UPITS 2026: न मिसाइल, न जैमर, राइफल से Drone का शिकार! दुनिया की तीसरी, भारत की पहली कंपनी का दावा, सबसे सस्ती बुलेट से 150m तक निशाना- Exclusive
UP International Trade Show 2026 में नोएडा की काली म्यूनिशन्स ने 7.62mm एंटी-ड्रोन बुलेट पेश की. कंपनी इसे भारत की पहली और दुनिया की तीसरी तकनीक बताती है, जो 150 मीटर तक ड्रोन को निशाना बना सकती है.
UP International Trade Show 2026: न मिसाइल की जरूरत, न महंगे जैमर का झंझट और न ही किसी खास हथियार का इंतजार! अब एक सामान्य राइफल से भी दुश्मन के ड्रोन को मार गिराने का दावा किया जा रहा है. उत्तर प्रदेश के नोएडा की एक कंपनी ने ऐसी स्वदेशी एंटी-ड्रोन बुलेट विकसित की है, जो 150 मीटर तक की दूरी पर उड़ रहे ड्रोन को निशाना बना सकती है. स्टेट मिरर से बातचीत में यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो 2026 में प्रदर्शित इस तकनीक को कंपनी के को-फाउंडर आदित्य सिंह दुनिया की तीसरी और भारत की पहली पहल बता रहे हैं.
उन्होंने कहा कि से मेक इन इंडिया के तहत सबसे सस्ती एंटी-ड्रोन बुलेट बनाने का दावा भी किया जा रहा है. आखिर इस छोटी-सी गोली में ऐसा क्या खास है, जो युद्ध के मैदान की तस्वीर बदल सकता है? जानें सबकुछ
दुश्मन के ड्रोन का जवाब अब राइफल की गोली से?
रूस-यूक्रेन युद्ध ने आधुनिक युद्ध की रणनीति में ड्रोन की अहमियत बढ़ा दी है. कम ऊंचाई पर उड़ने वाले छोटे ड्रोन अब निगरानी से लेकर हथियार और विस्फोटक गिराने तक के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं. ऐसे में इन्हें मार गिराने के लिए महंगी मिसाइलों और विशेष एंटी-ड्रोन प्रणालियों पर निर्भरता कम करना दुनिया की सेनाओं के सामने एक बड़ी चुनौती है. इसी चुनौती का स्वदेशी समाधान लेकर उत्तर प्रदेश के नोएडा की रक्षा क्षेत्र की कंपनी काली म्यूनिशन्स सामने आई है. कंपनी ने 7.62 एमएम की विशेष एंटी-ड्रोन बुलेट विकसित की है, जिसे पारंपरिक राइफलों से दागा जा सकता है. कंपनी का दावा है कि यह 100 से 150 मीटर की दूरी पर उड़ रहे छोटे ड्रोन को निशाना बनाकर गिरा सकती है. यह दुनिया की ऐसी तीसरी और देश की पहली कंपनी है. साथ ही कंपनी का प्रोडक्ट दुनिया के किसी भी कंपनी से कीमत में 10 गुना कम है.
क्या है काली म्यूनिशन्स की एंटी-ड्रोन बुलेट?
नोएडा स्थित काली म्यूनिशन्स ने एंटी-ड्रोन CQB 7.62 एमएम नाम से विशेष गोला-बारूद विकसित किया है. कंपनी के सह-संस्थापक आदित्य सिंह ने स्टेट मिरर से बातचीत में कहा,'एंटी-ड्रोन CQB 7.62 एमएम बुलेट का परीक्षण पूरा हो चुका है और अब भारतीय सेना तथा नागरिक पुलिस की जरूरतों को पूरा करने के लिए इसका प्रोडक्शन जारी है.
बुलेट की खासियत क्या?
