'नरसंहार के 8वें चरण' में भारत...मुसलमानों का होता है उत्पीड़न! अमेरिकी सांसद इल्हान उमर के दावे से बवाल, क्या कहते हैं आंकड़े?
अमेरिकी सांसद इल्हान उमर के भारत को ‘Genocide के 8वें चरण’ में बताने वाले बयान ने नया विवाद खड़ा कर दिया है. उनके दावे के बाद भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति, जनसंख्या आंकड़ों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर बहस तेज हो गई है.
इन दिनों अमेरिका और दुनिया के कई हिस्सों में राजनीतिक और सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ता जा रहा है. इसी बीच, प्रवासियों (immigrants) को लेकर भी बहस गर्म है. इस माहौल के बीच, अमेरिकी संसद की सदस्य (सांसद) इल्हान उमर ने एक बार फिर भारत को लेकर एक बेहद विवादित बयान दिया है. जून महीने में 'इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल' (IAMC) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए उमर ने आरोप लगाया कि भारत इस समय 'नरसंहार (Genocide) के आठवें चरण' में पहुंच चुका है. यह कार्यक्रम वैसे तो 7 जून को हुआ था, लेकिन हाल ही में जब इस भाषण के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, तो इस पर एक नई बहस छिड़ गई है. बता दें कि इल्हान उमर जो अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी से हैं और आईएएमसी (IAMC) दोनों ही पहले भी कई बार भारत की नीतियों की तीखी आलोचना कर चुके हैं.
क्या है इल्हान उमर का '8वां चरण' वाला दावा?
इल्हान उमर ने अपने भाषण में नरसंहार के मामलों के विशेषज्ञ और 'जेनोसाइड वॉच' के संस्थापक ग्रेगरी एच. स्टैंटन के एक सिद्धांत का हवाला दिया. स्टैंटन ने किसी भी समाज में नरसंहार कैसे फैलता है, इसे समझाने के लिए 10 चरणों का एक ढांचा तैयार किया है. इस मॉडल के अनुसार, आठवां चरण 'उत्पीड़न' का होता है. स्टैंटन के मुताबिक, इस चरण में सरकार या समाज के बड़े हिस्से द्वारा अल्पसंख्यक समुदायों को व्यवस्थित तरीके से निशाना बनाया जाता है. इसमें उनके मानवाधिकारों का हनन, बिना कानूनी प्रक्रिया के गिरफ्तारियां या हत्याएं, जमीन-जायदाद छीनना, उन्हें अलग-थलग बस्तियों में रहने पर मजबूर करना या फिर भोजन, पानी और इलाज जैसी बुनियादी चीजों से महरूम करना शामिल है. उमर ने आरोप लगाया कि भारत में यह सब बड़े पैमाने पर हो रहा है. उन्होंने यह भी कहा, 'हमें इस बारे में लगातार चेतावनी देते रहना होगा. भारत में जो स्थिति है, वह सिर्फ मोदी सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अब वहां के समाज और व्यवस्था का हिस्सा बनती जा रही है.'
आंकड़ों और इतिहास का क्या कहना है?
इल्हान उमर के इन गंभीर आरोपों के विपरीत, भारत के आंकड़े और जमीनी हकीकत एक अलग ही कहानी बयां करते हैं. आलोचकों और जानकारों का कहना है कि भारत को बदनाम करने के लिए अक्सर ऐसे झूठे एजेंडे चलाए जाते हैं. आजादी के बाद से लेकर आज तक भारत में मुस्लिम, सिख, ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की जनसंख्या में लगातार वृद्धि हुई है. यह इस बात का सबूत है कि उन्हें फलने-फूलने के समान अवसर मिले हैं. भारत के इतिहास और वर्तमान दोनों में अल्पसंख्यकों ने देश के सर्वोच्च पदों की शोभा बढ़ाई है. भारत में अल्पसंख्यक समुदायों से राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री (जैसे डॉ. मनमोहन सिंह), मुख्य न्यायाधीश और सेना प्रमुख तक बने हैं. इसके अलावा भारत के चुनावों और राजनीतिक व्यवस्था में अल्पसंख्यकों की भागीदारी उतनी ही मजबूत है जितनी किसी और नागरिक की.
पड़ोसी देशों बनाम भारत की स्थिति
इस पूरे विवाद पर भारत के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने मई में एक बड़ा बयान दिया था. उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि भारत अल्पसंख्यकों के लिए दुनिया के सबसे सुरक्षित और समावेशी देशों में से एक है. उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के बाकी देशों से तुलना करते हुए कहा, 'जब हम भारत के पड़ोसियों की तरफ देखते हैं, तो वहां रहने वाले अल्पसंख्यकों (जैसे हिंदुओं, सिखों और ईसाइयों) को अपनी जान और धर्म बचाने के लिए भारी संघर्ष करना पड़ता है. पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में धार्मिक उत्पीड़न के कारण वहां के अल्पसंख्यकों की संख्या लगातार घटी है. ऐसे में इन देशों के सताए हुए लोगों ने हमेशा भारत में आकर ही शरण, सुरक्षा और सम्मान पाया है.'




