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'15000 मौतें, 41 हजार घायल और सैकड़ों बच्चे लापता', रूस यूक्रेन वॉर पर UN रिपोर्ट ने खोली युद्ध की काली सच्चाई, 15 Points में जानें सबकुछ

यूएन रिपोर्ट के मुताबिक रूस-यूक्रेन युद्ध अब सिर्फ सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि बड़ा मानवीय संकट बन चुका है. हजारों मौतों और बच्चों के गायब होने के आरोपों ने अंतरराष्ट्रीय कानून पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

Russia Ukraine War UN human right council Report
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संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की ताजा जांच रिपोर्ट ने Russia-Ukraine War को लेकर बेहद चिंताजनक और डरावनी तस्वीर दुनिया के सामने पेश की है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक रूस यूक्रेन वार सिर्फ एक जंग नहीं, बल्कि इंसानी जिंदगी, बच्चों के भविष्य और अंतरराष्ट्रीय कानून की विश्वसनीयता पर गहरा सवाल है. हजारों नागरिकों की मौत, लाखों की जिंदगी पर असर और सबसे भयावह बच्चों को परिवारों से अलग किए जाने के आरोप, इस संघर्ष को एक मानवीय संकट में बदल देते हैं.

रिपोर्ट में “मानवता के खिलाफ अपराध” जैसे गंभीर निष्कर्ष इस बात का संकेत हैं कि युद्ध अब सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज के सबसे कमजोर वर्ग यानी महिलाओं और बच्चों को सीधे निशाना बना रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह सिर्फ युद्ध की कीमत है, या फिर अंतरराष्ट्रीय कानून की खुली अनदेखी? यही समझने की कोशिश इस एक्सप्लेनर में करेंगे. 15 प्वाइंट में जानें यूएन मानवाधिकार परिषद की रिपोर्ट को बारे में सबकुछ.

1. यूएन मानवाधिकार परिषद ने 4 मार्च 2022 को एक विशेष प्रस्ताव पारित कर यूक्रेन में हो रहे कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच के लिए स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय आयोग का गठन किया था. इस आयोग को युद्ध से जुड़े सभी गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच करने और तथ्य सामने लाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी.

2. यह जांच तंत्र Russia-Ukraine War की पृष्ठभूमि में स्थापित किया गया, जब रूस के सैन्य हमले के बाद बड़े पैमाने पर नागरिकों के खिलाफ हिंसा और विस्थापन की खबरें सामने आने लगीं. अंतरराष्ट्रीय समुदाय में बढ़ती चिंता के बीच इस आयोग को सक्रिय किया गया.

3. आयोग का मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून, मानवाधिकार कानून और युद्ध अपराधों से जुड़े आरोपों की गहराई से जांच करना था. इसके तहत नागरिकों पर हमले, बुनियादी ढांचे की तबाही, हिरासत, और जबरन विस्थापन जैसे मामलों को प्राथमिकता से दर्ज किया गया.

4. रिपोर्ट में सामने आया कि युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक 15,000 से अधिक आम नागरिकों की मौत हो चुकी है, जबकि 41,000 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं. ये आंकड़े संघर्ष की भयावहता को दर्शाते हैं और यह बताते हैं कि आम जनता इस युद्ध का सबसे बड़ा शिकार बनी है.

5. आयोग की रिपोर्ट में बताया गया है कि रूसी अधिकारियों द्वारा किए गए काम 'मानवता के खिलाफ अपराध' की श्रेणी में आते हैं. यह केवल अलग-अलग घटनाएं नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और व्यवस्थित पैटर्न का हिस्सा प्रतीत होते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन है.

6. जांच में पाया गया कि कई इलाकों में नागरिकों को जबरन उनके घरों से निकालकर अन्य स्थानों पर भेजा गया. इस प्रक्रिया में लोगों को अपने परिवारों से अलग होना पड़ा, जिससे बड़े पैमाने पर सामाजिक और मानवीय संकट पैदा हुआ, खासकर कमजोर वर्गों पर इसका गहरा असर पड़ा.

7. रिपोर्ट में बच्चों को लेकर स्थिति को विशेष रूप से गंभीर बताया गया है. आयोग ने कम से कम 1,205 मामलों की पुष्टि की है, जिनमें यूक्रेनी बच्चों को एक जगह से दूसरी जगह जबरन ट्रांसफर या डिपोर्ट किया गया.

8. इन मामलों में सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि लगभग 80 प्रतिशत बच्चे अब तक अपने परिवारों से दोबारा नहीं मिल पाए हैं. यह स्थिति लंबे समय तक चलने वाले मानवीय संकट की ओर इशारा करती है, जिसमें बच्चों का भविष्य और पहचान दोनों खतरे में हैं.

9. रूसी अधिकारियों ने इन घटनाओं को इवैक्यूएशन यानी सुरक्षित स्थान पर ले जाने की कार्रवाई बताया, लेकिन आयोग की जांच में पाया गया कि यह अस्थायी या स्वैच्छिक नहीं था, बल्कि इसमें कई कानूनी मानकों की अनदेखी की गई.

10. बच्चों के स्थानांतरण में माता-पिता, अभिभावकों या संबंधित यूक्रेनी संस्थाओं की सहमति नहीं ली गई. अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार यह गंभीर उल्लंघन है और इसे अपहरण या जबरन गायब करने जैसे अपराधों की श्रेणी में रखा जा सकता है.

11. आयोग ने यह भी पाया कि परिवारों से लंबे समय तक अलग रहने के कारण बच्चों को गंभीर मानसिक आघात, असुरक्षा और पहचान संकट का सामना करना पड़ा. इससे उनके सामाजिक विकास और भविष्य पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका जताई गई है.

12. रिपोर्ट में न्यायिक प्रक्रियाओं को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं. रूसी नियंत्रण वाले क्षेत्रों में चल रहे कई ट्रायल्स में निष्पक्षता की कमी पाई गई, जहां अदालतों ने स्वतंत्र और निष्पक्ष न्याय के बुनियादी सिद्धांतों का पालन नहीं किया.

13. कई मामलों में आरोपियों के खिलाफ पहले से तय नतीजों के आधार पर फैसले दिए गए. बचाव पक्ष की दलीलों को नजरअंदाज किया गया और न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव देखा गया, जिससे न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए.

14. आयोग ने यह भी पाया कि कई मामलों में आरोप साबित करने के लिए संदिग्ध या जबरन हासिल किए गए सबूतों का इस्तेमाल किया गया. कुछ मामलों में टॉर्चर या दबाव के जरिए कबूलनामे लिए गए, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत पूरी तरह अवैध माने जाते हैं.

15. रिपोर्ट में यौन और जेंडर आधारित हिंसा के मामलों को भी विस्तार से दर्ज किया गया है. महिलाओं, लड़कियों और हिरासत में रखे गए लोगों के साथ यौन उत्पीड़न, शारीरिक हिंसा और अमानवीय व्यवहार के कई उदाहरण सामने आए, जिससे इस संघर्ष का एक और भयावह पहलू उजागर होता है.

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