उन्होंने कहा कि इसकी खासियत यह है कि इसे इस्तेमाल करने के लिए सैनिकों को अलग से कोई भारी हथियार या विशेष लॉन्चर साथ रखने की जरूरत नहीं होगी. इसे एके-47, एके-203 और एलएमजी जैसी मौजूदा बंदूकों से दागा जा सकता है. कंपनी के अनुसार, यह गोला-बारूद मौजूदा हथियारों के साथ इस्तेमाल करने के लिहाज से तैयार किया गया है. इस तरह यह तकनीक छोटे ड्रोन के खिलाफ सैनिकों को पहले से उपलब्ध हथियारों के माध्यम से जवाब देने का विकल्प देती है.
कैसे काम करती है 7.62 एमएम एंटी-ड्रोन बुलेट?
काली म्यूनिशन्स की इस बुलेट की प्रमुख विशेषता इसका मल्टी-प्रोजेक्टाइल डिजाइन है. सामान्य गोली की तरह केवल एक प्रोजेक्टाल के बजाय इसमें कई छोटे प्रोजेक्टाइल का इस्तेमाल किया गया है. इससे हवा में शॉटगन जैसा फैलाव पैदा होता है, जो छोटे और तेजी से उड़ने वाले ड्रोन को निशाना बनाने में मदद कर सकता है.
कंपनी के मुताबिक, इस तकनीक के जरिए 100 से 150 मीटर की दूरी तक उड़ रहे ड्रोन को निशाना बनाया जा सकता है. इसे काइनेटिक हार्ड-किल तकनीक की श्रेणी में रखा जा सकता है. इसमें इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल बाधित करने के बजाय सीधे भौतिक प्रहार से लक्ष्य को नष्ट करने का प्रयास किया जाता है.
इसकी एक अहम विशेषता यह है कि इसके इस्तेमाल के लिए अलग से जैमर या मिसाइल प्रणाली की आवश्यकता नहीं होती. हालांकि, किसी ड्रोन को गिराने की वास्तविक क्षमता उसकी गति, आकार, ऊंचाई और गोली चलाने की परिस्थितियों पर भी निर्भर करेगी.
दुनिया की तीसरी कंपनी होने का दावा कितना अहम?
काली म्यूनिशन्स के सह-संस्थापक आदित्य सिंह का दावा है कि उनकी कंपनी इस तरह का गोला-बारूद विकसित करने वाली दुनिया की तीसरी कंपनी है और भारत की पहली कंपनी है. उनके मुताबिक, इससे पहले रूस और यूक्रेन में इस तरह की तकनीक विकसित की गई थी. अब इटली, फ्रांस और अन्य देशों में भी इस क्षेत्र में काम हो रहा है.
कंपनी का दावा इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि छोटे ड्रोन को निशाना बनाने के लिए विशेष हथियार विकसित करना आधुनिक सैन्य जरूरतों का हिस्सा बनता जा रहा है. हालांकि, दुनिया में ऐसी तकनीक विकसित करने वाली कंपनियों की संख्या और उनके उत्पादों की परिचालन स्थिति के बारे में स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है.
भारत के संदर्भ में इस उपलब्धि का एक दूसरा पहलू भी है. स्वदेशी तकनीक के माध्यम से विशेष गोला-बारूद तैयार होने से भविष्य में रक्षा उपकरणों के आयात पर निर्भरता कम करने की संभावना बन सकती है.
रूस-यूक्रेन युद्ध से क्यों बढ़ी ऐसी बुलेट की जरूरत?
रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध ने दिखाया है कि छोटे ड्रोन भी युद्ध के मैदान में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. निगरानी करने, सैनिकों की स्थिति का पता लगाने और विस्फोटक गिराने के लिए इनका इस्तेमाल किया जा रहा है. ऐसे ड्रोन को रोकने के लिए हर बार महंगी मिसाइल या बड़े एंटी-ड्रोन सिस्टम का इस्तेमाल करना व्यावहारिक नहीं होता.
आदित्य सिंह के मुताबिक, यूक्रेन में कम ऊंचाई पर उड़ने वाले रूसी ड्रोन को मार गिराने की जरूरत ने इस तरह के गोला-बारूद के विकास को प्रोत्साहित किया. इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए विशेष एंटी-ड्रोन बुलेट विकसित की गईं.
