क्या Pakistan में सफेद हाथी बन गया है ISI? हरकतों से नाराज हुए असीम मुनीर, कहीं भारत कनेक्शन तो नहीं- Explainer
पाकिस्तान में ISI की भूमिका और प्रभाव पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, खासकर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद. असीम मुनीर की नाराज़गी, आतंकी नेटवर्क में दरार और रहस्यमयी हत्याओं ने हालात को और जटिल बना दिया है.
पाकिस्तान इस वक्त ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसका सबसे ताकतवर समझा जाने वाला सुरक्षा ढांचा ही सवालों के घेरे में आ गया है. 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान सामने आई कथित खुफिया विफलता ने न सिर्फ सिस्टम की कमजोरियों को उजागर किया, बल्कि सेना और Inter-Services Intelligence (ISI) के बीच बढ़ती खाई को भी सबके सामने ला दिया.
हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि जिस एजेंसी को कभी पाकिस्तान की 'शैडो पावर' माना जाता था, उसी की क्षमता पर अब उसके अपने ही लोग सवाल उठा रहे हैं. ऊपर से आर्मी चीफ Asim Munir की नाराज़गी ने इस संकट को और गहरा कर दिया है. यही वजह है कि अब सबसे बड़ा और असहज सवाल उठ रहा है. क्या ISI अब पाकिस्तान के लिए ‘सफेद हाथी’ बनती जा रही है? यानी एक ऐसी महंगी, ताकतवर लेकिन धीरे-धीरे बेअसर होती संस्था… जो दिखने में मजबूत है, लेकिन जमीनी हकीकत में अपनी पकड़ खोती जा रही है.
हालात ऐसे हैं कि देश एक साथ कई मोर्चों पर जूझ रहा है. अफगानिस्तान के साथ बढ़ता तनाव, बलूचिस्तान में फिर से सिर उठाता विद्रोह और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के लगातार हमले. इन चुनौतियों के बीच खुफिया तंत्र की कमजोरी अब पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चिंता बनती जा रही है.
क्या खुफिया विफलता ने बढ़ा दिया है सेना-ISI के बीच तनाव?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर और ISI के बीच मतभेद गहराते जा रहे हैं. हाल के ऑपरेशनों में खुफिया चूक और बड़े आतंकी नेताओं को ट्रैक करने में नाकामी ने इस तनाव को और बढ़ा दिया है. सूत्रों की मानें तो कई अहम बैठकों में जनरल असीम मुनीर ने ISI की हरकतों से नाराज होते नजर आ रहा है ऐसे में उन्होंने खुफिया एजेंसियों को कड़ा संदेश दिया कि प्रदर्शन करो या खत्म हो जाओ. इस सख्त रुख के बाद ISI के भीतर बड़े स्तर पर फेरबदल और वरिष्ठ अधिकारियों की छुट्टी की अटकलें तेज हो गई हैं. इससे एजेंसी के अंदर अस्थिरता और चिंता का माहौल बन गया है.
क्या पाकिस्तान कई मोर्चों पर एक साथ घिर चुका है?
पाकिस्तान की मुश्किलें सिर्फ अंदरूनी नहीं हैं. एक तरफ अफगानिस्तान सीमा पर तनाव बढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ बलूचिस्तान में विद्रोही समूह फिर से सक्रिय हो चुके हैं. TTP के हमले लगातार बढ़ रहे हैं और कई इलाकों में उग्रवादियों ने अपने चेकपोस्ट तक स्थापित कर लिए हैं. इससे साफ संकेत मिलता है कि स्थानीय स्तर पर सरकार की पकड़ कमजोर हो रही है. इसके अलावा 2026 के ईरान-क्षेत्रीय संघर्ष ने भी इस्लामाबाद की परेशानियां बढ़ा दी हैं. ऊर्जा आपूर्ति से लेकर कूटनीतिक संतुलन तक, हर मोर्चे पर दबाव साफ नजर आ रहा है.
क्या सैन्य ऑपरेशनों में भी हो रही हैं बड़ी गलतियां?
हाल के महीनों में पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान के भीतर किए गए कई ऑपरेशनों पर सवाल उठे हैं. रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि कई बार टारगेट चूक गए और कुछ मामलों में नागरिक ठिकाने प्रभावित हुए. सबसे गंभीर मामला कार्बेल अस्पताल पर हुए कथित हवाई हमले का बताया जा रहा है, जिसमें 400 से ज्यादा लोगों की मौत और 250 से अधिक के घायल होने की खबर है. इस घटना ने खुफिया तंत्र की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है.
लाहौर में आमिर हमज़ा पर हमला क्या बताता है?
लश्कर-ए-तैयबा के को-फाउंडर आमिर हमज़ा पर लाहौर में हुआ हमला पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करता है. 16 अप्रैल को ट्रैफिक में फंसे उनके वाहन पर अज्ञात हमलावरों ने ताबड़तोड़ फायरिंग की, जिसमें वह गंभीर रूप से घायल हो गए. खास बात यह है कि यह हमला हाई-सिक्योरिटी ज़ोन में हुआ, जहां सुरक्षा के कड़े इंतजाम होने का दावा किया जाता है. यह पिछले एक साल में उन पर दूसरा बड़ा हमला बताया जा रहा है, जिससे यह साफ होता है कि देश में टारगेट किलिंग का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा.
क्या टारगेट किलिंग बना नया ट्रेंड?
पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान और PoK में कई हाई-प्रोफाइल हत्याएं हुई हैं.
