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Iran War में क्यों खीझ गया अमेरिका? 5 वजहें जो बताती हैं कि कैसे ‘सुपरपावर’ पड़ गया कमजोर

ईरान युद्ध के दौरान अमेरिका को अधिकांश मजबूत NATO देशों की ओर से सैन्य सहयोग और बेस एक्सेस देने से मना कर दिया. इससे ट्रंप और मार्क रुबियो झल्ला गए हैं. उन्होंने सहयोगियों को चेतावनी तक दे दी है. जानें पूरी लिस्ट और वजहें.

Iran War में क्यों खीझ गया अमेरिका? 5 वजहें जो बताती हैं कि कैसे ‘सुपरपावर’ पड़ गया कमजोर
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( Image Source:  Sora AI )

ईरान के साथ जारी युद्ध ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि केवल सैन्य ताकत ही किसी देश को सुपरपावर नहीं बनाती. अमेरिका ने शुरुआती हमलों में बढ़त जरूर बनाई, लेकिन जैसे-जैसे जंग आगे बढ़ी, कई ऐसी चुनौतियां सामने आईं, जिनसे उसकी रणनीति कमजोर पड़ती दिख रही है. नाटो देशों का सहयोग न मिलने से नाराज ट्रंप ने सहयोगियों को साफ कर दिया है कि यही रुख रहा तो वे अपनी सुरक्षा और एनर्जी की व्यवस्था खुद कर लें. मेरा होर्मुज से कोई लेना देना नहीं. सवाल यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी ताकत आखिर क्यों खीझी हुई नजर आने लगी. जानें, इसकी 5 बड़ी वजहें.

1. क्या Strait of Hormuz है ईरान का सबसे बड़ा हथियार?

मिडिल ईस्ट वॉर में असली गेमचेंजर Strait of Hormuz बन गया है. दुनिया के लगभग 20% तेल की सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है. ईरान ने इस मार्ग को बाधित कर सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बना दिया. अमेरिका सैन्य रूप से मजबूत है, लेकिन इस जलमार्ग को पूरी तरह सुरक्षित नहीं कर पा रहा. यही वजह है कि तेल की कीमतें बढ़ीं और वैश्विक बाजार अस्थिर हो गए. सुपरपावर होने के बावजूद अमेरिका इस “चोक पॉइंट” पर पूरी पकड़ नहीं बना सका.

2. US को हो चुका है 35 अरब डॉलर का नुकसान?

युद्ध का असर सिर्फ युद्धभूमि तक सीमित नहीं रहा. तेल सप्लाई बाधित होते ही कीमतों में भारी उछाल आया, जिससे अमेरिका समेत पूरी दुनिया प्रभावित हुई . अमेरिका के अंदर भी पेट्रोल की कीमतें और महंगाई राजनीतिक मुद्दा बन गई हैं. के मुताबिक, बढ़ती कीमतों और बाजार गिरावट ने वॉशिंगटन पर दबाव बढ़ा दिया है. अमेरिका में पिछले एक महीने में महंगाई दर 3.5 से 4 प्रतिशत तक पहुंच गया है. यानी अमेरिका सैन्य रूप से आगे होते हुए भी आर्थिक मोर्चे पर फंस गया और यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई.

बीबीसी और वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक 28 फरवरी 2026 से डोनाल्ड ट्रम्प के हमले शुरू करने के बाद लगभग 13 से 15 अमेरिकी सैन्य कर्मियों की मौत की खबर है. कम से कम आठ MQ-9 ड्रोन ईरान की मिसाइलों द्वारा गिराए गए हैं. कई अन्य जमीन पर नष्ट या क्षतिग्रस्त हुए हैं. जॉर्डन में थाड (THAAD) मिसाइल रक्षा प्रणाली के AN/TPY-2 रडार को नुकसान पहुंचा है.

USS गेराल्ड आर. फोर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर पर 12 मार्च को आग लगने से नुकसान हुआ, जो अब मरम्मत के अधीन है. होर्मुज स्ट्रेट के प्रभावित होने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव और युद्ध की अनिश्चितता से आर्थिक नुकसान का अनुमान है. हर रोज 1 अरब डॉलर खर्च हो रहा है. अब तक अमेरिका का खर्च 35 अरब डॉलर के पार पहुंच गया है. इसमें से लगभग 11.3 अरब डॉलर तो सिर्फ शुरुआती छह दिनों में ही खर्च हो गए थे.

3. क्यों नहीं मिल रहा NATO का पूरा साथ?

