EXCLUSIVE: ईरान नहीं ट्रंप के लिए वह कयामत की रात थी, अमेरिका के पालतू ‘पाक’ ने जेडी वेंस से बचाए ‘डैडी डोनाल्ड’...!
ईरान-अमेरिका-इजराइल तनाव के बीच इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता भले ही नाकाम रही, लेकिन इसके बाद कई चौंकाने वाले दावे और अंदर की बातें सामने आई हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि यह टकराव सिर्फ युद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे राजनीति, कूटनीति और वैश्विक समीकरणों का बड़ा खेल भी चल रहा है.
Iran War: ईरान-इजराइल अमेरिका युद्ध के अल्प-विराम में ही बड़ी बड़ी अंदर की बातें निकल कर सामने आ रही हैं. इस्लामाबाद में शांति-बैठक असफल होने के बाद पता चल रहा है कि 7-8 अप्रैल 2026 की जिस रात को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दुनिया को ईरान के लिए “कयामत की रात” बता रहे थे. वह रात तो डोनाल्ड ट्रंप के लिए ही कयामत वाली रात थी.
अब टल चुकी उस संभावित कयामत की रात ट्रंप के कहे अनुसार दुनिया से ईरान नाम की एक मानव सभ्यता मिटने वाली तो थी ही नहीं. अपितु राष्ट्रपति ट्रंप के बयान के एकदम उलट उस रात अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस डोनाल्ड ट्रंप की ही राष्ट्रपति की कुर्सी छीन लेने वाले थे. इसमें अमेरिकी कानून और अमेरिकी कांग्रेस सीनेट का भी सहयोग लिया जाना लगभग तय हो चुका था.
ऊल-जलूल घोषणा क्यों?
ऐसे में सवाल पैदा होना लाजिमी है कि जिस 7-8 अप्रैल 2026 को रात ट्रंप की अपनी ही राष्ट्रपति की कुर्सी खतरे में पड़ी हुई थी. तब फिर वह ईरान नाम की सभ्यता उस रात धरती से मिटाने की ऊल-जलूल घोषणा क्यों कर रहे थे? इस सवाल के जवाब में विदेश नीति, सामरिक, सैन्य रक्षा, कूटनीति और जियोपॉलिटिक्स के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ जो वजह इस्लामाबाद शांति वार्ता निष्फल होने के बाद बता रहे हैं, उन वजहों या इन तर्कों में दम भी नजर आ रहा है.
किस लिए चुना गया इस्लामाबाद?
विशेषज्ञों के इन तमाम तर्कों से सवाल पैदा होना लाजिमी है कि क्या उस रात मंडराते कानूनी-खतरे के चलते खुद की कुर्सी बचाने की खातिर ट्रंप ने अपने पालतू और भारत के लिए ‘नापाक’ पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आनन-फानन में ‘शांति-वार्ता’ बैठक बुलवाने का स्वांग रचा था? अब जब पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आहूत वह शांति-वार्ता भी खटाई में पड़ चुकी है.
क्या डोनाल्ड ट्रंप सेफ हो गए हैं?
तब क्या पाकिस्तान के ‘डैडी’ डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिका में राष्ट्रपति की कुर्सी ‘सेफ’ हो गई है, या फिर उसके ऊपर खतरा अब भी मंडरा रहा है? स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर इनवेस्टीगेशन ने इन्हीं तमाम अहम सवालों के जो विस्तृत और ठोस जवाब अंततराष्ट्रीय संबंधों, विदेश नीति-कूटनीति, सामरिक संबंधों और जियोपॉलिटिक्स व सैन्य-रक्षा संबंध विशेषज्ञ भारतीय थलसेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी ने दिये हैं उन्हें सुनकर कोई भी हैरान जाएगा.
अभी खतरा क्यों नहीं टला है?
बकौल जे एस सोढ़ी, “पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में चली मैराथन शांति-वार्ता बैठक भले ही अंजाम पर न पहुंच सकी हो. इस बैठक ने हाल-फिलहाल जो गर्मा-गर्मी मध्य पूर्व या पश्चिम एशिया में थी उस पर तो अल्प-विराम लगा ही दिया है. अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अगर यह सोच रहे हैं कि वे पूरी तरह से अब अपने बचे बाकी टर्म के लिए राष्ट्रपति की कुर्सी सेफ कर ले गए हैं. तो यह उनकी गलतफहमी होगी. क्योंकि ईरान इस जंग में खुले तौर पर जीत चुका है. बड़बोले ट्रंप साहब तो बस किसी तरह से अपनी कुर्सी और इज्जत बचाने की जद्दोजहद से साम-दाम-दंड-भेद से जूझ रहे हैं.”
शांति-वार्ता से भारत क्या नुकसान हुआ?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, ईरान और इजराइल तीनो ही मिलकर भारत और हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी दोस्त हैं. फिर ईरान और अमेरिका ने शांति-वार्ता के लिए नई दिल्ली का चुनाव न करके भारत के धुर-विरोधी आतंकवाद फैलाने के लिए बदनाम नापाक पाकिस्तान (इस्लामाबाद) को ही क्यों चुना? क्या यह भारत की विदेश नीति, कूटनीति, जियोपॉलिटिक्स, अंतरराष्ट्रीय संबंधों, सैन्य-रक्षा की नजर से दुनिया में नकारात्मक संदेश नहीं है?
