Begin typing your search...

'रहमान की जीत, मोदी की बधाई', क्या फिर से पटरी पर लौटेंगे भारत-बांग्लादेश रिश्ते?

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की आम चुनाव में जीत के बाद मोदी ने तारिक रहमान को दी बधाई. क्या इससे भारत-बांग्लादेश रिश्तों में आएगा रीसेट? जानिए इतिहास, तनाव और आगे की रणनीति.

रहमान की जीत, मोदी की बधाई, क्या फिर से पटरी पर लौटेंगे भारत-बांग्लादेश रिश्ते?
X
( Image Source:  X/@ANI )

बांग्लादेश के आम चुनावों में बीएनपी (BNP) की निर्णायक जीत के बाद नई दिल्ली ने जिस तरह प्रतिक्रिया दी, उसने दक्षिण एशिया की कूटनीति में एक संभावित ‘रीसेट’ की आहट दे दी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र ने सबसे पहले बंगाली में संदेश जारी कर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी नेता तारीक रहमान को जीत की बधाई दी और लोकतांत्रिक, प्रगतिशील व समावेशी पड़ोसी के लिए भारत के समर्थन का भरोसा जताया. इसके जवाब में बीएनपी ने भी सकारात्मक जवाब दिया और रिश्ते में सुधार के संकेत दिए. लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ कूटनीतिक शिष्टाचार था या भारत-बांग्लादेश रिश्तों में सचमुच एक ‘रीसेट’ की शुरुआत?

भारत का लहजा गर्मजोशी भरा जरूर था, लेकिन सावधानी से बुना हुआ भी. क्योंकि जुलाई 2024 में जेन Z के नेतृत्व वाली बगावत के बाद जब शेख हसीना भारत आ गईं और उनकी पार्टी अवामी लीग को चुनाव से बाहर रखा गया, तब से दोनों देशों के रिश्तों में खटास साफ दिखने लगी थी.

मोदी के संदेश में क्या संकेत छिपे हैं?

पीएम मोदी ने 'कई तरह के रिश्तों' को मजबूत करने की बात कही है. यह सिर्फ औपचारिक बधाई नहीं थी, बल्कि एक संकेत था कि दिल्ली नई सरकार के साथ काम करने को तैयार है, लेकिन यह भी साफ है कि भारत अपनी सुरक्षा ‘रेड लाइन’ कट्टरपंथ, सीमा पार आतंक और विद्रोही समूहों को समर्थन पर कोई समझौता नहीं करेगा.

क्यों बिगड़े थे रिश्ते?

जुलाई 2024 की राजनीतिक उथल-पुथल के बाद अविश्वास बढ़ा. बांग्लादेश में एक धारणा बनी कि दिल्ली ने शेख हसीना की सरकार को जरूरत से ज्यादा समर्थन दिया. यही वजह है कि पुरानी शिकायतें भी फिर उभर आईं. जैसे सीमा पर हत्याओं के आरोप, पानी बंटवारे के विवाद, व्यापारिक अवरोध, भड़काऊ और बयानबाजी व अन्य.

क्या निकला इसका नतीजा?

जेन जैड आंदोलन के बाद भारत और बांग्लादेश में खटास गहराने के बाद वीज सेवाएं लगभग ठप है. ट्रेन और बस सेवाएं निलंबित कर दी गई. ढाका और दिल्ली के उड़ानों में कमी आई है.

BNP के साथ भारत का इतिहास कैसा रहा है?

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी भारत के लिए नई नहीं है. साल 2001 में जब खालिदा जिया के नेतृत्व में BNP ने जमात-ए-इस्लामी के साथ सरकार बनाई, तो रिश्ते ठंडे पड़ गए. दो भारतीय ‘रेड लाइन’ तब परखी गईं थीं. उत्तर-पूर्वी विद्रोहियों को कथित समर्थन देने और हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का आरोप लगाया है. दरअसल, अप्रैल 2004 में चटगांव में 10 ट्रक हथियारों की बरामदगी हुई थी, जो कथित तौर पर भारतीय विद्रोहियों के लिए थे, ने भरोसे को गहरी चोट पहुंचाई.

उस समय दोनों देश के बीच आर्थिक रिश्ते भी लड़खड़ाए. टाटा ग्रुप का 3 बिलियन डॉलर का प्रस्तावित निवेश गैस मूल्य विवाद में अटक गया और 2008 में खत्म हो गया. 2014 में खालिदा जिया द्वारा तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात रद्द करना पड़ा. दिल्ली के लिए बड़ा संकेत था कि रिश्ते सहज नहीं हैं.

फिर भारत ने शेख हसीना में इतना निवेश क्यों किया?

