Explainer: मिसाइल, तेल और महाशक्तियों का खेल: क्यों उलझा है अमेरिका? ईरान पर हमले से पहले क्या है डर
अमेरिका लड़ाई जीत सकता है, पर उसके आर्थिक परिणाम सुपरपावर और वहां की जनता के लिए विनाशकारी साबित होंगे. हो सकता है कि अमेरिका इस मामले में जैसे यूक्रेन में रूस फंस गया, उसी तरह लंबी लड़ाई में फंस जाए. ऐसा इसलिए कि ईरान को चीन और रूस का सपोर्ट मिल सकता है.
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच सवाल फिर वही है, क्या अमेरिका ईरान पर सीधा हमला करेगा? एक ओर ईरान की मिसाइल ताकत, परमाणु कार्यक्रम और रणनीतिक समुद्री मार्गों पर पकड़ है, तो दूसरी ओर अमेरिका की सैन्य मौजूदगी और वैश्विक नेतृत्व की साख दांव पर है. लेकिन हमले से पहले डर सिर्फ सैन्य टकराव का नहीं, बल्कि तेल बाजार, क्षेत्रीय युद्ध, महाशक्तियों की दखल और घरेलू राजनीति के असर का भी है. यही वजह है कि ईरान का मामला सिर्फ दो देशों का नहीं, बल्कि वैश्विक संतुलन का है.
तनाव की मूल वजह क्या?
ईरान और अमेरिका के बीच टकराव की जड़ें 1979 की इस्लामी क्रांति, परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव की प्रतिस्पर्धा में हैं. अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके प्रॉक्सी नेटवर्क (हिजबुल्लाह हूती, इराकी मिलिशिया) को खतरा मानता है. जबकि ईरान मध्य पूर्व के देशों में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को अपनी संप्रभुता और सुरक्षा के लिए चुनौती समझता है.
1. अमेरिका vs ईरान : किसकी युद्ध तैयारी ज्यादा मजबूत?
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच सवाल उठता है कि अमेरिका और ईरान आमने-सामने आ जाएं तो किसकी तैयारी भारी पड़ेगी? आंकड़े बताते हैं कि सैन्य बजट और तकनीक में अमेरिका आगे है, लेकिन ईरान की मिसाइल-ड्रोन रणनीति और प्रॉक्सी नेटवर्क युद्ध मामले को जटिल बना सकते हैं.
अमेरिकी रक्षा बजट $850 से 900 अरब तो ईरान की $20 से 30 अरब. अमेरिका के पास सक्रिय सैन्य बल 13 लाख तो ईरान के पास ईरान के पास 6 लाख जिसमें IRGC के जवान भी शामिल हैं. अमेरिका के पास घातक एयरक्राफ्ट कैरियर 11 हैं. ईरान के पास शून्य. अमेरिका के पास कुल सैन्य विमान 13,000 से ज्यादा, जबकि ईरान के पास 300 से 400. अमेरिका के पास बैलिस्टिक मिसाइ की कई रेंज हैं तो ईरान के पास क्षेत्रीय रेंज की करीब 3000 मिसाइल है. यूएस के पास परमाणु हथियार5,200+ वारहेड हैं. जबकि ईरान के पास आधिकारिक रूप से कोई कार्यक्रम नहीं है. सुपर पावर के साथ सहयोगी नेटवर्क NATO, एशिया-पैसिफिक है तो ईरान के सहयोगी उसके प्रॉक्सी समूह: हिजबुल्लह, हूती मूवमेंट है. समुद्री ताकत की बात करें तो ईरान अमेरिका के सामने कहीं नहीं ठहरता है. अमेरिका के पास वैश्विक ब्लू-वॉटर नेवी है. ईरान के पास सिर्फ क्षेत्रीय स्ट्रेट होर्मुज है, जिसे युद्ध होने पर बंद कर सकता है.
