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इस मंदिर में मूर्ति नहीं योनिपीठ की होती है पूजा, जून के महीने में मासिक चक्र में रहती हैं मां कामाख्या; जानिए 'नरबलि' का सच

असम के कामाख्या मंदिर में देवी की मूर्ति नहीं, बल्कि योनिपीठ की पूजा होती है. अंबूबाची मेले के दौरान तीन दिनों तक बंद रहने वाले इस शक्तिपीठ से जुड़े रहस्य आज भी लोगों को हैरान करते हैं.

इस मंदिर में मूर्ति नहीं योनिपीठ की होती है पूजा, जून के महीने में मासिक चक्र में रहती हैं मां कामाख्या; जानिए नरबलि का सच
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सागर द्विवेदी
By: सागर द्विवेदी14 Mins Read

Updated on: 18 Jun 2026 9:00 AM IST

क्या कोई ऐसा मंदिर हो सकता है जहां देवी के मासिक धर्म का उत्सव मनाया जाता हो? और यहां पर कोई मंदिर नहीं बल्कि योनिपीठ की पूजा की जाती हो? क्या किसी धार्मिक स्थल में साल के कुछ दिनों के लिए यह मान लिया जाता है कि देवी विश्राम कर रही हैं, इसलिए मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाएं? और क्या सचमुच एक ऐसी पवित्र चट्टान मौजूद है जो सालभर बिना रुके जल से भीगी रहती है, लेकिन उसके जल का स्रोत आज तक साफ नहीं हो पाया? ये सवाल सुनने में भले ही किसी रहस्यमयी कथा का हिस्सा लगें, लेकिन इनका संबंध भारत के सबसे चर्चित शक्तिपीठों में से एक कामाख्या मंदिर से है. आइए इन्हीं सभी सवालों के जवाब जानते हैं....

असम के गुवाहाटी शहर में नीलांचल पहाड़ी पर स्थित कामाख्या मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं है. यह वह धाम है जहां शक्ति, आस्था, लोकमान्यताएं, तांत्रिक परंपराएं और सदियों पुराने रहस्य एक साथ दिखाई देते हैं. यही वजह है कि हर साल लाखों श्रद्धालु और साधक यहां पहुंचते हैं. सनातन परंपरा के अनुसार जब माता सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह किया, तब शोक में डूबे भगवान शिव उनके शरीर को लेकर ब्रह्मांड में विचरण करने लगे. सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के विभिन्न अंगों को पृथ्वी पर अलग-अलग स्थानों पर गिराया.

यहां देवी की मूर्ति नहीं, योनिपीठ की होती है पूजा

मान्यता है कि सती का योनिभाग जिस स्थान पर गिरा, वही आज कामाख्या शक्तिपीठ के रूप में पूजित है. इसी कारण इसे सृजन शक्ति, मातृत्व और जीवन ऊर्जा का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है. देश के अधिकांश मंदिरों में देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित होती हैं, लेकिन कामाख्या मंदिर की पहचान बिल्कुल अलग है. मंदिर के गर्भगृह में किसी देवी की मूर्ति नहीं है. यहां एक प्राकृतिक शिला मौजूद है, जिसमें बनी दरार को योनिपीठ माना जाता है. श्रद्धालु इसी शक्ति स्वरूप के दर्शन और पूजा के लिए आते हैं.

गर्भगृह तक पहुंचने के लिए भक्तों को संकरी और नीचे की ओर जाती सीढ़ियों से गुजरना पड़ता है. जैसे-जैसे कोई व्यक्ति नीचे उतरता है, मंदिर का वातावरण और अधिक रहस्यमय महसूस होने लगता है. दीपकों की रोशनी, मंत्रोच्चार की ध्वनि और पत्थरों पर जमी नमी एक अलग आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती है.

हमेशा जल से भीगी रहती है यह पवित्र शिला

कामाख्या मंदिर का एक सबसे चर्चित रहस्य योनिपीठ से जुड़ा है. यह पवित्र शिला हमेशा जल से नम रहती है. यहां लगातार पानी रिसता रहता है और यही जल श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है. दिलचस्प बात यह है कि वर्षों से इस जल के स्रोत को लेकर अलग-अलग दावे किए जाते रहे हैं. भूगर्भीय दृष्टि से इसे प्राकृतिक जलस्रोत माना जाता है, लेकिन स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए यह केवल पानी नहीं, बल्कि देवी की जीवंत उपस्थिति और शक्ति का प्रतीक है.

