आसान नहीं है Iran हो जाना! खून के आंसू रोएंगे America और इजरायल - Decode हो गई स्ट्रेटजी, समझिए मोजेक डिफेंस क्या है?
ईरान की “मोजेक डिफेंस” रणनीति का मकसद युद्ध को एक झटके में खत्म होने से रोकना है. इस मॉडल में सेना, मिलिशिया, मिसाइल और लोकल कमांड मिलकर ऐसा नेटवर्क बनाते हैं जो लंबे युद्ध में दुश्मन की लागत बढ़ा देता है.
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच ईरान की सैन्य रणनीति को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है. तेहरान लंबे समय से इस बात को समझ चुका है कि तकनीक, एयर पावर और इंटेलिजेंस के मामले में अमेरिका और इजरायल उससे कहीं ज्यादा मजबूत हैं. इसलिए उसने सीधे टकराव की जगह ऐसी रणनीति तैयार की है जिसमें दुश्मन को जल्दी जीत हासिल न हो सके.
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने हाल ही में कहा कि तेहरान ने पिछले दो दशकों में अमेरिका के युद्धों का गहराई से अध्ययन किया है. मकसद यह समझना था कि अगर राजधानी पर हमला हो जाए, शीर्ष कमांडर मारे जाएं या संचार व्यवस्था टूट जाए, तब भी देश की सैन्य क्षमता कैसे काम करती रहे. इसी सोच से ईरान की “डीसेंट्रलाइज़्ड मोज़ेक डिफेंस” रणनीति विकसित हुई.
इस रणनीति का मूल सिद्धांत यह है कि युद्ध को एक ही झटके में खत्म नहीं होने देना है. चाहे कमांड सिस्टम पर हमला हो, चाहे बड़े सैन्य अड्डे नष्ट कर दिए जाएं, फिर भी लड़ाई जारी रहनी चाहिए. इसी कारण ईरान की सैन्य संरचना को इस तरह बनाया गया है कि अलग-अलग हिस्से स्वतंत्र रूप से भी काम कर सकें.
क्या है ‘मोजेक डिफेंस’ की रणनीति?
“मोज़ेक डिफेंस” ईरान की एक सैन्य अवधारणा है जो खास तौर पर IRGC से जुड़ी हुई है. इस रणनीति को सबसे ज्यादा आगे बढ़ाने का श्रेय पूर्व कमांडर मोहम्मद अली जाफरी को दिया जाता है, जिन्होंने 2007 से 2019 तक इस फोर्स का नेतृत्व किया.
इस मॉडल का विचार सरल लेकिन बेहद रणनीतिक है. आम तौर पर कई देशों की सेनाएं एक केंद्रीकृत कमांड सिस्टम पर निर्भर होती हैं. अगर दुश्मन उस कमांड सेंटर या शीर्ष नेतृत्व को खत्म कर दे तो पूरी सेना कमजोर पड़ सकती है. ईरान ने इसी खतरे से बचने के लिए अपने डिफेंस सिस्टम को कई छोटे-छोटे क्षेत्रीय कमांड ढांचे में बांट दिया.
इसका मतलब यह है कि सेना, मिसाइल यूनिट, नौसेना, लोकल मिलिशिया और अलग-अलग सुरक्षा इकाइयां एक नेटवर्क की तरह काम करती हैं. यदि एक हिस्सा नष्ट हो जाए तो बाकी हिस्से अपनी जगह से लड़ाई जारी रख सकते हैं. इस तरह पूरी सैन्य क्षमता एक ही हमले से खत्म नहीं होती.
नई रणनीति की जरूरत क्यों महसूस की, सद्दाम हुसैन से क्या लिया सबक?
ईरान की सैन्य सोच में बड़ा बदलाव 2000 के दशक की शुरुआत में आया. जब अमेरिका ने 2001 में अफगानिस्तान और 2003 में इराक पर हमला किया, तब तेहरान ने करीब से देखा कि किस तरह एक मजबूत दिखने वाली सरकार भी कुछ ही हफ्तों में गिर सकती है.
इराक में सद्दाम हुसैन का शासन अमेरिकी सैन्य ताकत के सामने बहुत जल्दी ढह गया. इसका एक बड़ा कारण यह था कि पूरा सिस्टम एक केंद्रीकृत कमांड पर निर्भर था. जब उस पर हमला हुआ तो पूरी व्यवस्था बिखर गई.
ईरान ने इससे सबक लिया और तय किया कि उसकी सैन्य शक्ति किसी एक कमांड या राजधानी पर निर्भर नहीं होगी. इसके बजाय उसने “डिफ्यूज्ड पावर” यानी बिखरी हुई सैन्य ताकत का मॉडल अपनाया. इसका मकसद यह था कि दुश्मन के लिए जीत हासिल करना बेहद लंबा और महंगा हो जाए.
युद्ध के समय यह रणनीति कैसे काम करेगी?
