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2001 की दुश्मनी क्या लाएगी 2026 में रंग, कैसे रहे हैं भारत के बांग्लादेश चुनाव जीतने वाली BNP के साथ संबंध?

बांग्लादेश में नई सरकार आने के बाद सवाल उठ रहा है कि अब बांग्लादेश के साथ भारत के रिश्ते कैसे होने वाले हैं. बीएनपी के साथ हिंदुस्तान के रिश्ते कुछ खास नहीं रहा है.

2001 की दुश्मनी क्या लाएगी 2026 में रंग, कैसे रहे हैं भारत के बांग्लादेश चुनाव जीतने वाली BNP के साथ संबंध?
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( Image Source:  AI GENERATED IMAGE- SORA )
समी सिद्दीकी
Edited By: समी सिद्दीकी

Updated on: 14 Feb 2026 1:03 PM IST

Bangladesh Elections: बांग्लादेश में हुए आम चुनाव में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली केंद्र-दक्षिणपंथी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने बड़ी जीत हासिल की है. शुक्रवार (13 फरवरी) को आए नतीजों में BNP ने जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया. अगस्त 2024 में प्रधानमंत्री शेख हसीना के पद से हटने के बाद यह पहला चुनाव था.

300 सदस्यीय संसद में BNP दो-तिहाई बहुमत की ओर बढ़ती दिखी. वहीं, शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग के चुनाव न लड़ने की स्थिति में इस बार जमात-ए-इस्लामी को भी बड़ा फायदा हुआ. 1991 में 18 सीटों का उसका रिकॉर्ड था, जबकि इस बार उसकी सीटों की संख्या 60 से अधिक पहुंच गई.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक की जीत पर क्या कहा?

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक रहमान को निर्णायक जीत के लिए बधाई दी. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि यह जीत बांग्लादेश की जनता के विश्वास को दर्शाती है. उन्होंने यह भी कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और समावेशी बांग्लादेश के समर्थन में खड़ा रहेगा. यह बधाई संदेश आधिकारिक नतीजे घोषित होने से पहले ही आ गया था.

कैसा रहा है भारत और बीएनपी का इतिहास?

भारत का BNP के साथ संबंध 1978 से है, जब जनरल ज़ियाउर रहमान ने पार्टी की स्थापना की थी. उनकी हत्या के बाद उनकी पत्नी खालिदा जिया ने पार्टी की कमान संभाली और 1982 के बाद पार्टी की विचारधारा और दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई. पिछले साल उनके मौत के बाद, 17 साल के आत्म-निर्वासन से लौटे 60 साल के तारिक रहमान ने पार्टी की बागडोर संभाली.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिर, 2001 से 2006 के बीच खालिदा जिया के नेतृत्व वाली BNP-जमात गठबंधन सरकार के दौरान भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में कड़वाहट आई. भारत के मुताबिक, उस समय पूर्वोत्तर भारत के उग्रवादी संगठनों और अन्य आतंकी समूहों को बांग्लादेश की जमीन से काम करने की इजाजत दे दी गई थी. जमात नेताओं पर उन्हें संरक्षण देने के आरोप भी लगे, जिसे भारत ने बड़ा सुरक्षा खतरा माना था.

शेख हसीना की सत्ता आई तो क्या हुआ?

2008 में शेख हसीना के सत्ता में आने के बाद इन संगठनों पर सख्त कार्रवाई हुई और भारत-बांग्लादेश के बीच आतंकवाद-रोधी सहयोग मजबूत हुआ. हालांकि, हसीना ने इस कार्रवाई का इस्तेमाल विपक्षी BNP और जमात नेताओं पर कार्रवाई के लिए भी किया.

2024 में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों के बाद शेख हसीना सरकार का पतन हुआ. इसके बाद विपक्षी दलों ने राजनीतिक मैदान संभाल लिया. आवामी लीग पर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा और हसीना भारत में शरण लेने चली गईं.

बांग्लादेश में नई सरकार से क्या चाहता है भारत?

शुक्रवार को प्रधानमंत्री मोदी ने तारिक रहमान को फोन कर बधाई दी. इससे यह संकेत मिला कि भारत नई सरकार के साथ काम करने के लिए तैयार है. दिसंबर में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ढाका जाकर खालिदा जिया के निधन पर संवेदना ज़ाहिर की थी. इससे साफ पता लगता है कि दोनों देश कहीं न कहीं अपने रिश्तों को बेहतर करने पर फोकस करना चाहते हैं.

भारत के प्रति अब क्या है बीएनपी का रुख?

चुनाव प्रचार के दौरान तारिक रहमान या BNP के किसी बड़े नेता ने भारत-विरोधी बयान नहीं दिए. देश लौटने के बाद अपने भाषण में रहमान ने कहा था कि वे ऐसा सुरक्षित बांग्लादेश बनाना चाहते हैं, जहां मुस्लिम, हिंदू, बौद्ध और ईसाई सभी सुरक्षित महसूस करें.

BNP का चुनाव में क्या रहा है रुख?

BNP के घोषणापत्र में विदेश नीति को ‘Bangladesh Before All’ पर आधारित बताया गया है. इसमें भारत का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया गया. 'Friend Yes, Master No' का नारा दिया गया, जिसे भारत के प्रभाव की ओर इशारा माना जा रहा है. घोषणापत्र में कहा गया था कि बांग्लादेश न तो दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करेगा और न अपने मामलों में हस्तक्षेप होने देगा.

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