ईरान इजरायल युद्ध के दौरान अमेरिका को NATO सहयोगियों से वैसा समर्थन नहीं मिला, जैसा आमतौर पर उम्मीद की जाती है. खासकर सैन्य ठिकानों (base access), हवाई क्षेत्र और ऑपरेशनल सहयोग को लेकर कई देशों ने हिचक दिखाई या सीधे इनकार किया. ​ि Spain और Italy ने अमेरिका के सैन्य विमानों को अपने हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल की अनुमति देने से इनकार कर दिया. ब्रिटेन ने शुरुआत में अपने रॉयल एयर फोर्स (RAF) के अड्डों के इस्तेमाल की अनुमति देने से मना कर दिया था. हालांकि, बाद में उसने अपना रुख बदलते हुए सीमित सहयोग दिया.

जर्मनी ने सीधे इनकार नहीं किया, लेकिन उसने इस युद्ध में सक्रिय सैन्य भागीदारी से दूरी बनाए रखी और केवल कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया. फ्रांस ने भी सीधे सैन्य कार्रवाई में शामिल होने से परहेज किया और अमेरिका को खुला ऑपरेशनल सपोर्ट देने से बचा. यानी नाटो में मजबूत देशों में अमेरिका का जंग में साथ देने वाला कोई है.

इससे साफ हो गया है कि NATO के भीतर एकरूपता नहीं दिखी. कई देशों ने सीधे या परोक्ष रूप से अमेरिका के सैन्य अभियान से दूरी बना ली है. यही वजह है कि Marco Rubio जैसे नेताओं ने सवाल उठाया कि अगर जरूरत के समय सहयोगी देश साथ नहीं देते, तो गठबंधन का वास्तविक मतलब क्या रह जाता है. इतना ही नहीं, खुद ट्रंप नाटो देशों से इतना नाराज हो गए हैं कि, उन्होंने कह दिया​ है कि आप खुद ही स्ट्रेट आफ होर्मुज से तेल ले लें.

4. ईरान की ‘असिमेट्रिक वॉर’ रणनीति कितना कारगर?

अमेरिका पारंपरिक युद्ध में मजबूत है, लेकिन ईरान ने सीधी लड़ाई के बजाय “असिमेट्रिक वॉरफेयर” अपनाया. ईरान ने ड्रोन, मिसाइल, प्रॉक्सी ग्रुप्स और समुद्री दबाव जैसे तरीकों से युद्ध को लंबा खींच दिया. इसका नतीजा यह हुआ कि मिडिल ईस्ट वॉर अब कई क्षेत्रों में फैल चुका है. ट्रंप प्रशासन का इस युद्ध को कुछ दिनों में खत्म करने की रणनीति सफल नहीं हुई. खाड़ी देशों से लेकर लेबनान तक, अमेरिका की “तेज जीत” की रणनीति कमजोर पड़ गई और जंग लंबी खिंचती दिख रही है.

5. US और EU के साथ दुनिया भर में ट्रंप के खिलाफ प्रदर्शन?

अमेरिका के अंदर भी इस युद्ध को लेकर समर्थन कमजोर पड़ता दिख रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, जनता का एक बड़ा हिस्सा चाहता है कि युद्ध जल्द खत्म हो. अमेरिका के लगभग सभी राज्यों में युद्ध शुरू करने के फैसले के खिलाफ जोर प्रदर्शन जारी है. दुनिया के अन्य देशों में भी ट्रंप के फैसले के लिखाफ विरोध प्रदर्शन जारी है. वहीं, डोनाल्ड ट्रंप घरेलू राजनीति, चुनावी दबाव और आर्थिक असर का बोझ है. यही वजह है कि अब “तेज जीत” की जगह “जल्दी बाहर निकलने” की रणनीति दिख रही है. जब कोई सुपरपावर अपनी शर्तों पर नहीं, बल्कि दबाव में फैसले लेने लगे, तो उसकी ताकत पर सवाल उठने लगते हैं.

ईरान युद्ध ने यह साफ कर दिया है कि आधुनिक युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं जीते जाते. आर्थिक दबाव, वैश्विक सप्लाई चेन, गठबंधन राजनीति और रणनीतिक लोकेशन, ये सब मिलकर ताकत तय करते हैं. अमेरिका अब भी दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है, लेकिन इस युद्ध ने उसकी सीमाएं उजागर कर दी हैं. यही वजह है कि आज सवाल उठ रहा है, क्या सुपरपावर होना अब पहले जितना आसान रह गया है?

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