ईरान के सैन्य सिद्धांत में अलग-अलग संस्थाओं को अलग-अलग भूमिका दी गई है. सबसे पहले पारंपरिक सेना, जिसे “आर्टेश” कहा जाता है, शुरुआती हमले का सामना करती है. इसकी बख्तरबंद और पैदल सेना की टुकड़ियां दुश्मन की बढ़त को धीमा करने और शुरुआती रक्षा पंक्ति बनाए रखने का काम करती हैं.
इसके साथ ही एयर डिफेंस सिस्टम दुश्मन की हवाई बढ़त को कम करने की कोशिश करता है. ये यूनिट्स अक्सर छिपकर, फैलकर और भ्रम पैदा करने वाली रणनीतियों के साथ काम करती हैं ताकि दुश्मन को सही लक्ष्य पहचानने में मुश्किल हो.
जब युद्ध लंबा खिंचने लगता है, तब IRGC और लोकल मिलिशिया सक्रिय भूमिका में आते हैं. वे गुरिल्ला युद्ध, घात लगाकर हमला, सप्लाई लाइनों को बाधित करना और शहरों-पहाड़ों जैसे कठिन इलाकों में लड़ाई को फैलाने का काम करते हैं. इससे दुश्मन को हर इलाके में अलग-अलग मोर्चे पर लड़ना पड़ता है.
बासिज मिलिशिया की भूमिका इतनी अहम क्यों है?
ईरान की इस रणनीति में लोकल मिलिशिया 'बासिज' की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. इस फोर्स की स्थापना 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद Ruhollah Khomeini के आदेश पर हुई थी.
समय के साथ बासिज को IRGC के युद्धकालीन ढांचे में शामिल कर लिया गया. 2007 के बाद इसकी यूनिट्स को ईरान के 31 प्रांतों में फैले एक प्रांतीय कमांड सिस्टम में संगठित किया गया. इससे स्थानीय कमांडरों को भूगोल और स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से फैसले लेने की स्वतंत्रता मिल गई.
यही विकेंद्रीकरण मोज़ेक डिफेंस की असली ताकत है. अगर ऊपर की कमान कमजोर पड़ जाए तब भी नीचे की इकाइयां लड़ाई जारी रख सकती हैं.
समुद्र और मिसाइल युद्ध में ईरान की रणनीति क्या है?
जमीनी युद्ध के अलावा ईरान ने समुद्री क्षेत्र में भी खास रणनीति तैयार की है. फारस की खाड़ी और स्ट्रेट आफ होमर्मुज (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों पर ईरान एंटी-एक्सेस टैक्टिक्स का इस्तेमाल करने की योजना रखता है.
इसमें तेज गति वाली नौकाएं, समुद्री माइंस, एंटी-शिप मिसाइलें और छोटे-छोटे हमले शामिल हो सकते हैं. मकसद यह होता है कि दुश्मन के जहाजों के लिए समुद्री रास्ते खतरनाक और महंगे साबित हों.
इसके अलावा, ईरान की मिसाइल फोर्स दुश्मन के सैन्य अड्डों और इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाने की क्षमता रखती है. इससे युद्ध सिर्फ सीमा तक सीमित नहीं रहता बल्कि दूर तक फैल सकता है.
ईरान के लिए ‘समय’ इतना बड़ा हथियार क्यों है?
ईरान की सैन्य रणनीति में समय को एक हथियार की तरह देखा जाता है. उदाहरण के लिए, एक सस्ता ड्रोन बनाने की लागत हजारों डॉलर हो सकती है, जबकि उसे गिराने के लिए इस्तेमाल होने वाली इंटरसेप्टर मिसाइल कई गुना महंगी होती है.
इसी वजह से ईरान की रणनीति “लंबे युद्ध” पर आधारित है. इसका मकसद दुश्मन को लगातार दबाव में रखना और उसकी आर्थिक तथा सैन्य लागत को बढ़ाते जाना है.
क्या यह रणनीति ‘लंबे युद्ध’ के सिद्धांत से जुड़ी है?
ईरान की यह सोच पूरी तरह नई नहीं है. कई विश्लेषक मानते हैं कि इसमें लंबे समय तक चलने वाले युद्ध की वही झलक दिखाई देती है जिसकी चर्चा चीनी नेता Mao Zedong ने अपने सैन्य सिद्धांतों में की थी.
इस विचार का मूल यह है कि कमजोर पक्ष सीधे ताकतवर दुश्मन से निर्णायक लड़ाई नहीं लड़ता. इसके बजाय वह युद्ध को लंबा खींचता है, दुश्मन की लागत बढ़ाता है और धीरे-धीरे उसकी क्षमता को कमजोर करता है.
ईरान की “मोज़ेक डिफेंस” रणनीति भी इसी सिद्धांत पर आधारित है. लड़ाई को समय, भूगोल और कई स्तरों में फैलाकर ऐसा माहौल बनाना जिसमें कोई भी दुश्मन जल्दी जीत हासिल न कर सके.




