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EXPLAINER: नेपाल की तरह हर देश में Gen Z की कामयाबी की नहीं कोई गारंटी, इतना तो समझ ही गए होंगे मो. यूनुस साहब

नेपाल, बांग्लादेश और ईरान के उदाहरण बताते हैं कि Gen Z हर देश में सत्ता परिवर्तन या स्थिरता की गारंटी नहीं है. जानिए क्यों यूनुस का दांव उलटा पड़ा. बीएनपी (BNP) प्रमुख तारिक रहमान के लिए बड़ी सीख क्यों?

EXPLAINER: नेपाल की तरह हर देश में Gen Z की कामयाबी की नहीं कोई गारंटी, इतना तो समझ ही गए होंगे मो. यूनुस साहब
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संजीव चौहान
By: संजीव चौहान10 Mins Read

Updated on: 14 Feb 2026 7:03 PM IST

बेशक, बीते साल नेपाल में वहां की जेन-जेड (Gen Z) द्वारा सड़कों पर किए गए खूनी विरोध प्रदर्शनों की तूफानी आग-हवा में नेपाली हुकूमत हवा में उड़ गई. उसी तरह दुनिया के बाकी ईरान, बांग्लादेश जैसे अस्थिर देशों में भी ‘जेन-जेड’ राजनीतिक बदलाव या स्थिरता-कामयाबी की गारंटी है! बांग्लादेश में 13वीं लोकसभा के चुनाव परिणामों के बाद तो कम से कम यह पक्का हो चुका है.

कहने-देखने और सुनने को साल 2006 के नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और बांग्लादेश के अंतरिम कार्यवाहक मोहम्मद युनूस ने भी इन चुनावों में अपना और बांग्लादेश का भविष्य बेहतर बनाने के लिए इसी Gen Z का खुलकर इस्तेमाल करने में कहीं कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी. भले ही, मोहम्मद युनूस सोचते रहे कि वे खुद बांग्लादेशी संसद (लोकसभा) का चुनाव न लड़कर और उसकी जगह देश की युवा पीढ़ी को चुनाव में आगे बढ़ने का मौका देकर, अपना राजनीतिक भविष्य शर्तिया 'सुरक्षित' कर लेंगे. मगर, ऐसा हो न सका. बांग्लादेश में 13वीं लोकसभा चुनाव से ऐन पहले और दौरान-ए-इलेक्शन जहां जहां ‘जेन जेड’ की तूफानी हवा-आंधी उड़ती हुई देखकर मोहम्मद युनूस मन ही मन खुश हो रहे थे, वहां-वहां देख लीजिए चुनाव परिणामों ने उनके ही मंसूबों को ढेर कर दिया.

क्‍या माहौल को समझने में भूल कर बैठे युनूस?

नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और बुरे वक्त में अमेरिका के पिट्ठू और बांग्लादेश की अस्थाई रूप से राजनीतिक बागडोर संभालने वाले राजनीतिक खिलाड़ी मो. युनूस अपने देश की ‘जेन जेड’ को लेकर गच्चा खा गए. तब फिर ऐसी Gen Z सोच, कैसे दुनिया के किसी और दूसरे देश की नैया पार लगा सकेगी. अहम सवाल, बांग्लादेश के संसदीय चुनाव परिणाम में Gen Z की दुर्गति और नेपाल में जेन-जेड द्वारा चंद दिन के भीतर देश की सल्तनत को उखाड़ फेंकने में इतना बड़ा हैरतअंगेज फर्क कैसे?

बिना मजबूत रणनीति वाला Gen Z अक्‍लमंद कैसे?

यह जानने के लिए स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर क्राइम इन्वेस्टीगेशन ने देश के कुछ बुद्धिजीवी, भारतीय फौज के पूर्व रक्षा-विशेषज्ञों, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों, विदेश नीति और जिओ पॉलिटिक्स के जानकारों से खुलकर बात की. पाकिस्तान के खिलाफ कारगिल युद्ध में जख्मी होने वाले थल सेना के रिटायर्ड मेजर उदय प्रताप सिंह चौहान ने कहा, “नेपाल, बांग्लादेश और ईरान या फिर भारत. हर देश की आगे बढ़ने की अपनी अपन (अपनी शैली है. सबकी अपनी) अपनी सैन्य-सामरिक क्षमताएं, विदेश और कूटनीति के साथ-साथ भौगोलिक परिस्थितियां हैं. कोई देश किसी दूसरे देश की नीतियों पर नहीं चलता है.