कुल मिलाकर अमेरिका के पास 70 से ज्यादा देशों में सैन्य बेस है. 11 एयरक्राफ्ट कैरियर हैं. भूमि, समुद्र और वायु से हमला करने की परमाणु क्षमता है. इसके उलट, ईरान के पास मिसाइल-ड्रोन फोकस क्षेत्रीय स्तर के हैं. ईरान की स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर पकड़ है. यानी अमेरिका ईरान के बीच सीधे टकराव में अमेरिका तकनीकी-सैन्य बढ़त रखता है, लेकिन ईरान “असममित रणनीति” से क्षेत्रीय लागत बढ़ा सकता है.
2. मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य अड्डे खतरे में क्यों?
अमेरिका के कतर, बहरीन, कुवैत, इराक, यूएई, सऊदी अरब, जॉर्डन, सीरिया सहित 11 देशों में सैन्य ठिकाने हैं. ये बेस ईरान की मिसाइल और ड्रोन रेंज में आते हैं. खासकर कतर कतर और बहरीन में अमेरिकी नौसैनिक और वायुसेना की बड़ी मौजूदगी है, जो किसी संघर्ष की स्थिति में ईरान के खिलाफ प्राथमिक लक्ष्य बन सकते हैं.
3. भू-राजनीतिक महत्व और जोखिम क्या?
मध्य पूर्व वैश्विक पूरी दुनिया के लिए ऊर्जा आपूर्ति का केंद्र है. स्ट्रेट होर्मुज से दुनिया का लगभग 20% तेल गुजरता है. यहां संघर्ष का मतलब है वैश्विक ऊर्जा संकट. ईरान की भौगोलिक स्थिति उसे समुद्री मार्गों और क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन में अहम बनाती है.
4. क्षेत्रीय युद्ध का खतरा कैसे बढ़ सकता है?
यदि अमेरिका-ईरान के बीच सीधा हमला होता है, तो इजराइल, लेबनान, इराक, यमन और सीरिया जैसे देश इसमें खिंच सकते हैं. प्रॉक्सी मिलिशिया के जरिए ईरान अप्रत्यक्ष जवाब दे सकता है, जिससे संघर्ष सीमित न रहकर क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है. ऐसा हुआ तो ईरान कतर, बहरीन, कुवैत, इराक, यूएई, सऊदी अरब, जॉर्डन, सीरिया सहित 11 देशों पर हमला बोलने से बाज नहीं आएगा. ये सभी देश ईरान के मिसाइल रेंज में है.
5. ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अस्थिरता क्यों?
ईरान का परमाणु कार्यक्रम अंतरराष्ट्रीय निगरानी के दायरे में है. 2018 में अमेरिका के ज्वाइंट कॉम्प्रीहेंसिव प्लान आफ एक्शन से बाहर निकलने के बाद तनाव बढ़ा. पश्चिमी देशों का दावा है कि ईरान संवर्धित यूरेनियम की मात्रा बढ़ा चुका है. हालांकि, ईरान परमाणु हथियार बनाने से इनकार करता है.
6. युद्ध होने पर आर्थिक असर क्या हो सकता है?
अमेरिका ईरान के बीच किसी भी बड़े टकराव से कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है. वैश्विक शेयर बाजार, शिपिंग रूट और सप्लाई चेन प्रभावित होंगे. अमेरिका को भी रक्षा खर्च, तेल महंगाई और घरेलू आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है.
7. ईरान की सैन्य क्षमता और जवाबी ताकत क्या है?
ईरान के पास 3,000 से अधिक बैलिस्टिक मिसाइलें होने का अनुमान है, जिनकी मारक क्षमता 300 से 2,000 किलोमीटर तक है. साथ ही ड्रोन तकनीक और साइबर क्षमताएं उसकी असममित युद्ध रणनीति का हिस्सा हैं. पारंपरिक सेना के मुकाबले वह ‘हिट एंड रन’ और प्रॉक्सी मॉडल पर ज्यादा निर्भर करता है.
8. क्या चीन और रूस ईरान का देंगे साथ?
