दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलज' (पूर्व नाम Punjab 95) एक बार फिर चर्चा में है, क्योंकि रिलीज के कुछ दिनों बाद इसे ओटीटी से हटा दिया गया. फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और 1990 के दशक में पंजाब में कथित फर्जी एनकाउंटर व गुमशुदगी के मामलों पर आधारित है. दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधन समिति के प्रतिनिधि राजेंद्र सिंह ने कहा कि यह फिल्म केवल आतंकवाद नहीं, बल्कि उस दौर में कथित 'स्टेट टेरर' और आम लोगों की पीड़ा को भी सामने लाती है. उन्होंने दावा किया कि उस समय पंजाब में आम लोगों में पुलिस कार्रवाई का भी डर था और कई परिवारों ने कठिन दौर देखा. बातचीत में कहा गया कि जसवंत सिंह खालड़ा ने कथित गुमशुदगियों और लावारिस शवों के मामलों को उजागर किया, जिसके कारण उन्हें आज भी सम्मान की नजर से देखा जाता है. उन्होंने फिल्म पर लगे प्रतिबंध को हटाने की मांग करते हुए कहा कि ऐसी फिल्मों से इतिहास के संवेदनशील पहलुओं पर चर्चा होती है और समाज को विभिन्न दृष्टिकोण समझने का अवसर मिलता है. राजेंद्र सिंह ने कहा कि पंजाब के युवा वर्ग को उस दौर की घटनाओं की जानकारी सीमित है और फिल्म उनके लिए ऐतिहासिक संदर्भ समझने का माध्यम बन सकती है. साथ ही उन्होंने यह भी माना कि उस दौर में आतंकवाद मौजूद था, लेकिन यदि किसी निर्दोष के साथ अन्याय हुआ हो तो उसकी निष्पक्ष जांच और सत्य सामने आना जरूरी है.