाई बाजारों पर ज्यादा असर इसलिए पड़ा क्योंकि वे ऊर्जा सप्लाई पर ज्यादा निर्भर हैं. वहीं रूस के शेयर बाजार में बढ़त देखी गई क्योंकि वह खाड़ी क्षेत्र के बाहर बड़ा तेल सप्लायर है.
महंगाई और मंदी का क्या हाल है?
अल-जज़ीरा की रिपोर्ट के मुताबिर, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रमुख क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने चेतावनी दी है कि अगर युद्ध लंबा चलता है तो इससे महंगाई बढ़ सकती है. इतिहास बताता है कि जब भी तेल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तो उसके बाद आर्थिक मंदी का खतरा बढ़ जाता है. 1973, 1978 और 2008 के उदाहरण बताते हैं कि तेल संकट के बाद दुनिया को आर्थिक झटके लगे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर महंगाई को काबू करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाई जाती हैं, तो कमजोर अर्थव्यवस्था वाले देशों पर कर्ज का संकट आ सकता है.
जीडीपी पर क्या है असर?
अगर युद्ध जल्दी खत्म हो जाता है तो वैश्विक जीडीपी पर असर सीमित रहेगा. लेकिन अगर यह कई महीनों तक चलता है तो यूरोप की आर्थिक वृद्धि दर 0.5 प्रतिशत तक गिर सकती है और चीन की वृद्धि 3 प्रतिशत से नीचे जा सकती है. अमेरिका की अर्थव्यवस्था 2026 में लगभग 2.25 प्रतिशत की दर से बढ़ सकती है. इसके साथ ही भारत की जीडीपी पर भी काफी असर पड़ सकता है.
यात्रा और हवाई सेवाओं पर क्या पड़ा असर?
इस युद्ध का असर हवाई यात्रा पर भी पड़ा है. ईंधन महंगा होने से एयरलाइंस के खर्च बढ़ गए हैं. जेट फ्यूल की कीमत 85-90 डॉलर से बढ़कर 150-200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है. इंडिगो, एयर इंडिया, कांतास, एयर न्यूजीलैंड जैसी एयरलाइंस ने टिकट कीमतें बढ़ा दी हैं. कई फ्लाइट्स को लंबा रास्ता लेना पड़ रहा है क्योंकि खाड़ी क्षेत्र का हवाई क्षेत्र बंद या सीमित है. इससे टिकट महंगे हो गए हैं और यात्रा का समय भी बढ़ गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि इसका असर पर्यटन उद्योग पर भी पड़ेगा और लोगों के खर्च पर दबाव बढ़ेगा.