चीन और रूस अमेरिका की ओर से युद्ध शुरू करने पर ईरान के साथ रणनीतिक रिश्ते बनाए रखेंगे. ईरान का साथ देंगे. हालांकि, दोनों देश सीधे सैन्य हस्तक्षेप से बच सकते हैं, लेकिन कूटनीतिक समर्थन, हथियार तकनीक या आर्थिक सहयोग के जरिए अप्रत्यक्ष मदद संभव है. ऐसा इसलिए, अमेरिका ईरान पर हमला बोलता है तो चीन और रूस अमेरिका से यूक्रेन वाला बदला ले सकते हैं.
9. अमेरिका की घरेलू राजनीति और ‘युद्ध थकान’
अमेरिका में अफगानिस्तान और इराक युद्ध के बाद जनता में ‘वॉर फटीग’ (युद्ध थकान) देखी गई है. लंबे और महंगे युद्ध से घरेलू राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है. चुनावी सालों में कोई भी प्रशासन बड़े सैन्य अभियान को लेकर सतर्क रहता है.
10. “डिटरेंस” की रणनीति क्या है?
डिटरेंस यानी ‘निरोधक शक्ति’, जिसमें दोनों पक्ष अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन कर सामने वाले को हमले से रोकते हैं. अमेरिका और ईरान दोनों प्रत्यक्ष युद्ध से बचते हुए ताकत दिखाने की नीति पर काम कर रहे हैं. ताकि पूर्ण युद्ध टाला जा सके, लेकिन रणनीतिक दबाव बना रहे. अमेरिका चाहता है कि ईरान न केवल परमाणु कार्यक्रम बंद करे. साथ ही अपना मिसाइल कार्यक्रम भी रोके. ईरान मिसाइल कार्यक्रम को रोकने के लिए किसी भी कीमत पर तैयार नहीं है. यही दोनों के बीच ताजा विवाद का कारण है.
ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल ट्रंप के लिए खतरा क्यों?
ईरान के पास दुनिया का बड़ा मिसाइल स्टोरेज है, जिसमें हजारों बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें हैं. ये मिसाइलें ठोस ईंधन वाली हैं, जो जल्दी लॉन्च हो सकती हैं. ईरान के पास मौजूद मुख्य मिसाइलों की अनुमानित रेंज इस प्रकार हैं.
1. देजफुल (Dezful)
ईरान की छोटी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसकी रेंज लगभग 1000 किलोमीटर है. यह इराक और खाड़ी देशों जैसे पड़ोसी इलाकों को आसानी से निशाना बना सकती है. देजफुल को ठोस ईंधन से चलाया जाता है, जो इसे तेजी से लॉन्च करने में मदद करता है.
2. फतह-1, हज कासेम और खैबर शेकन
यह मध्यम रेंज वाली हैं, जिनकी पहुंच 1400 किलोमीटर तक है. ये सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे देशों तक पहुंच सकती हैं. फतह-1 को हाइपरसोनिक मिसाइल कहा जाता है, जो दुश्मन की मिसाइल रक्षा प्रणालियों को चकमा दे सकती है.
3. हज कासेम और खैबर शेकन
हज कासेम और खैबर शेकन भी उन्नत तकनीक वाली हैं, जो सटीक हमले के लिए डिजाइन की गई हैं. ये मिसाइलें ईरान की IRGC (इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) द्वारा विकसित की गई हैं.
4. एमाद (Emad) और गदर-1 (Ghadr-1)
एमाद (Emad) और गदर-1 (Ghadr-1) मिसाइलें और भी एडवांस हैं, जिनकी रेंज 1700 किलोमीटर है. गदर-1 की रेंज 1600 से 1950 किलोमीटर तक है. ये इजरायल और जॉर्डन जैसे दूर के लक्ष्यों तक पहुंच सकती हैं. एमाद को शाहाब-3 का बेहतर वर्जन माना जाता है, जिसमें बेहतर सटीकता और मार्गदर्शन प्रणाली है. गदर-1 भी तरल ईंधन वाली है और भारी वॉरहेड ले जा सकती है, जो इसे घातक बनाती है. ये मिसाइलें ईरान के मध्यम दूरी के बैलिस्टिक प्रोग्राम का मुख्य हिस्सा हैं.
