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ढोल-दमाऊ की थाप और सुरों की महफिल, उत्तराखंड में ऐसे मनाई जाती है खड़ी और बैठकी होली

उत्तराखंड में खड़ी और बैठकी होली ढोल-दमाऊ की थाप और रागों की महफिल के साथ मनाई जाती है. कहीं लोग गोल घेरा बनाकर नाचते-गाते हैं, तो कहीं बैठकर शास्त्रीय अंदाज में फाग गाए जाते हैं.

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( Image Source:  AI SORA )
हेमा पंत
Edited By: हेमा पंत3 Mins Read

Updated on: 2 March 2026 5:52 PM IST

क्या आपने कभी ऐसी होली देखी है, जहां रंगों से पहले सुरों की बारिश होती हो? जहां ढोल-दमाऊ की गूंज और रागों की महफिल मिलकर फिजां को रंगीन बना देती हो? उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में मनाई जाने वाली खड़ी और बैठकी होली कुछ ऐसी ही अनोखी परंपरा है, जो इस त्योहार को खास बना देती है.

उत्तराखंड में होली को छरण और छरणी कहा जाता है. कभी लोग गोल घेरा बनाकर ढोल की थाप पर झूमते नजर आते हैं, तो कभी मंदिरों और आंगनों में रागों की मधुर आवाज सुनाई देती है. ऐसे में जानते हैं आखिर क्या है खड़ी और बैठकी होली का यह खास अंदाज, जो इसे देश की बाकी होलियों से अलग बनाता है?

कहां खेली जाती है खड़ी-बैठकी होली?

बैठकी और खड़ी होली मुख्य रूप से उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में खेली जाती है. खासकर अल्मोड़ा, नैनीताल, पिथौरागढ़ और बागेश्वर जैसे इलाकों में इसकी खास धूम रहती है. कुमाऊंनी लोग जहां-जहां बसे हैं, वहां भी इस परंपरा को पूरे मन से निभाया जाता है.

क्या है बैठकी होली?

बैठकी होली का नाम ही इसके अंदाज को दिखाता है. इसमें लोग एक जगह पर बैठकर लोकगीत के स्टाइल में होली के गीत गाते हैं. यह होली आमतौर पर मंदिरों, सामुदायिक भवनों या किसी घर के आंगन में खेली जाती है. इसमें हारमोनियम और तबले की संगत के साथ राग आधारित गाने गाए जाते हैं. गीतों की शुरुआत भगवान की स्तुति से होती है, फिर धीरे-धीरे श्रृंगार और हास्य रस के गाने गाए जाते हैं. बैठकी होली माघ महीने से शुरू होकर रंगों वाली होली तक चलती है.

क्या है खड़ी होली?

खड़ी होली का अलग ही रंग दिखाई देता है. इसमें लोग खड़े होकर गोल घेरा बनाते हैं ((झोड़े के रूप में) और पारंपरिक ढोल-दमाऊं की थाप पर नाचते-गाते हैं. पुरुष पारंपरिक सफेद कुरता-पायजामा और कुमाऊंनी टोपी पहनते हैं. गानों के साथ कदमताल मिलाकर डांस किया जाता है.

परंपरा और सांस्कृतिक महत्व

बैठकी और खड़ी होली सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि कुमाऊं की सांस्कृतिक पहचान हैं. ये परंपराएं लोगों को एकजुट करती हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी संगीत और लोकसंस्कारों को आगे बढ़ाती हैं. आज भी कुमाऊं क्षेत्र में होली का मतलब केवल रंग नहीं, बल्कि सुरों की साधना और सामूहिक उल्लास है. यही वजह है कि बैठकी और खड़ी होली को देखने और सुनने का अनुभव हर किसी के लिए खास बन जाता है.

उत्तराखंड न्‍यूज
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