दुनिया के हर देश का जेन जेड यह समझने लगेगा कि वह नेपाली जेन जेड सा असरकारक सिद्ध होगा, तो यह गलतफहमी ही माना जाएगा. अगर ऐसा होता कि जेन जेड ही सबसे ज्यादा तेज-दिमाग और मजबूत रणनीतिकार है, तो दो महीने पहले ईरान में जेन-जेड की दुर्गति देख लीजिए. या फिर अब बांग्लादेश का हालत उसके चुनाव परिणामों के बाद देख लीजिए. न तो ईरान में जेन जेड वहां की हुकूमत को हिला सकी. जबकि ईरानी जेन जेड को पीछे से दबे पांव इजरायल और अमेरिका दोनों का समर्थन हासिल था. हुआ क्या, ईरान में जेन जेड के वाहियाती जोश में होश खोकर सड़कों पर उतर आने के फेर में हजारों बेकसूरों का कत्ल कर डाला. ऐसे में, बिना किसी मजबूत रणनीति वाले जेन-जेड को ताकतवर या अक्लमंद कैसे कहा जा सकता है, जो खुद को अपने मंसूबे कामयाब करा न सके और जो बेकसूर हैं, उनको कत्ल-ए-आम करवा दे.

युनूस के अरमानों पर युवाओं ने कैसे फेरा पानी?

भारतीय वायुसेना के रिटायर्ड एयर वाइस मार्शल अनिल तिवारी कहते हैं, “नेपाल की हुकूमत बेहद कमजोर थी. वहां मुद्दा बेरोगारी, भ्रष्टाचार और सल्तनत में मौजूद प्रधानमंत्री व मंत्री द्वारा देश की युवा पीढ़ी की अनदेखी करके अपनी अपनी जेबें भरने जैसा डायरेक्ट नेपाल की आम पब्लिक को तबाह करने की बात सड़क पर लाने में Gen Z सफल रही थी. बांग्लादेश के कार्यवाहक सर्वे-सर्वा शांति का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले मो. यूनुस भी समझ रहे थे कि वे भी देश में Gen Z को अप्रत्यक्ष रूप से सपोर्ट कर अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति आराम से कर सकेंगे. मगर बांग्लादेश के संसदीय चुनाव परिणामों ने मो. यूनुस की उस सोच की हवा निकाल दी. वह सोच रहे थे कि उनके देश का Gen Z भी नेपाल की तरह बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन कर न केवल दुनिया को चौंकाएगा, बल्कि उन्हें राष्ट्रपति बना डालेगा. देख लीजिए, सब कुछ सामने है. Gen Z बांग्लादेश और ईरान दोनों ही देशों में पूरी तरह फेल और तबाही का सबब बनकर उभरी है.

खुद कैसे फंस गए शांति पुरुष?

दरअसल, बांग्लादेश के कार्यवाहक मो. युनूस सोच रहे थे कि जो Gen Z चंद घंटों के अंदर बांग्लादेश अवामी लीग प्रमुख और वहां की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को तबाह कर सकती है. वही, बांग्लादेशी Gen Z अब मो. यूनुस का राजनीतिक भविष्य भी मजबूती के साथ सुधार सकती है. यह यूनुस की सबसे बड़ी गलतफहमी साबित हुई. मैं, दावे के साथ कह सकता हूं कि शांति का नोबेल पुरस्कार विजेता मो. यूनुस को बांग्लादेश में अस्थाई तौर पर देश की बागडोर संभालने के तुरंत बाद जो करना चाहिए था, वह नहीं किया. इसीलिए, 13वें संसदीय चुनाव परिणामों ने मो. यूनुस को फेल या फ्लॉप साबित कर दिया. अब संकट बांग्लादेश के लिए उतना नहीं है, जितना वहां के बदले हुए अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में जोखिम मोहम्मद युनूस के लिए है.”

मुख्य सलाहकार की दुर्गति, तारिक के लिए सीख क्यों?

