“कहो नरेंद्र, मजा आ रहा?” इलाहाबाद अब प्रयागराज है, बनारस क्योटो बन चुका है. धनीराम की ज़मीन बिक गई, घर में न घड़ा बचा न लोटा. टूटी चप्पल में बोरा उठाए घूम रहा है मनसुख, और देसी नीरो बांसुरी बजा रहा है. यह कोई कविता नहीं, बल्कि उस बेचैनी की आवाज़ है जो आज सड़कों से निकलकर सोशल मीडिया तक गूंज रही है. इसी तीखे और व्यंग्य से भरे गीत को गाने वाले प्रियांशु का यह इंटरव्यू उस सवाल को दोहराता है, जिसे हर आम आदमी मन ही मन पूछ रहा है - “देश किधर जा रहा है?”