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अगर दिसंबर में बांग्लादेश लौटती हैं शेख हसीना, तो क्या बदल जाएगा? 5 प्वाइंट में समझिए वहां का सियासी गणित

अगर दिसंबर में शेख हसीना बांग्लादेश लौटती हैं तो चुनावी राजनीति, अंतरिम सरकार, अवामी लीग, सेना और भारत-बांग्लादेश संबंधों में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं.

अगर दिसंबर में बांग्लादेश लौटती हैं शेख हसीना, तो क्या बदल जाएगा? 5 प्वाइंट में समझिए वहां का सियासी गणित
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क्या शेख हसीना की बांग्लादेश वापसी सिर्फ एक पूर्व प्रधानमंत्री की घर वापसी होगी, या फिर इससे पूरे देश की राजनीति का नया चैप्टर शुरू होगा? रॉयटर्स को दिए इंटरव्यू में हसीना ने दिसंबर के आसपास बांग्लादेश लौटकर अदालत के सामने आत्मसमर्पण करने की इच्छा जताई है. यह फैसला ऐसे समय सामने आया है, जब उन पर मौत की सजा का फैसला, अवामी लीग पर कार्रवाई और बदले हुए राजनीतिक हालात चर्चा में हैं. विदेश मामलों के जानकार डॉ. ब्रह्मदीप अलूने मानते हैं कि यदि यह वापसी होती है, तो इसका असर केवल शेख हसीना तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बांग्लादेश की लोकतांत्रिक व्यवस्था, न्यायिक प्रक्रिया, भारत-बांग्लादेश संबंधों और दक्षिण एशिया की राजनीति पर भी पड़ेगा. पांच प्वाइंट में समझें एक्सपर्ट की राय.

1. सबसे बड़ी परीक्षा होगी न्यायिक प्रक्रिया की

विदेश मामलों के जानकार डॉ. ब्रह्मदीप अलूने का कहना है कि शेख हसीना की वापसी के बाद सबसे अहम सवाल उनकी गिरफ्तारी नहीं, बल्कि उसके बाद की कानूनी प्रक्रिया होगी. पूरी दुनिया की नजर इस बात पर रहेगी कि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई और अपना पक्ष रखने का अवसर मिलता है या नहीं. यदि मुकदमे की प्रक्रिया पारदर्शी रहती है, तो बांग्लादेश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता मजबूत होगी. वहीं, किसी भी तरह की पक्षपातपूर्ण कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए सवाल खड़े कर सकती है.

2. अवामी लीग को मिल सकती है नई ताकत

विशेषज्ञों के अनुसार, शेख हसीना की वापसी अवामी लीग के लिए बड़ा मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक संदेश साबित हो सकती है. लंबे समय से दबाव झेल रहे पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ सकता है और संगठन को दोबारा सक्रिय करने का मौका मिल सकता है. चूंकि अवामी लीग का बांग्लादेश में मजबूत जनाधार रहा है, इसलिए हसीना की मौजूदगी पार्टी को फिर से राजनीतिक केंद्र में ला सकती है.

3. तारीक रहमान सरकार की होगी परीक्षा

डॉ. अलूने का मानना है कि अब नजर बांग्लादेश की मौजूदा सरकार पर होगी. यदि शेख हसीना लौटती हैं, तो प्रधानमंत्री तारीक रहमान और उनकी सरकार को यह तय करना होगा कि कानूनी प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष और लोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़े. यदि उन्हें बचाव का पूरा अवसर दिया जाता है, तो यह सरकार की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता का संकेत होगा. वहीं, किसी भी कठोर या विवादित कदम से राजनीतिक तनाव बढ़ सकता है.

4. भारत-बांग्लादेश रिश्तों को मिल सकती है नई दिशा

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत इस पूरे घटनाक्रम में सतर्क और संतुलित कूटनीतिक रुख अपनाएगा. हालांकि यदि पूरी प्रक्रिया कानून और लोकतांत्रिक मानकों के अनुरूप चलती है, तो भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में स्थिरता और भरोसा बढ़ सकता है. दूसरी ओर, यदि राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो इसका असर दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों पर भी पड़ सकता है.

5. दक्षिण एशिया की राजनीति पर रहेगी दुनिया की नजर

डॉ. ब्रह्मदीप अलूने के अनुसार, शेख हसीना की वापसी केवल बांग्लादेश का आंतरिक मामला नहीं होगी. संयुक्त राष्ट्र, मानवाधिकार संगठन और कई लोकतांत्रिक देश पूरे घटनाक्रम पर नजर रखेंगे. यह देखा जाएगा कि बांग्लादेश राजनीतिक मतभेदों से कैसे निपटता है और न्यायिक प्रक्रिया कितनी स्वतंत्र रहती है. इसी आधार पर देश की अंतरराष्ट्रीय छवि और दक्षिण एशिया में उसकी राजनीतिक साख का आकलन होगा.

डॉ. ब्रह्मदीप अलूने का मानना है कि शेख हसीना की संभावित वापसी बांग्लादेश के लिए केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि लोकतंत्र, न्यायपालिका और राजनीतिक परिपक्वता की बड़ी परीक्षा होगी. आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि यह वापसी अवामी लीग के पुनरुत्थान का रास्ता बनती है या बांग्लादेश की राजनीति में नए टकराव का कारण. इतना तय है कि दिसंबर का यह घटनाक्रम पूरे दक्षिण एशिया की राजनीति पर गहरा असर डाल सकता है.

सही में हसीना को नहीं गिरफ्तारी या मौत से डर?

इस मसले पर बहस इसलिए कि बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने रॉयटर्स को दिए इंटरव्यू में इस साल दिसंबर के आसपास भारत से बांग्लादेश लौटकर अदालत के सामने आत्मसमर्पण करने की इच्छा जताई है. यह ऐलान ऐसे समय आया है, जब 2024 के छात्र आंदोलन से जुड़े एक मामले में उन्हें अनुपस्थिति में मौत की सजा सुनाई जा चुकी है.

हसीना का कहना है कि उन्हें गिरफ्तारी या मौत का डर नहीं है और अगर अंतिम समय आना है तो वह अपनी मातृभूमि पर ही आए. उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज मामलों को राजनीतिक प्रतिशोध बताया और दावा किया कि अदालत में पेश होकर वह अपनी बेगुनाही साबित करना चाहती हैं.

साथ ही उन्होंने अवामी लीग पर लगे प्रतिबंध का विरोध किया, पार्टी कार्यकर्ताओं पर दमन का आरोप लगाया और बांग्लादेश में लोकतंत्र, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा तथा कानून के शासन पर सवाल उठाए. उनकी संभावित वापसी बांग्लादेश की राजनीति और भारत-बांग्लादेश संबंधों पर व्यापक असर डाल सकती है.

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