5. खोर्रमशहर (Khorramshahr) और सेज्जिल (Sejjil)
खोर्रमशहर और सेज्जिल मिसाइलें ईरान की सबसे लंबी रेंज वाली हैं, जिनकी पहुंच 2000 किलोमीटर तक है. ये पूरे मध्य पूर्व को कवर कर सकती हैं और 1500 किलो वॉरहेड ले जाने में सक्षम हैं. खोर्रमशहर-4 का हाल ही में तैनाती की गई है, जो भूमिगत 'मिसाइल सिटी' में रखी जाती है. सेज्जिल दो चरण वाली ठोस ईंधन मिसाइल है, जो तेजी से लॉन्च हो सकती है. ये मिसाइलें ईरान की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं. अमेरिकी तथा इजरायली ठिकानों को खतरा पैदा कर सकती हैं.
ईरान की रेंज में प्रमुख अमेरिकी सैन्य अड्डे
एएफपी मैप के मुताबिक अमेरिकी अड्डे मध्य पूर्व में फैले हुए हैं. ये अड्डे अमेरिकी सैनिकों, विमानों और जहाजों का घर हैं. ईरान की मिसाइलें इन तक पहुंच सकती हैं. कतर, इराक, कुवैत, बहरीन, यूएई, सीरिया, जॉर्डन,सऊदी अरब, ओमान और यमन सहित एक दर्जन देश इसके जद में आते हैं.
1. अल उदेद एयर बेस कतर
अमेरिकी सेंट्रल कमांड का मुख्यालय हैं. यहां पर 10,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं. यह ईरान के 1400 किलोमीटर रेंज वाली मिसाइलों के निशाने पर है.
2. ऐन अल-असद एयर बेस इराक
इराक में मुख्य अमेरिकी अड्डा, पहले ईरान ने हमला किया था. यह सैन्य बेस ईरान के 1000 किलोमीटर वाली मिसाइल की रेंज में है.
3. कैंप अरिफजान और अली अल सलेम एयर बेस कुवैत
यह अमेरिकी सैन्य बेस उसकी सेना के साजो सामान का और विमानों का केंद्र है. खाड़ी में मौजूद इस अड्डे को ईरान आसानी से निशाना बना सकता है.
4. यूएस नेवल सपोर्ट एक्टिविटी बहरीन
बहरीन में स्थित यह बेस अमेरिकी पांचवीं फ्लीट का आधार प्वाइंट है. यह जहाजों का मुख्यालय है. यह ईरान की 1400 किलोमीटर वाली मिसाइल रेंज में है.
5. अल धफरा एयर बेस यूएई
यह अमेरिकी खुफिया और लड़ाकू विमानों का केंद्र है. यहां ईरान की 2000 किलोमीटर रेंज वाली मिसाइलें पहुंच सकती हैं.
6. अन्य अड्डे
सीरिया में अमेरिकी ठिकाने, जॉर्डन में टावर 22, सऊदी अरब में प्रिंस सुल्तान एयर बेस, ओमान और यमन के पास के क्षेत्र भी यूएस के सैन्य अड्डे हैं, जो ईरान के 2000 किलोमीटर वाली मिसाइल रेंज में है. खास बात यह है कि अमेरिका के 50 हजार से ज्यादा सैनिक इन इलाकों में तैनात हैं.
ईरान की मिसाइलों से अमेरिका के इन सैन्य अड़डों को सीध खतरा हैं. खासकर तेल और गैस के क्षेत्रों में. अगर हमला हुआ तो अमेरिका के पास मिसाइल डिफेंस सिस्टम हैं, लेकिन ईरान की मिसाइलों की संख्या ज्यादा होने से उसके लिए चुनौती बड़ी है. ईरान ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी अड्डे उसके निशाने पर हैं.
ट्रंप क्यों नहीं कर पा रहे हमले की जुर्रत
ईरान की मिसाइल क्षमता की वजह से अमेरिका ईरान पर हमले की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है. हालांकि, ऐसा कहना पूरी तस्वीर नहीं लगता, लेकिन यह रणनीतिक गणित है, जहां अमेरिका को सीधे हमले की कीमत, संभावित लाभ से कहीं ज्यादा भारी पड़ सकती है.
