कभी थे गहरे दोस्त, अब कट्टर दुश्मन! America-Iran रिश्तों में आखिर कब और कैसे आ गई दरार? 7 दशकों की पूरी टाइमलाइन
अमेरिका और ईरान आज भले ही कट्टर दुश्मन हों, लेकिन कभी दोनों देशों के रिश्ते बेहद करीबी हुआ करते थे. 1953 की साजिश, 1979 की इस्लामी क्रांति और बंधक संकट ने इस दोस्ती को गहरी दुश्मनी में बदल दिया. पिछले 70 साल में साजिश, प्रतिबंध, युद्ध और परमाणु टकराव ने इन रिश्तों को दुनिया की सबसे बड़ी दुश्मनी में बदल दिया. आइये जानते हैं पूरी टाइमलाइन
US-Iran Relations: अमेरिका और ईरान के रिश्ते आज भले ही गहरी दुश्मनी में बदल चुके हों, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब दोनों देश तेल और हथियारों के कारोबार के कारण बेहद करीबी साझेदार थे. 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद हालात पूरी तरह बदल गए और तब से लेकर आज तक दोनों देशों के संबंध लगातार तनाव और टकराव से भरे रहे हैं.
बंधक संकट, परमाणु कार्यक्रम और प्रॉक्सी वॉर जैसे कई मुद्दों ने इन रिश्तों को और जटिल बना दिया. पिछले करीब 75 सालों में ईरान लगभग हर अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए बड़ी चुनौती बना रहा है. यही वजह है कि वाशिंगटन ने कई जोखिम भरे अंतरराष्ट्रीय अभियान ईरान के खिलाफ चलाए. आइये जानते हैं दोनों देशों के रिश्तों की पूरी टाइमलाइन
1953: पीएम को हटाने की साजिश
1953 में अमेरिका को डर था कि ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेघ देश को आर्थिक संकट में डाल रहे हैं और सोवियत संघ के करीब ले जा सकते हैं. उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइजनहावर ने सीआईए को मोसादेघ को सत्ता से हटाने की मंजूरी दे दी और तख्तापलट हो गया.
1953–1979: शाह के दौर में अमेरिका-ईरान की नजदीकी
इस तख्तापलट के बाद फारसी शासक शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी की ताकत बढ़ गई. इसके साथ ही ईरानी तेल के बदले अमेरिकी हथियारों का बड़ा कारोबार शुरू हुआ. शाह उन गिने-चुने नेताओं में शामिल हो गए जिन्हें लगातार सात अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने व्हाइट हाउस में गर्मजोशी से स्वागत दिया.
1979: इस्लामी क्रांति और रिश्तों का टूटना
1979 में हालात अचानक बदल गए जब शाह को देश छोड़कर भागना पड़ा. जनता उनके शासन से नाराज थी और इसी माहौल में निर्वासन में रह रहे शिया धर्मगुरु आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी सत्ता में आ गए. इस घटना के साथ ही ईरान में अमेरिकी प्रभाव लगभग खत्म हो गया.
इस्लामी क्रांति के करीब दस महीने बाद हजारों ईरानी छात्रों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर हमला कर दिया और अमेरिकी राजनयिकों सहित दर्जनों लोगों को बंधक बना लिया.
1980: बंधक संकट और असफल सैन्य अभियान
बंधकों को छुड़ाने के लिए अमेरिका ने एक गुप्त सैन्य अभियान चलाया, लेकिन यह मिशन असफल रहा और इसमें आठ अमेरिकी सैनिक मारे गए. इस घटना का असर अमेरिकी राजनीति पर भी पड़ा और राष्ट्रपति जिमी कार्टर चुनाव हार गए, जबकि रोनाल्ड रीगन को बड़ी जीत मिली.
1981: बंधकों की रिहाई
रीगन के राष्ट्रपति पद की शपथ लेते ही तेहरान ने कुछ ही मिनटों के भीतर सभी 52 अमेरिकी बंधकों को रिहा कर दिया.
1983: बेरूत में बड़ा हमला
1983 में बेरूत में अमेरिकी सैन्य बैरक पर हमला हुआ, जिसमें 241 अमेरिकी सैनिक मारे गए. इस हमले का आरोप ईरान समर्थित समूहों पर लगाया गया. यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी सेना के लिए एक दिन में सबसे बड़ा जानी नुकसान था.
1981–1986: ईरान-कॉन्ट्रा घोटाला
रीगन प्रशासन के दौरान 'ईरान-कॉन्ट्रा' घोटाला सामने आया. आरोप था कि अमेरिकी प्रशासन ने ईरान समर्थित समूह हिज्बुल्लाह द्वारा पकड़े गए बंधकों को छुड़ाने के लिए गुप्त रूप से तेहरान को टैंक-रोधी और विमान-रोधी मिसाइलें बेचीं. इन सौदों से मिले पैसे को चोरी-छिपे निकारागुआ के कम्युनिस्ट विरोधी विद्रोहियों को भेजा गया.