अंबूबाची मेला- जब तीन दिनों के लिए बंद हो जाता है मंदिर

कामाख्या मंदिर की सबसे प्रसिद्ध परंपरा अंबूबाची मेले से जुड़ी हुई है. हर साल जून महीने में चार दिनों तक चलने वाले इस आयोजन के दौरान माना जाता है कि मां कामाख्या रजस्वला (मासिक धर्म) में होती हैं. इसी विश्वास के कारण मंदिर के कपाट तीन दिनों के लिए बंद कर दिए जाते हैं और इस अवधि में किसी भी श्रद्धालु को गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति नहीं होती. इन दिनों देवी को विश्राम दिया जाता है. चौथे दिन विशेष पूजा-अर्चना के बाद मंदिर के द्वार दोबारा खोले जाते हैं और भक्त दर्शन कर पाते हैं. इसी परंपरा ने कामाख्या मंदिर को दुनिया के सबसे अनोखे धार्मिक स्थलों में शामिल कर दिया है, क्योंकि यहां स्त्रीत्व, सृजन और प्रकृति के चक्र को दिव्यता के रूप में स्वीकार किया जाता है.



आस्था, रहस्य और शक्ति का अद्भुत संगम

कामाख्या मंदिर केवल एक प्राचीन मंदिर नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का ऐसा केंद्र है जहां आस्था और रहस्य एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं. योनिपीठ, अंबूबाची मेला, सदियों पुरानी मान्यताएं और गर्भगृह से जुड़ी अनसुलझी बातें आज भी लाखों लोगों को आकर्षित करती हैं. यही कारण है कि कामाख्या केवल असम की पहचान नहीं, बल्कि पूरे भारत की सबसे रहस्यमयी और चर्चित शक्ति पीठों में गिना जाता है.

क्यों कहा जाता है कामाख्या को तंत्र साधना की राजधानी?

भारत में शक्तिपीठों की कमी नहीं है, लेकिन कामाख्या का नाम आते ही चर्चा सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहती. यह वह स्थान है जिसे शाक्त और तांत्रिक परंपराओं में विशेष महत्व दिया गया है. नीलांचल पर्वत पर स्थित इस प्राचीन धाम को लेकर मान्यता है कि यहां देवी की शक्ति सबसे जागृत अवस्था में विद्यमान है. यही वजह है कि सामान्य श्रद्धालुओं के साथ-साथ साधक, अघोरी और तंत्र साधना से जुड़े लोग भी बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं. अंबूबाची मेले के दौरान यह दृश्य और भी खास हो जाता है. देश के अलग-अलग हिस्सों के अलावा विदेशों से भी साधना परंपराओं से जुड़े लोग यहां आते हैं. कई लोगों के लिए यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि शक्ति साधना का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है.

पशु बलि की परंपरा पर क्यों होती है चर्चा?

कामाख्या मंदिर का नाम उन धार्मिक स्थलों में भी लिया जाता है, जहां आज भी पशु बलि की परंपरा चर्चा का विषय बनी रहती है. मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार कुछ विशेष अवसरों पर नर पशुओं की बलि दी जाती है. समर्थकों का मानना है कि यह सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा का हिस्सा है, जबकि आलोचक इसे आधुनिक दौर में पुनर्विचार का विषय मानते हैं. इसी वजह से कामाख्या केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक बहसों के केंद्र में भी बना रहता है.


नरबलि की कहानियां: इतिहास, किंवदंती या विवाद?