मोदी के भारत को अहमियत क्यों नहीं
सवाल के जवाब में जियोपॉलिटिक्स, सैन्य व रक्षा-विशेषज्ञ पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल जेएस सोढ़ी कहते हैं, “नहीं जो हुआ एकदम सही हुआ. भारत ऐसी उम्मीद न तो रखता है न उसे जियोपॉलिटिक्स की नजर से भी रखनी चाहिए कि, यह शांति-वार्ता नई दिल्ली में आयोजित न करके इस्लामाबाद में क्यों की गई? नई दिल्ली में यह शांति-वार्ता आयोजित न होने से यह साबित नहीं होता है कि भारत के ईरान, अमेरिका या इजराइल से संबंध कमजोर थे. या फिर ईरान इजराइल अमेरिका यानी ट्रंप ने भारत या फिर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अहमियत नहीं दी या फिर कम अहमियत दी.
क्या इसलिए भारत को दूर रखा गया?
दरअसल ईरान इजराइल अमेरिका की जिस जंग ने दुनिया को हिलाकर रख दिया हो उस जंग को रुकवाने में क्यों कैसे कौन सा देश शांति-वार्ता के लिए मुनासिब-माफिक होगा. उसके क्या पैमाने होंगे. यह सब ईरान अमेरिका इजराइल को सोचना था. उन्होंने अपनी समझ से जो किया दुनिया और अपने हित में किया. इसमें भारत का कहीं अहित परदे के पीछ रखकर तीनों (ईरान, इजराइल, अमेरिका) ने कुछ नहीं किया है. बात जहां तक है कि पाकिस्तान चूंकि मुस्लिम देश है. ईरान भी मुस्लिम देश है. वहां पीस-मीटिंग की उम्मीद इजराइल-अमेरिका को ज्यादा रही होगी. यह सोचकर कि एक मुस्लिम देश पाकिस्तान दूसरे मुस्लिम देश ईरान को दो यहूदी देशों के खिलाफ जंग रोकने के लिए कौम की नजर से आसानी से समझा लेगा. जबकि भारत लोकतांत्रिक हिंदू राष्ट्र सा है. इसलिए उसे ईरान इजराइल अमेरिका के बीच समझौता कराने के लिए नहीं चुना गया.
जंग में ‘जातीयता’ नीचे क्यों होती है?
विदेश-नीति, कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और जियोपॉलिटिक्स में जातीयता से ज्यादा मुद्दों-तथ्यों को अहमियत दी जाती है. यह कोई किसी त्योहार विशेष की पार्टी नहीं थी. यह उस अहम ज्वसलंत मुद्दे पर शांति-वार्ता बैठक थी जिसकी वजह से दुनिया कांप उठी है. पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व की शांति बम बंदूक गोला-बारुद, फाइटर जेट और मिसाइलों के हमलों कानफोड़ू आवाजों ने छीन ली है. यह वह नाजुक वक्त है जब दो दुश्मन देश (इजराइल अमेरिका) एक देश (ईरान) के ऊपर ‘महाकाल’ बनकर सिर्फ और सिर्फ मौत का नंगा नाच करके बेकसूरों की लाशें बिछाने पर आमादा हैं. ऐसे में सोचिए जात-पांत, जातीयता, धर्म की बात देखी-सोची जाए या फिर शांति की स्थापना और जंग को रोकने का रास्ता खोजना प्राथमिक विषय होना चाहिए.
कौम की बात थी तो पाकिस्तान...?
स्टेट मिरर हिंदी के एक सवाल के जवाब में पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी कहते हैं, “जात-पांत, कौम, धर्म के नाम की रोटियां सेकने वाले समाज में मौजूद कुछ मूढ़ बुद्धि के लोगों की बात पर ही अगर विचार कीजिए तो फिर सवाल यह पैदा होता है कि, ईरान और पाकिस्तान दोनो ही मुस्लिम कंट्री हैं. फिर भी ईरान ने पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आयोजित शांति वार्ता की मेज पर आखिर क्यों अमेरिकी हर बात मानने से साफ इंकार कर दिया. क्यों अमेरिका का खास पाकिस्तान या पाकिस्तान का खास अमेरिका, मुस्लिम देश ईरान से अपनी हर शर्त नहीं मनवा सके. मतलब साफ है कि बात नाक की जंग में जब शांति अमन चैन की थी. तो फिर उसमें कोई कौम क्या करेगी?
मुद्दे अहम कौम पीछे, कैसे बचा भारत?
इस्लामाबाद में आयोजित ईरान-इजराइल-अमेरिका के बीच शांति-समझौता वार्ता में कौम को अगर प्राथमिकता दी गई होती तब तो, अमेरिका के इशारे पर उसके चहेते पाकिस्तान की हर बात ईरान को मान लेनी चाहिए थी. साफ है कि शांति-वार्ता बैठ में जंग के कारण और मुद्दे अहम थे. ईरान, अमेरिका की तमाम मुद्दों पर आपसी सहमति नहीं बन सकी. इसलिए मुस्लिम कंट्री पाकिस्तान में भी आयोजित शांति-वार्ता बिना किसी अंजाम पर पहुंचे ही खत्म हो गई. ऐसे में भारत का इस शांति वार्ता में हिस्सा न लेना या नई दिल्ली में शांति वार्ता का आयोजन न किया जाना कोई मायने ही नहीं रखता है.”




