भारत के लिए ‘हीट’ का रेड अलर्ट! ऑक्सफोर्ड स्टडी का खुलासा, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, पाकिस्तान पर भी खतरा
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की स्टडी ने भारत समेत दक्षिण एशिया के लिए हीट रेड अलर्ट जारी किया है. रिपोर्ट के मुताबिक 2050 तक दुनिया की आधी आबादी जानलेवा गर्मी के खतरे में होगी.
लू के थपेड़े, पसीने में डूबे शहर और अस्पतालों में बढ़ती भीड़, सिर्फ मौसम की मार नहीं, बल्कि चेतावनी है. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक अहम स्टडी ने भारत के लिए खतरे की घंटी बजा दी है. रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के चलते दक्षिण एशिया के कई देश भीषण गर्मी की चपेट में आ रहे हैं, जहां तापमान अब सिर्फ असहज नहीं, बल्कि जानलेवा बनता जा रहा है. भारत के साथ-साथ इंडोनेशिया, बांग्लादेश और पाकिस्तान में हीटवेव से होने वाली बीमारियों और मौतों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है.
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के एक नए अध्ययन में चेतावनी दी है कि तेजी से बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग से अगले कुछ दशकों में अरबों लोग खतरनाक रूप से हीट चपेट में आ सकते हैं. स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक अगर औसत ग्लोबल तापमान औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाता है, जिसे वैज्ञानिक तय मानकर चल रहे हैं, तो 2050 तक लगभग 3.79 अरब लोग (लगभग दुनिया की आधी आबादी) भीषण गर्मी की वजह से खतरे में होगी.
रिसर्चर्स ने चेतावनी दी है कि गंभीर प्रभाव उस समय से काफी पहले ही दिखने लगेंगे. जैसे-जैसे ग्लोबल तापमान पेरिस पैक्ट में तय 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा के करीब पहुंचेगा, गर्मी का असर लोगों पर तेजी से से बढ़ने लगेगा.
2010 से 2050 तक कैसे बदले हालात?
साल 2010 में, भीषण गर्मी ने दुनिया की लगभग 23% आबादी को प्रभावित किया था. नेचर सस्टेनेबिलिटी जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार यह आंकड़ा निकट भविष्य में 41% तक पहुंच सकता है.
भारत समेत ये देश सबसे ज्यादा जोखिम में
आक्सफोर्ड स्टडी के अनुसार गर्मी के असर में विशेष रूप से तेजी से वृद्धि होने का अनुमान है, जिसमें सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, बांग्लादेश, नाइजीरिया, दक्षिण सूडान, लाओस और ब्राज़ील शामिल हैं. इस बीच, सबसे ज्यादा प्रभावित लोग भारत, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नाइजीरिया और फिलीपींस जैसे घनी आबादी वाले देशों में होंगे.
ठंडे देश भी नहीं बचेंगे
स्टडी रिपोर्ट में इस बात का भी अनुमान है कि तापमान में बढ़ोतरी से ठंडी जलवायु वाले देश भी सुरक्षित नहीं रहेंगे. 2006-2016 के स्तरों की तुलना में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से ऑस्ट्रिया और कनाडा में गर्म दिनों की संख्या दोगुनी हो सकती है. यूके, स्वीडन और फिनलैंड में लगभग 150% की वृद्धि देखी जा सकती है. जबकि नॉर्वे और आयरलैंड में 200% या उससे अधिक की वृद्धि हो सकती है.
समाधान क्या है?
साल 2050 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन के ग्लोबल लक्ष्य को हासिल करने के लिए रियल एस्टेट को डीकार्बनाइज करना होगा. साथ ही असरदार और मजबूत एडैप्टेशन स्ट्रैटेजी भी बनानी होंगी.
हेल्थ, एजुकेशन और फार्मिंग सेक्टर को सबसे ज्यादा नुकसान
ऑक्सफोर्ड के एक्सपर्ट्स ने कहा कि 1.5°C से ज़्यादा गर्मी बढ़ने से स्वास्थ्य, शिक्षा, खेती और माइग्रेशन पर दूरगामी नतीजे हो सकते हैं, जबकि कूलिंग और एनर्जी की ग्लोबल डिमांड में तेज़ी से बढ़ोतरी होगी.
सभी के लिए वेकअप कॉल
ऑक्सफोर्ड मार्टिन फ्यूचर ऑफ कूलिंग प्रोग्राम की लीडर डॉ. राधिका खोसला ने कहा कि यह स्टडी सभी के लिए एक 'वेक-अप कॉल' होनी चाहिए. 1.5°C से ज्यादा गर्मी बढ़ने का शिक्षा और स्वास्थ्य से लेकर माइग्रेशन और खेती तक हर चीज पर बहुत ज्यादा असर पड़ेगा. नेट जीरो सस्टेनेबल डेवलपमेंट ही हमेशा गर्म होते दिनों के इस ट्रेंड को पलटने का एकमात्र पक्का रास्ता है. यह जरूरी है कि राजनेता इस दिशा में पहल करें.