1989: सलमान रुश्दी के खिलाफ फतवा
जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश के दौर में आयतुल्लाह खुमैनी ने लेखक सलमान रुश्दी के खिलाफ फतवा जारी किया, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ा विवाद पैदा हुआ. सलमान पर आरोप था कि उन्होंने पैगंबर मोहम्मद (स.अ) के खिलाफ अपनी किताब में आपत्तिजनक बातें कही थीं.
1990: खाड़ी युद्ध के दौरान तनाव कम
इराक के साथ लंबे युद्ध से कमजोर हो चुके ईरान ने उस समय ज्यादा हस्तक्षेप नहीं किया, जब अमेरिका ने पहला खाड़ी युद्ध शुरू किया.
1995: कड़े आर्थिक प्रतिबंध
राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने ईरान के खिलाफ सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाए और अमेरिकी कंपनियों को वहां पेट्रोलियम परियोजनाओं में भाग लेने से रोक दिया. साथ ही उन्होंने ऐसे सेकंड्री सेंक्शंस भी लागू किए, जिनसे गैर-अमेरिकी कंपनियों के लिए भी ईरान से व्यापार करना मुश्किल हो गया.
2001: 9/11 हमलों पर ईरान की प्रतिक्रिया
2001 में अमेरिका पर हुए 9/11 हमलों का ईरान से कोई संबंध नहीं था. उस समय ईरान के राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी ने इन हमलों की कड़ी निंदा की थी.
2002: 'एक्सिस ऑफ ईविल' बयान
अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने ईरान को इराक और उत्तर कोरिया के साथ "एक्सिस ऑफ ईविल" का हिस्सा बताया. इसी दौरान यह जानकारी सामने आई कि ईरान दो गुप्त परमाणु केंद्र बना रहा है, जिससे अमेरिका की चिंता और बढ़ गई.
2009: परमाणु कार्यक्रम को रोकने की कोशिश
राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के साथ बातचीत शुरू करने की कोशिश की, लेकिन यह सफल नहीं हो सकी. इसी समय अमेरिका ने 'स्टक्सनेट' नाम का साइबर हमला किया, जिसका मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम के सेंट्रीफ्यूज को नुकसान पहुंचाना था.
ओबामा प्रशासन ने ईरान के तेल निर्यात पर कड़े प्रतिबंध भी लगाए, जिससे वहां आर्थिक संकट और जनता में असंतोष बढ़ गया.
2015: परमाणु समझौता
2015 में ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु समझौता हुआ, जिसे JCPOA कहा गया. इसके तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण की अनुमति देने पर सहमति दी. बदले में अमेरिका ने ईरान की लगभग 100 अरब डॉलर की जमी हुई संपत्ति को मुक्त कर दिया.
2018: ट्रंप ने समझौता रद्द किया
2018 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को खत्म कर दिया और ईरान के तेल निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था पर बड़ा दबाव पड़ा.
2020: कासिम सुलेमानी की हत्या
2020 में ट्रंप के निर्देश पर बगदाद में एक कार पर मिसाइल हमला किया गया, जिसमें ईरान के प्रमुख सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी मारे गए. सुलेमानी को मध्य पूर्व में ईरान के कई गुप्त अभियानों का मुख्य रणनीतिकार माना जाता था.
2023: हमास हमले के बाद तनाव
2023 में हमास द्वारा इजरायल पर किए गए हमले के बाद अमेरिका ने कहा कि ईरान समर्थित समूह उसके सहयोगियों के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं. इसके बाद राष्ट्रपति जो बाइडन ने मध्य पूर्व में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की.
ईरान समर्थित गुटों ने इराक और सीरिया में अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए, जिसके जवाब में अमेरिका ने अगले वर्ष हूती विद्रोहियों के समुद्री हमलों को रोकने के लिए 20 से अधिक देशों का गठबंधन बनाया. आरोप लगे कि हमास को ईरान हथियार देने का काम कर रहा था.
2025: ट्रंप का कड़ा रुख
दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप ने गाजा, लेबनान, सीरिया और यमन में ईरान समर्थित समूहों के खिलाफ इजरायल की सैन्य कार्रवाई का खुलकर समर्थन किया. बाद में उन्होंने ईरान की भूमिगत परमाणु सुविधाओं पर बी-2 स्टील्थ बमवर्षक विमानों से हमले का आदेश दिया और दावा किया कि तीन प्रमुख केंद्रों पर ईरान की परमाणु क्षमता नष्ट कर दी गई है.
2026: सत्ता परिवर्तन की अपील
2026 में ट्रंप ने इजरायल के समर्थन से ईरान पर नए हमलों की घोषणा की और कहा कि ईरान की 8.8 करोड़ जनता को अपनी सरकार बदलने का मौका लेना चाहिए, ट्रंप ने कहा, "इतिहास में कोई भी राष्ट्रपति वह करने के लिए तैयार नहीं था, जो मैं करने के लिए तैयार हूं."
इस तरह पिछले सात दशकों में अमेरिका और ईरान के रिश्ते दोस्ती से दुश्मनी तक पहुंच गए और आज भी यह टकराव वैश्विक राजनीति का एक अहम मुद्दा बना हुआ है.




