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ट्रंप ने तोड़ा भारत से रिश्ता! इंटरनेशनल सोलर अलायंस समेत 65 ग्रुप से कर लिया किनारा, अमेरिका ने क्यों लिया ये फैसला?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत बड़ा फैसला लेते हुए भारत और फ्रांस की अगुवाई वाली इंटरनेशनल सोलर अलायंस समेत 65 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका को बाहर कर लिया है. व्हाइट हाउस का कहना है कि ये संस्थाएं अमेरिकी संप्रभुता और आर्थिक हितों के खिलाफ काम कर रही थीं. इस कदम से वैश्विक सहयोग, जलवायु नीति और बहुपक्षीय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.

ट्रंप ने तोड़ा भारत से रिश्ता! इंटरनेशनल सोलर अलायंस समेत 65 ग्रुप से कर लिया किनारा, अमेरिका ने क्यों लिया ये फैसला?
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( Image Source:  X/POTUS )
नवनीत कुमार
Edited By: नवनीत कुमार

Updated on: 8 Jan 2026 8:09 AM IST

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि उनकी विदेश नीति सहयोग से ज़्यादा नियंत्रण और स्वार्थ पर टिकी है. हालिया मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर कर ट्रंप प्रशासन ने 65 से अधिक अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका को अलग करने का फैसला किया है. यह कदम किसी एक संस्था तक सीमित नहीं, बल्कि उस पूरी वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देता है, जो दशकों से बहुपक्षीय सहयोग का प्रतीक रही है. इस फैसले ने वॉशिंगटन से लेकर नई दिल्ली और पेरिस तक हलचल मचा दी है.

इस फैसले का सबसे बड़ा प्रतीकात्मक असर भारत और फ्रांस के नेतृत्व वाले International Solar Alliance से अमेरिका का हटना माना जा रहा है. यह सिर्फ एक पर्यावरणीय मंच से बाहर निकलना नहीं है, बल्कि जलवायु और स्वच्छ ऊर्जा जैसे वैश्विक मुद्दों पर अमेरिका की प्रतिबद्धता पर भी सवाल खड़े करता है. ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि ऐसे मंच अमेरिकी आर्थिक हितों और संप्रभुता को सीमित करते हैं. लेकिन आलोचक इसे भारत जैसे साझेदार देशों के लिए कूटनीतिक झटका मान रहे हैं.

किन संगठनों से हट रहा है अमेरिका

व्हाइट हाउस के मुताबिक, यह फैसला 35 गैर-संयुक्त राष्ट्र और 31 संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी संस्थाओं पर लागू होगा. इनमें पर्यावरण, विकास, जनसंख्या और जल जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली संस्थाएं शामिल हैं. प्रशासन का कहना है कि ये संगठन या तो “अप्रभावी” हैं या “ग्लोबलिस्ट एजेंडा” को आगे बढ़ाते हैं. इस सूची ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका अब वैश्विक शासन की मौजूदा संरचना से खुद को अलग करना चाहता है.

मार्को रूबियो का बयान

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने इस फैसले को पूरी मजबूती से सही ठहराया. उन्होंने कहा कि अमेरिका अब “नौकरशाही और अमेरिका-विरोधी संस्थानों” पर पैसा खर्च नहीं करेगा. रूबियो के शब्दों में, यह कदम अमेरिकी करदाताओं के “खून-पसीने की कमाई” को बचाने के लिए जरूरी है. यह बयान बताता है कि ट्रंप प्रशासन इसे सिर्फ नीति बदलाव नहीं, बल्कि वैचारिक लड़ाई के तौर पर देख रहा है.

संप्रभुता VS वैश्विक सहयोग

ट्रंप के मेमोरेंडम में बार-बार ‘संप्रभुता’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है. प्रशासन का मानना है कि कई अंतरराष्ट्रीय संगठन अमेरिकी नीतियों पर बाहरी दबाव बनाते हैं. जलवायु, लैंगिक समानता और सामाजिक नीतियों जैसे मुद्दों पर वैश्विक मानक तय करना, ट्रंप टीम की नजर में, राष्ट्रीय हितों में दखल है. यही वजह है कि यह फैसला केवल आर्थिक नहीं, बल्कि वैचारिक टकराव का नतीजा भी है.

संयुक्त राष्ट्र प्रणाली पर असर

संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी जिन संस्थाओं से अमेरिका हट रहा है, उनमें विकास, ऊर्जा और जनसंख्या से जुड़े अहम मंच शामिल हैं. अमेरिका की फंडिंग और भागीदारी के बिना इन संस्थाओं की प्रभावशीलता पर सवाल उठना तय है. जानकारों का मानना है कि इससे वैश्विक दक्षिण के देशों पर सीधा असर पड़ेगा, जो इन मंचों पर अमेरिकी समर्थन पर निर्भर रहे हैं. यह कदम संयुक्त राष्ट्र की पहले से कमजोर होती विश्वसनीयता को और झटका दे सकता है.

भारत और फ्रांस के लिए क्या मायने?

भारत के लिए यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि इंटरनेशनल सोलर अलायंस नई दिल्ली की प्रमुख कूटनीतिक पहल रही है. अमेरिका का बाहर जाना इस मंच की ताकत को कम कर सकता है, लेकिन साथ ही भारत के लिए नेतृत्व की भूमिका और मजबूत करने का मौका भी है. फ्रांस के साथ मिलकर भारत अब यह दिखा सकता है कि वैश्विक सहयोग अमेरिका के बिना भी आगे बढ़ सकता है.

वैश्विक राजनीति में बदलता संतुलन

इस फैसले को सिर्फ ट्रंप की सनक कहकर खारिज करना आसान है, लेकिन इसके दीर्घकालिक असर गहरे हो सकते हैं. अमेरिका का यह कदम संकेत देता है कि आने वाले समय में वैश्विक व्यवस्था ज्यादा बिखरी और प्रतिस्पर्धी होगी. बहुपक्षीय संस्थानों की जगह द्विपक्षीय समझौते और ताकत आधारित राजनीति हावी हो सकती है.

क्या यह ‘डि-ग्लोबलाइजेशन’ की शुरुआत है?

विश्लेषकों के मुताबिक, ट्रंप का यह फैसला ‘डि-ग्लोबलाइजेशन’ की दिशा में एक बड़ा कदम है. जहां एक दौर में अमेरिका वैश्विक संस्थाओं का नेतृत्व करता था, अब वही देश उनसे दूरी बना रहा है. यह बदलाव सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अन्य देशों को भी अपने हितों को नए सिरे से परिभाषित करने पर मजबूर करेगा.

आगे की तस्वीर क्या कहती है?

अमेरिका का 65 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अलग होना एक स्पष्ट संदेश है. वॉशिंगटन अब नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था का बोझ उठाने को तैयार नहीं. सवाल यह है कि क्या बाकी दुनिया इस खाली जगह को भर पाएगी या फिर वैश्विक सहयोग का ढांचा कमजोर पड़ जाएगा. ट्रंप का यह कदम इतिहास में एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज हो सकता है, जहां से अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदलनी शुरू हुई.

डोनाल्ड ट्रंपवर्ल्‍ड न्‍यूज
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