- 2024 में लश्कर कमांडर अबू क़ताल की हत्या
- मसूद अजहर के भाई मोहम्मद ताहिर अनवर की संदिग्ध मौत
- 2023 में परमजीत सिंह पंजवार की हत्या
- कराची में मुफ्ती क़ैसर फारूक को निशाना
- सियालकोट में शाहिद लतीफ की हत्या
इन घटनाओं में अक्सर अज्ञात हमलावरों का जिक्र आता है, जिससे खुफिया तंत्र की क्षमता पर सवाल और गहरे होते जा रहे हैं.
क्या लश्कर-ए-तैयबा के अंदर भी छिड़ गई है जंग?
खुफिया सूत्रों के मुताबिक, लश्कर-ए-तैयबा के भीतर नेतृत्व को लेकर बड़ा संघर्ष चल रहा है. हाफिज सईद की उम्र और नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं. संगठन के अंदर एक धड़ा बदलाव चाहता है, जबकि पुराना गुट अभी भी सईद के साथ खड़ा है. नंबर-2 माने जाने वाले सैफुल्लाह कसूरी को नए नेता के रूप में देखा जा रहा है और युवा कैडर का झुकाव भी उनकी ओर बताया जा रहा है. इससे संगठन के भीतर दो गुट बनते नजर आ रहे हैं.
क्या सेना और ISI के बीच मतभेद इस संकट को और बढ़ा रहे हैं?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान सेना और ISI इस मुद्दे पर एकमत नहीं हैं. जहां सेना सैफुल्लाह कसूरी को आगे बढ़ाने के पक्ष में बताई जा रही है, वहीं ISI अब भी हाफिज सईद को 'ट्राइड एंड टेस्टेड' मानती है. यही मतभेद अब पाकिस्तान के सत्ता ढांचे में असमंजस की स्थिति पैदा कर रहे हैं, जो सुरक्षा संकट को और गहरा कर सकते हैं.
क्या भारत की रणनीति से बदला खेल?
2014 से 2026 के बीच भारत ने अपनी खुफिया रणनीति में बड़ा बदलाव किया है. आतंकी हमलों को रोकने के लिए प्री-एम्प्टिव इंटेलिजेंस पर फोकस बढ़ाया गया है. इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) का बजट ₹1,176 करोड़ से बढ़कर ₹6,782 करोड़ हो गया. करीब 476% की वृद्धि. IB, NIA और ATS जैसी एजेंसियों के बेहतर समन्वय से कई आतंकी साजिशों को शुरुआती चरण में ही नाकाम किया गया. विशेषज्ञ मानते हैं कि इसी मजबूत खुफिया ढांचे के कारण पाकिस्तान समर्थित आतंकी नेटवर्क पर दबाव बढ़ा है.
क्या ISI वाकई ‘सफेद हाथी’ बनता जा रहा है?
पाकिस्तान के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती उसका खुद का कमजोर होता सुरक्षा ढांचा है. सेना और ISI के बीच बढ़ता अविश्वास, आतंकी संगठनों के भीतर संघर्ष और लगातार हो रही टारगेट किलिंग. ये सभी संकेत किसी बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं. अगर हालात नहीं सुधरे, तो ISI पर उठ रहे सवाल और गहरे होंगे और पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के लिए यह खतरा और बढ़ सकता है.
हाल के दिनों में भारत में रिलीज़ हुई फिल्म Dhurandhar ने एक अलग ही बहस छेड़ दी है. फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे एक भारतीय जासूस दुश्मन देश में घुसकर आतंकियों को चुन-चुनकर खत्म करता है. यह कहानी भले ही सिनेमाई हो, लेकिन इसी के बीच पाकिस्तान से आ रही खबरों ने इस 'फिल्मी प्लॉट' को हकीकत से जोड़ने का काम कर दिया है.
क्या भारत से जुड़ रहा है कनेक्शन?
दरअसल, पाकिस्तान में बीते कुछ वर्षों से लगातार ऐसे हमले सामने आ रहे हैं, जहां बड़े-बड़े आतंकी चेहरे रहस्यमय तरीके से ‘अज्ञात हमलावरों’ के निशाने पर आ रहे हैं. हमलावर आते हैं, सटीक वार करते हैं और बिना कोई सुराग छोड़े गायब हो जाते हैं. न कोई संगठन जिम्मेदारी लेता है, न कोई आधिकारिक दावा होता है. यही पैटर्न अब लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या वाकई कोई “साइलेंट ऑपरेशन” चल रहा है? ताज़ा मामला Amir Hamza पर हुए हमले का है, जो आतंकी संगठन Lashkar-e-Taiba के सह-संस्थापक माने जाते हैं. लाहौर जैसे हाई-सिक्योरिटी शहर में उन पर खुलेआम फायरिंग होना कई सवाल खड़े करता है. सबसे बड़ा सवाल. क्या यह सिर्फ पाकिस्तान की अंदरूनी लड़ाई है या इसके पीछे कोई बाहरी कनेक्शन भी है?
विश्लेषकों का मानना है कि इन घटनाओं को सीधे तौर पर किसी एक देश से जोड़ना अभी जल्दबाज़ी होगी, लेकिन जिस तरह से टारगेट किलिंग का पैटर्न सामने आ रहा है, उसने शक को जरूर जन्म दिया है. खासकर भारत में फिल्म Dhurandhar के रिलीज़ के बाद सोशल मीडिया पर इस तरह की घटनाओं को “रियल लाइफ धुरंधर ऑपरेशन” कहकर जोड़ा जा रहा है. हालांकि, आधिकारिक स्तर पर भारत की ओर से इस तरह के किसी भी ऑपरेशन की पुष्टि नहीं की गई है.