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल वीके चतुर्वेदी कहते हैं, “इस वक्त बांग्लादेश में जो कुछ होता हुआ दिखाई दे रहा है, वह भारत के लिए माफिक पड़ने की उम्मीद है. क्योंकि अब जिन तारिक रहमान के बांग्लादेश का प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद प्रबल हो रही है, उनकी मां और बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री मरहूम खालिदा जिया का जन्म स्थल भारत रहा है. यानी इस हिसाब से भारत, बांग्लादेश के भावी प्रधानमंत्री तारिक रहमान की ननिहाल हुई. मैं, यह नहीं कह रहा हूं कोई देश इन खून के या सामाजिक रिश्तों की धुरी पर आगे बढ़ा करते हैं या निर्भर होते हैं.

मेरे कहने का मतलब यह है कि तारिक रहमान का अतीत बेशक बांग्लादेश के साथ भारत के रिश्तों को लेकर कभी बहुत माफिक न रहा हो, मगर वो भारत जैसे मजबूत देश के साथ संबंध बनाकर ही आगे बढ़ना चाहेगा. ऐसे में मुझे उम्मीद है कि बांग्लादेश में जिस तरह से वहां के जेन जेड ने मो. युनूस की भारत और हिंदू विरोधी सोच को लगाम लगाई, उससे मो. यूनुस का राजनीतिक भविष्य भी गड्ढे में फंस गया. इस बात से प्रधानमंत्री बनने जा रहे तारिक रहमान को भी सीख लेने की जरूरत है. वह देशहित में यूनुस की तरह गलतियां न दोहराएं. यही उनके और भारत के हित में होगा.”

आंख मूंदकर भरोसा करना बड़ी भूल क्यों?

पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार डॉ. सतीश मिश्रा कहते हैं, “जेन जेड पर आंख मूंदकर अगर कोई भरोसा करता है तो गलती जेन जेड की नहीं है. गलती उसकी है जो जेन जेड के ऊपर भरोसा आंख मूंदकर कर रहा है. नेपाल में जो हुआ वह एकदम अलग मामला था. वहां की सरकार जेन जेड से भी ज्यादा गई गुजरी और भ्रष्ट थी. इसलिए वहां के नेताओं-मंत्रियों को जेन जेड ने चंद दिन में सत्ता के सिंहासन से घसीट कर जमीन पर ला पटका. अगर जेन जेड मंझे हुए रणनीतिकारों, विदेश सैन्य-रक्षा कूटनीति और राजनीति के पैने अनुभवी लोगों की सी ही दूर दृष्टि रखते हैं, तब फिर यह बताइए कि ईरान में जेन जेड ने क्यों अपनी ही पुलिस और सेना के हाथों हजारों लोगों मरवा दिया. उछलने कूदने को तो भारत में भी अक्सर तमाम गरम मुद्दों के विरोध में जेन जेड सड़कों पर आकर उछलती कूदती है. मगर, उसका फर्क मंझे हुए अनुभवी राजनीतिज्ञों-रणनीतिकारों के ऊपर क्या विपरीत पड़ सकता है. यह सोचना कि नेपाल ही तरह ही हर देश में जेन जेड मजबूत है. सोचना सरासर गलत है.

यूनुस को यह संबंध बना सकते हैं

मो. युनूस सोच रहे थे कि वे शेख हसीना के खिलाफ बांग्लादेश की जेन जेड भड़का अपनी राजनीतिक नैया पार लगा लेंगे. देश युवा बांग्लादेश का राष्ट्रपति बना देगा, लेकिन वैसा नहीं हुआ. आम चुनाव परिणाम से उनके अरमान भी स्वाहा हो चुके हैं. मगर दूसरी तरफ यह भी ध्यान रखना होगा कि मो. युनूस जिस तरह से पूर्व प्रधानमंत्री मरहूम खालिदा जिया और उनके परिवार के करीबी रहे हैं. या जिस तरह से उन्हें भारत का दुश्मन देश अमेरिका आंख मूंदकर सपोर्ट कर रहा है, तो ऐसे में बांग्लादेश की जेन जेड के हाथों हार देख रहे मो. यूनुस का अहसान उतारने के लिए शायद अब बांग्लादेश के प्रधानमंत्री बनने जा रहे तारिक रहमान उन्हें (युनूस) किसी तरह का राजनीतिक सपोर्ट करके उनकी इज्जत बचाने की कोशिश कर लें.”

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