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Hemkund Sahib Yatra 2026: 20 मई को ऋषिकेश से रवाना होगा पहला जत्था, जानें दुनिया के सबसे ऊंचे गुरुद्वारे का इतिहास

20 मई को ऋषिकेश से हेमकुंड साहिब यात्रा का पहला जत्था रवाना होगा. सरकार ने यात्रा मार्ग, सुरक्षा और श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए व्यापक तैयारियां पूरी कर ली हैं.

Hemkund Sahib Yatra 2026: 20 मई को ऋषिकेश से रवाना होगा पहला जत्था, जानें दुनिया के सबसे ऊंचे गुरुद्वारे का इतिहास
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( Image Source:  Instagram: hemkundsahibji )
रूपाली राय
Edited By: रूपाली राय4 Mins Read

Updated on: 9 May 2026 1:34 PM IST

20 मई को हेमकुंड साहिब के लिए पहला जत्था ऋषिकेश से रवाना किया जाएगा. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा सबसे जरुरी है. शासन-प्रशासन की टीम ने हर जरूरी इंतजाम कर लिए हैं. यात्रा मार्ग पर लगातार नजर रखी जा रही है. किसी भी तरह की समस्या आने पर तुरंत समाधान किया जाएगा. कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्पष्ट रूप से कहा कि राज्य सरकार इस यात्रा को पूरी तरह सुरक्षित, आसान और अच्छी तरह व्यवस्थित बनाने के लिए पूरी तरह तैयार है. हर स्तर पर अच्छी तैयारी की गई है.

हेमकुंड साहिब कहां है?

हेमकुंड साहिब उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल हिमालय क्षेत्र में चमोली जिले में स्थित है. यह समुद्र तल से लगभग 4,329 मीटर (करीब 14,200 फीट) की बहुत ऊंचाई पर बना हुआ है. इस वजह से यह दुनिया के सबसे ऊंचे सिख तीर्थ स्थलों में से एक है. यहां एक सुंदर और शांत हिमनदी झील है, जिसके किनारे गुरुद्वारा बना हुआ है. झील का पानी इतना साफ और निर्मल है कि आसपास की बर्फ से ढकी सात ऊंची पहाड़ी चोटियां उसमें साफ-साफ दिखती हैं. यहां की खूबसूरती देखने लायक होती है. हालांकि हेमकुंड साहिब जाना इतना आसान नहीं होता क्योंकि वहां तक रास्ता बेहद कठिन और दुर्गम है. लेकिन अपने आध्यात्मिक विश्वास पर इस यात्रा का हिस्सा बनते है.

Instagram: hemkundsahibji

कैसे यहां तक पहुंचते है

हेमकुंड साहिब ट्रेक उत्तराखंड (चमोली जिला) में स्थित एक चुनौतीपूर्ण, 19 किलोमीटर लंबा तीर्थयात्रा मार्ग है, जो दुनिया के सबसे ऊंचे गुरुद्वारों में से एक तक जाता है, जो सात बर्फ से ढकी चोटियों और एक हिमनदी झील से घिरा हुआ है. तीर्थयात्री और पर्वतारोही गोविंदघाट से शुरू करके गंगारिया (गोबिंद धाम) होते हुए एक लंबी यात्रा के बाद यहां पहुंच पाते हैं. यह पूरा क्षेत्र ऊंचे हिमालयी पहाड़ों, हरे-भरे अल्पाइन घास के मैदानों और चमकते ग्लेशियरों से घिरा हुआ है. यहां का शांत वातावरण श्रद्धालुओं के साथ-साथ प्रकृति प्रेमियों को भी बहुत आकर्षित करता है. क्योंकि यह जगह बहुत ऊंची है और यहां सर्दी बहुत ज्यादा होती है, इसलिए हेमकुंड साहिब केवल गर्मियों के मौसम में ही खुला रहता है. जब बर्फ पिघल जाती है, तब यात्रा शुरू होती है. हर साल हजारों-लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं, गुरु जी को श्रद्धा अर्पित करते हैं.

गुरुद्वारा हेमकुंड साहिब का इतिहास

सिख धर्म में हेमकुंड साहिब का बहुत गहरा और पवित्र महत्व है. यह दसवें सिख गुरु गुरु गोविंद सिंह जी से सीधे जुड़ा हुआ है. सिख मान्यताओं और दशम ग्रंथ के अनुसार, गुरु गोविंद सिंह ने इस लोक में जन्म लेने से पहले इस जगह पर ध्यान किया था. उन्होंने एक शांत झील का जिक्र किया था जो सात बर्फीली चोटियों से घिरी हुई थी. कई सौ सालों तक इस पवित्र जगह का लोगों को पता ही नहीं था. 20वीं शताब्दी में सिख विद्वानों और श्रद्धालुओं ने शास्त्रों में बताए गए स्थान की खोज शुरू की.

Instagram: hemkundsahibji

कैसे मिला यह पवित्र स्थान

साल 1930 में पंडित तारा सिंह नरोत्तम ने इस जगह को ढूंढ निकाला बाद में टिहरी के संत सोहन सिंह के प्रयासों से इसकी पुष्टि हुई. स्थान की पहचान होने बाद झील के किनारे एक छोटा तीर्थ स्थल बनाया गया. समय के साथ तीर्थयात्रियों की संख्या बढ़ने पर यह विकसित होकर आज का सुंदर गुरुद्वारा हेमकुंड साहिब बन गया है. दूर-दराज के इस ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में स्थित होने के बावजूद, यह गुरुद्वारा सिख समुदाय के सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र तीर्थों में गिना जाता है. हर साल हजारों श्रद्धालु कठिन यात्रा करके यहां आते हैं, आशीर्वाद लेते हैं और इस पावन जगह की शांति का अनुभव करते हैं.

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