पहले गोली मरेंगे फिर सवाल पूछेंगे- यह बाकायदा Law भी है! डेनमार्क ने ट्रंप को दिन में दिखाए तारे
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump एक बार फिर Greenland को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य बता रहे हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ग्रीनलैंड की पूरी आबादी को आर्थिक प्रोत्साहन देकर अमेरिका से जोड़ने के विकल्प पर विचार कर रहा है. इस बीच Denmark ने कड़ा रुख अपनाते हुए चेतावनी दी है कि संप्रभुता पर हमला हुआ तो “पहले गोली चलेगी, बाद में सवाल होंगे.” व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव Karoline Leavitt के बयान के बाद यह मुद्दा यूरोप, आर्कटिक और NATO तक चर्चा का विषय बन गया है.
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump एक बार फिर ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामक रुख में दिख रहे हैं. ट्रंप प्रशासन ग्रीनलैंड को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए “अनिवार्य” बताता रहा है. अब इस जरूरत को पूरा करने के लिए अमेरिका ने ऐसा विकल्प सामने रखा है, जिसने यूरोप से लेकर आर्कटिक तक तनाव बढ़ा दिया है. इसके बाद डेनमार्क के आए बयान ने ट्रंप को चिंता में डाल दिया. डेनमार्क के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि अगर कोई ग्रीनलैंड को अपनाने की कोशिश करेगा तो पहले गोली मारेंगे फिर सवाल पूछेंगे. इसके बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मच गई है.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने ग्रीनलैंड की पूरी आबादी को आर्थिक प्रोत्साहन देकर अपने साथ जोड़ने के विकल्प पर चर्चा की है. ग्रीनलैंड की करीब 57 हजार आबादी के लिए प्रति व्यक्ति 10,000 से लेकर 1,00,000 डॉलर तक की राशि पर विचार हुआ है. इस हिसाब से कुल खर्च करीब 6 बिलियन डॉलर तक जा सकता है. यह प्रस्ताव किसी जमीन की खरीद नहीं, बल्कि लोगों की सहमति को ‘डील’ में बदलने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. वही डेनमार्क ने जो बयान दिया है वो उनके यहां लॉ में भी है.
हर विकल्प खुला
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव Karoline Leavitt पहले ही संकेत दे चुकी हैं कि ट्रंप और उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम यह देख रही है कि “संभावित खरीद” कैसी दिखेगी. प्रशासनिक हलकों में यह भी कहा गया कि अगर कूटनीतिक या आर्थिक रास्ते काम नहीं आए, तो सैन्य विकल्प भी खारिज नहीं किए गए हैं. यही बयान यूरोप के लिए सबसे ज्यादा चिंता की वजह बना.
पहले गोली, फिर सवाल: डेनमार्क
ग्रीनलैंड पर अमेरिकी रुख से नाराज़ Denmark ने बेहद सख्त चेतावनी दी है. डेनमार्क के रक्षा मंत्रालय से जुड़े बयान में कहा गया कि अगर ग्रीनलैंड की संप्रभुता पर हमला हुआ, तो “पहले गोली चलेगी, बाद में सवाल होंगे.” यह बयान महज शब्द नहीं, बल्कि 1952 के सैन्य नियमों का हवाला देकर दिया गया, जिसमें सैनिकों को बिना आदेश के आक्रमणकारियों पर कार्रवाई की अनुमति है.
क्या है 1952 का डेनिश सैन्य निर्देश?
ग्रीनलैंड को लेकर संयुक्त राज्य अमेरिका और डेनमार्क के बीच बढ़ते तनाव के बीच डेनमार्क ने अपने एक पुराने लेकिन बेहद अहम सैन्य निर्देश को सार्वजनिक किया है. यह निर्देश वर्ष 1952 का है और कोई अंतरराष्ट्रीय संधि या कानून नहीं, बल्कि डेनिश सेना के लिए बनाया गया एक आंतरिक सैन्य नियम है. इसके तहत किसी भी आक्रमण की स्थिति में सैनिकों को बिना किसी वरिष्ठ अधिकारी के आदेश का इंतजार किए तुरंत जवाबी कार्रवाई करने का अधिकार दिया गया है.
शीत युद्ध के समय हुआ था तैयार
यह निर्देश शीत युद्ध के दौर में तैयार किया गया था, जब यूरोप में सुरक्षा को लेकर गहरी आशंकाएं थीं. खासतौर पर द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजी जर्मनी द्वारा डेनमार्क पर कब्जे के अनुभव के बाद डेनमार्क ने यह नियम बनाया, ताकि भविष्य में किसी भी विदेशी हमले की स्थिति में सेना को निर्णय लेने में देरी न हो. नियम के अनुसार, यदि डेनिश क्षेत्र जिसमें ग्रीनलैंड भी शामिल है. पर हमला होता है, तो सैनिक तुरंत लड़ाई शुरू करेंगे और इसके लिए उन्हें ऊपर से आदेश मिलने की जरूरत नहीं होगी.
यूरोप की एकजुट चेतावनी
डेनमार्क अकेला नहीं है. फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन और ब्रिटेन समेत कई यूरोपीय देशों ने संयुक्त बयान जारी कर अमेरिका को चेताया. बयान में साफ कहा गया कि ग्रीनलैंड के भविष्य का फैसला केवल वहां के लोग करेंगे. कुछ नेताओं ने तो यहां तक कहा कि अगर ग्रीनलैंड की संप्रभुता को चुनौती दी गई, तो NATO जैसे गठबंधनों की एकता पर भी सवाल खड़े हो जाएंगे.
अमेरिका को ग्रीनलैंड क्यों चाहिए?
ग्रीनलैंड सिर्फ बर्फ का टुकड़ा नहीं, बल्कि रणनीतिक और आर्थिक खजाना है. यहां मौजूद रेयर अर्थ मिनरल्स आधुनिक टेक्नोलॉजी मोबाइल, बैटरी, इलेक्ट्रिक कार और रक्षा उपकरणों के लिए बेहद अहम हैं. फिलहाल इन खनिजों की सप्लाई पर चीन का दबदबा है, जिसे अमेरिका तोड़ना चाहता है. इसके अलावा आर्कटिक क्षेत्र में ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति उसे सैन्य और नौवहन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है.
इतिहास भी रहा है कब्जे का गवाह
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर सैन्य मौजूदगी बनाई थी, ताकि नाजी जर्मनी वहां न पहुंच सके. शीत युद्ध में भी ग्रीनलैंड अमेरिका की रणनीति का अहम हिस्सा रहा. अब जलवायु परिवर्तन के चलते आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है, नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं और संसाधनों पर वैश्विक प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है. यही वजह है कि ग्रीनलैंड फिर महाशक्तियों की नजर में है.
बातचीत की कोशिश
तनाव के बीच डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेताओं ने संवाद का रास्ता भी चुना है. डेनमार्क के विदेश मंत्री Lars Lokke Rasmussen ने अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio से बातचीत की मांग की है. ग्रीनलैंड की विदेश मंत्री Vivian Motzfeldt ने भी कहा कि वार्ता का उद्देश्य अमेरिकी बयानों पर स्पष्टता लाना है.