कामाख्या से जुड़ी सबसे विवादित चर्चाओं में नरबलि का विषय भी शामिल है. पुराने ग्रंथों, लोककथाओं और क्षेत्रीय परंपराओं में ऐसे कई उल्लेख मिलते हैं, जिनमें मानव बलि की बातें कही गई हैं. हालांकि इतिहासकारों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि इन कथाओं को पूरी तरह प्रमाणित करना आसान नहीं है. कई विवरण लोकविश्वासों पर आधारित हैं, जबकि कुछ ऐतिहासिक संदर्भों की अलग-अलग व्याख्याएं मौजूद हैं. एक बात साफ है कि वर्तमान समय में मानव बलि जैसी किसी भी गतिविधि का कोई स्थान नहीं है. भारतीय कानून के तहत यह पूरी तरह प्रतिबंधित और दंडनीय अपराध है. फिर भी इतिहास और लोककथाओं में मौजूद ये कहानियां कामाख्या को रहस्य और जिज्ञासा का विषय बनाए रखती हैं.

राजा नर नारायण और देवी के श्राप की कथा

कामाख्या मंदिर की पहचान केवल धार्मिक मान्यताओं से नहीं, बल्कि उससे जुड़ी लोककथाओं से भी बनती है. सबसे चर्चित कथाओं में से एक राजा नर नारायण और मंदिर के पुजारी केंदुकलाई की कहानी है. लोकविश्वास के अनुसार केंदुकलाई देवी के अत्यंत प्रिय भक्त थे और उन्हें विशेष कृपा प्राप्त थी. कहानी कहती है कि एक बार राजा ने देवी के दिव्य स्वरूप को देखने का प्रयास किया. इसके बाद घटनाएं इस तरह बदलीं कि देवी के क्रोध और श्राप की कथा जन्म लेती है. यद्यपि इतिहासकार इन कथाओं को धार्मिक लोकविश्वास का हिस्सा मानते हैं, लेकिन स्थानीय संस्कृति में इनकी गहरी छाप आज भी दिखाई देती है.

आस्था से बड़ा है कामाख्या का रहस्य

कामाख्या मंदिर को समझना केवल इतिहास पढ़ लेने या धार्मिक मान्यताओं को जान लेने भर से संभव नहीं है. यह एक ऐसा स्थल है जहां पुराण, लोककथाएं, तांत्रिक परंपराएं, धार्मिक आस्था और प्राकृतिक रहस्य एक-दूसरे में घुलते हुए दिखाई देते हैं. कोई इसे शक्ति का सर्वोच्च केंद्र कहता है, कोई तंत्र साधना का प्रमुख धाम और कोई भारत का सबसे रहस्यमयी मंदिर.


ब्रह्मपुत्र के लाल पानी की चर्चा आखिर क्यों होती है?

अंबूबाची मेले के समय एक दावा सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरता है- ब्रह्मपुत्र नदी के पानी में दिखाई देने वाली लालिमा. श्रद्धालु इसे देवी के रजस्वला होने से जोड़कर देखते हैं, जबकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण इसके पीछे प्राकृतिक कारणों को तलाशता है. विशेषज्ञों के अनुसार मिट्टी, खनिज और मानसूनी प्रभाव भी जल के रंग में परिवर्तन ला सकते हैं. यही वजह है कि यह विषय वर्षों से आस्था और विज्ञान के बीच चर्चा का केंद्र बना हुआ है.

योनिपीठ का जल: एक ऐसा रहस्य जो आज भी बरकरार है

मंदिर के गर्भगृह में स्थित पवित्र योनिपीठ लगातार नमी से भरा रहता है. वहां से रिसने वाला जल श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है. दिलचस्प बात यह है कि मौसम बदलने के बावजूद इस जल की उपस्थिति बनी रहती है. कुछ विशेषज्ञ इसे प्राकृतिक जलस्रोत से जोड़ते हैं, जबकि भक्त इसे देवी की जीवंत शक्ति का प्रतीक मानते हैं. शायद यही कारण है कि कामाख्या केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक ऐसा अनुभव बन गया है जो हर आने वाले व्यक्ति को अपने ढंग से प्रभावित करता है. सदियां गुजर गईं, राजवंश बदल गए, परंपराएं बदलीं, लेकिन नीलांचल पर्वत पर स्थित यह शक्तिपीठ आज भी उतना ही आकर्षण पैदा करता है जितना सदियों पहले करता था. और शायद यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि यहां हर सवाल का जवाब नहीं मिलता, लेकिन हर जवाब एक नया सवाल जरूर छोड़ जाता है.