अपने 15 साल के शासन में शेख हसीना ने भारत को वह दिया जो वह चाहता था. उत्तर-पूर्व में विद्रोहियों पर कार्रवाई, बेहतर कनेक्टिविटी, चीन की तुलना में भारत-समर्थक रुख और अन्य. लेकिन यही करीबी संबंध बांग्लादेश के भीतर राजनीतिक रूप से विवादास्पद बन गए.

क्या नई सरकार के साथ ‘रीसेट’ मुमकिन है?

मुमकिन है, लेकिन ऐसा होना आसान भी नहीं है. बीएनपी BNP राजनीतिक रूप से अनुभवी और अपेक्षाकृत नरमपंथी पार्टी है, लेकिन सवाल यह है कि रहमान घरेलू दबावों और भारत-विरोधी भावना को कैसे संभालेंगे? दिल्ली के रणनीतिक विशेषज्ञों का भी मानना है कि ‘पेंडुलम’ पहले एक तरफ बहुत दूर झूल गया था, अब दूसरी तरफ झूलने का खतरा है.

शेख हसीना की मौजूदगी क्या बाधा बनेगी?

खबरें हैं कि 2024 के बाद अवामी लीग के हजारों सदस्य भारत में हैं. अगर दिल्ली उन्हें सक्रिय राजनीतिक मंच देती है, तो ढाका में इसे दखल के तौर पर देखा जा सकता है. जब तक हसीना नेतृत्व में बदलाव या आत्ममंथन का संकेत नहीं देतीं, उनकी सक्रिय मौजूदगी रिश्तों को जटिल बना सकती है.

सुरक्षा और रक्षा सहयोग का क्या होगा?

तनाव के बावजूद सुरक्षा सहयोग जारी है. सालाना सैन्य अभ्यास, समन्वित नौसैनिक पेट्रोलिंग, वार्षिक रक्षा वार्ता और 500 मिलियन डॉलर की भारतीय रक्षा लाइन ऑफ क्रेडिट भी जारी है. विदेशी मामलों के जानकारों का कहना है कि बीएनपी इस सहयोग को वापस नहीं लेगी.

आर्थिक और भौगोलिक मजबूरी कितनी अहम है?

भारत बांग्लादेश के बीच 4,096 किलोमीटर लंबी साझा सीमा है. दोनों देशों के बीच गहरे सांस्कृतिक संबंध हैं. बांग्लादेश, दक्षिण एशिया में भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है. भारत, एशिया में बांग्लादेश का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है. दोनों देशों के लिए दूरी व्यावहारिक विकल्प नहीं है.

अहम सवाल : पहल कौन करेगा?

बड़े पड़ोसी होने के नाते भारत को पहल करनी चाहिए. आउटरीच, संवाद और व्यावहारिक सहयोग का यही रास्ता हो सकता है. रहमान ने संकेत दिए हैं कि वे अतीत को भविष्य का दुश्मन नहीं बनने देंगे. अब देखना यह है कि क्या बयानबाजी की जगह ठोस कूटनीति ले पाती है. रीसेट की कुंजी एक सवाल में सिमटी है कि क्या दिल्ली सावधानी छोड़ आत्मविश्वास से आगे बढ़ेगी और क्या ढाका घरेलू राजनीति से ऊपर उठकर स्थिर साझेदारी चुनेगा?

क्या भारत को हाथ बढ़ाने की जरूरत है?

क्या फिर से पटरी पर लौटेंगे भारत-बांग्लादेश रिश्ते, के सवाल पर विदेश मामलों के जानकार डॉ. ब्रह्मदीप अलूने का कहा, 'भारत को बांग्लादेश नीति रिव्यू करने की जरूरत है. न केवल बांग्लादेश बल्कि अन्य पड़ोसी देशों के साथ भी ऐसा करना जरूरी है. बांग्लादेश से आपको बहुत कुछ सिखने की जरूरत है. ऐसा इसलिए कि शेख हसीना का समर्थन, बांग्लादेश का समर्थन नहीं माना जा सकता. बड़ा भाई होने के नाते हमें जिम्मेदारी समझने की जरूरत है. इस मसले पर तारीक रहमान मजबूरी है. वहां की जनता ने शेख हसीना के खिलाफ वोट किया है. ऐसे में भारत को रास्ता निकाल शेख हसीना का प्रत्यर्पण करने की जरूरत है. ऐसा न होने पर भारत से संबंध खराब बने रहेंगे. या फिर ये हो सकता है कि शेख हसीना किसी यूरोपीय देशों में महफूज जगह पर चलें जाएं. शेख हसीना भारत-बांग्लादेश के संबंधों के बीच में बेसिक फैक्टर हैं. उसे नकार नहीं सकते. बाकी बातें तभी आगे बढ़ सकती है. संबंधों को ठीक करने के लिए भी भारत ही पहल करे तो अच्छा रहेगा.

वर्ल्‍ड न्‍यूजबांग्लादेशनरेंद्र मोदी
अगला लेख