क्या ईरान के पास 10000 KM तक की ICBM मिसाइल है?
wion न्यूज के मुताबिक दक्षिण-पश्चिम एशिया में ईरान के पास सबसे विशाल मिसाइल भंडार है. साल 2022 में, अमेरिकी सेंट्रल कमांड के जनरल केनेथ मैकेंजी ने माना था कि ईरान के पास 3,000 से अधिक बैलिस्टिक मिसाइलें हैं. इनकी मारक क्षमता 300 किलोमीटर से लेकर 10,000 किलोमीटर तक है. इनमें शाहब, कियाम, फतेह, राद, जोल्फाघर, देजफुल, गद्र, इमाद, खोर्रमशहर या अली आदि शामिल हैं. साथ ही यह भी कहा कि इस्लामिक गणराज्य ईरान की कुल मिसाइल क्षमता का अनुमान लगाना कठिन है.
2015 से इसने स्वयं द्वारा निर्धारित मिसाइल मारक क्षमता की सीमा 2,000 किलोमीटर तय की थी, लेकिन हाल की रिपोर्टों से पता चलता है कि इसने अपनी इस स्व-निर्धारित सीमा को छोड़ काफी आगे बढ़ चुका है.हाल ही में ईरान ने दावा किया था कि उसने अपनी पहली इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल का टेस्ट किया है, जो अमेरिका के ईस्ट कोस्ट तक पहुंचने में सक्षम है. डिफेंस सिक्योरिटी एशिया के अनुसार जो तस्नीम और फार्स न्यूज एजेंसी जैसे सोर्स का हवाला देती है, मिसाइल की रेंज 10,000 किलोमीटर तक है. यह टेस्ट साइबेरिया सागर की ओर किया गया था. कथित तौर पर ऊपर से उड़ान भरने के लिए ईरान ने रूस से पहले ही मंजूरी ले ली थी.
क्यों हुई ट्रंप की लोकप्रियता बायडेन से भी कम?
हाल ही में सामने आए हार्वर्ड सीएपीएस/हैरिस के सर्वे के मुताबिक 51% अमेरिकी मतदाताओं का मानना है कि ट्रंप का काम बाइडन की तुलना में घटिया है. हालांकि 49 फीसद मतदाता ट्रंप के साथ हैं. एक अन्य सर्वे रैसमसन रिपोर्ट्स बताया कि 48 फीसद वोटर्स बाइडन को बेहतर मानते हैं. ट्रंप को सिर्फ 40 फीसद वोर्टर्स ने बेहतर बताया है. वहीं 8 फीसद का मानना है कि दोनों का काम करीब-करीब एक जैसा रहा है. यूगोव/इकोनॉमिस्ट के सर्वे के अनुसार 46 फीसद अमेरिकियों का कहना है कि ट्रंप खराब काम कर रहे हैं. बाइडन उनसे अच्छे थे.
यानी आक्रामक नीति, टैरिफ पॉलिसी की वजह से ट्रंप की लोकप्रियता बाइडेन से भी कम हो गई है. ट्रंप अपनी नाक बचाना चाहते हैं. अब अमेरिका की धौंसपट्टी ट्रंप की वजह से नहीं रहा. नाटो उसके हाथ से निकल गया, चीन उसका दुश्मन है. रूस भी अमेरिका की कब्र खोदने में जुटा है. अफ्रीकी देश अमेरिकी दबाव से मुक्त हो रहे हैं. कई लैटिन अमेरिकी देशों ने भी अमेरिकी दबाव को न मानने के संकेत दिए हैं. हिंद महासागर में भारत का प्रभुत्व है दक्ष्णि चीन सागर में उसे चीन घेर रहा है. सबसे अहम नाटो देश ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ने पर उसका साथ नहीं बार नहीं देंगे. ऐसे में ईरान से युद्ध हुआ तो ईरान का तो जो होना होगा, पर अमेरिका अर्थव्यवस्था की कमर टूट जाएगी.