कामदेव से जुड़ी वह कथा, जिसने कामाख्या को बनाया रहस्य का केंद्र

कामाख्या मंदिर के इतिहास में एक ऐसी कथा भी सुनाई जाती है, जो इसे केवल एक शक्तिपीठ नहीं बल्कि दिव्य प्रेम और तपस्या का प्रतीक बना देती है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब कामदेव ने भगवान शिव की तपस्या भंग करने के लिए उन पर प्रेम बाण चलाया, तब शिव का क्रोध भड़क उठा. उनकी तीसरी आंख खुली और कामदेव भस्म हो गए. बाद में देवताओं ने शिव से कामदेव को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की. कहा जाता है कि शिव ने एक शर्त रखी. उन्होंने कहा कि यदि नीलांचल पर्वत पर माता सती की शक्ति-स्थली पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया जाए, तभी कामदेव को अपना सौंदर्य और अस्तित्व वापस मिलेगा. इसके बाद दिव्य शिल्पी विश्वकर्मा की सहायता से इस पवित्र स्थल के निर्माण की कथा सामने आती है. कई विद्वान मानते हैं कि "कामाख्या" नाम के पीछे भी इसी लोककथा की छाया दिखाई देती है.


नरकासुर और अधूरी रह गई सीढ़ियों का रहस्य

कामाख्या मंदिर से जुड़ी सबसे लोकप्रिय लोककथाओं में असुर राजा नरकासुर का नाम भी शामिल है. कहानी के अनुसार नरकासुर देवी कामाख्या से विवाह करना चाहता था. देवी ने उसकी इच्छा को सीधे अस्वीकार करने के बजाय एक असंभव सी चुनौती दे दी. शर्त थी कि वह एक ही रात में नीलांचल पर्वत की चोटी तक पहुंचने वाली सीढ़ियां तैयार करे. नरकासुर ने पूरी शक्ति लगा दी.

रातभर निर्माण चलता रहा और सफलता लगभग सामने दिखाई देने लगी. तभी देवी ने अपनी माया से एक मुर्गे को समय से पहले बांग देने के लिए प्रेरित कर दिया. मुर्गे की आवाज सुनकर नरकासुर को लगा कि सुबह हो चुकी है और वह शर्त पूरी नहीं कर पाया. क्रोध और निराशा में वह वहां से चला गया. स्थानीय मान्यताओं में आज भी कुछ प्राचीन अवशेषों को उसी अधूरे निर्माण से जोड़कर देखा जाता है.

आखिर राजा नर नारायण को क्यों मिला श्राप?

कामाख्या मंदिर के इतिहास में राजा नर नारायण का नाम विशेष सम्मान से लिया जाता है. माना जाता है कि उनके शासनकाल में मंदिर के पुनर्निर्माण का महत्वपूर्ण कार्य हुआ था. लोककथा के अनुसार मंदिर के एक महान साधक और पुजारी केंदुकलाई को देवी का परम भक्त माना जाता था. कहा जाता है कि विशेष साधना के समय देवी उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देती थीं. राजा भी इस दिव्य रहस्य को जानना चाहते थे. उन्होंने छिपकर देवी के दर्शन करने का प्रयास किया. लेकिन देवी ने इसे मर्यादा भंग और गोपनीय साधना में हस्तक्षेप के रूप में देखा. इसके बाद एक श्राप की कथा प्रचलित हुई, जिसमें कहा गया कि राजा के वंशजों को इस क्षेत्र से दूर रहने का आदेश मिला. हालांकि यह पूरी तरह धार्मिक लोकविश्वास का हिस्सा है, लेकिन आज भी यह कहानी श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय बनी रहती है.

पुजारी केंदुकलाई की कथा क्यों सुनाई जाती है?

कामाख्या से जुड़ी सबसे भावनात्मक कथाओं में पुजारी केंदुकलाई का उल्लेख मिलता है. लोक परंपराओं में माना जाता है कि देवी और उनके बीच विशेष आध्यात्मिक संबंध था. लेकिन जब राजा ने गुप्त रूप से देवी के दर्शन करने का प्रयास किया, तो इसका परिणाम केंदुकलाई को भी भुगतना पड़ा. कथाओं के अलग-अलग संस्करण मौजूद हैं. कुछ कथाएं बताती हैं कि देवी के क्रोध से उनका अंत हो गया,

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