इसका एक कारण लागत भी है. छोटे ड्रोन को नष्ट करने के लिए महंगी मिसाइलों का इस्तेमाल कई बार आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं होता. इसके मुकाबले पहले से उपलब्ध राइफलों से विशेष गोला-बारूद दागने का विकल्प अपेक्षाकृत कम खर्चीला हो सकता है. हालांकि, इसकी वास्तविक लागत और प्रभावशीलता का आकलन उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर ही किया जा सकता है.
भारत की सीमाओं पर कितनी उपयोगी हो सकती है यह तकनीक?
भारत की पाकिस्तान, चीन और बांग्लादेश से लगी सीमाओं पर ड्रोन के जरिए हथियार, नशीले पदार्थ और अन्य प्रतिबंधित सामग्री भेजने की घटनाएं सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती रही हैं. पंजाब, जम्मू-कश्मीर और राजस्थान जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रोन के जरिए हथियारों और मादक पदार्थों की तस्करी रोकना सुरक्षा बलों की प्रमुख जरूरतों में शामिल है.
ऐसी परिस्थितियों में कम ऊंचाई पर उड़ने वाले छोटे ड्रोन को मार गिराने के लिए विशेष गोला-बारूद उपयोगी साबित हो सकता है. काली म्यूनिशन्स का दावा है कि उसकी बुलेट 100 से 150 मीटर की दूरी तक उड़ रहे ड्रोन को निशाना बना सकती है.
इस तकनीक का संभावित लाभ यह है कि सीमावर्ती चौकियों पर तैनात जवानों को हर स्थिति में अलग एंटी-ड्रोन उपकरण पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा. हालांकि, ड्रोन की पहचान, उसकी दूरी, गति और गोली चलाने की परिस्थितियां इसकी उपयोगिता को प्रभावित करेंगी. यह तकनीक बड़े ड्रोन या लंबी दूरी से होने वाले हमलों को रोकने का पूर्ण विकल्प नहीं है.
किन-किन सुरक्षा एजेंसियों ने दिखाई दिलचस्पी?
आदित्य सिंह के मुताबिक, काली म्यूनिशन्स को भारतीय सेना, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ), भारतीय वायुसेना और नागरिक पुलिस की ओर से इस गोला-बारूद की जरूरत के संबंध में जानकारी मिली है. भारतीय नौसेना ने भी अपनी जरूरत बताई है.
कंपनी का कहना है कि उसने पहले भारतीय सुरक्षा बलों की आवश्यकताओं को पूरा करने की योजना बनाई है. इसके बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात की दिशा में कदम उठाए जाएंगे.
हालांकि, विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों की ओर से रुचि दिखाए जाने और किसी उत्पाद को औपचारिक रूप से खरीदने के बीच अंतर है. इसलिए आपूर्ति की मात्रा, खरीद के अनुबंध और विभिन्न बलों में इसके वास्तविक इस्तेमाल की स्थिति को अलग-अलग देखना जरूरी है.
भारत में कौन-कौन विकसित कर रहा है एंटी-ड्रोन तकनीक?
भारत में एंटी-ड्रोन तकनीक के विकास का काम केवल निजी कंपनियों तक सीमित नहीं है. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (एआरडीई) भी सेना की इन्फेंट्री राइफलों के लिए स्वदेशी 7.62 एमएम एंटी-ड्रोन गोला-बारूद विकसित करने की दिशा में काम कर रही है.
इसके अलावा, सोलर इंडस्ट्रीज जैसी भारतीय कंपनियां बड़े एंटी-ड्रोन सिस्टम पर भी काम कर रही हैं. इनमें माइक्रो-मिसाइल आधारित भार्गवास्त्र का नाम शामिल है. यह छोटे ड्रोन के खतरे से निपटने के लिए विकसित की जा रही एक अलग तरह की प्रणाली है.
इन तकनीकों में बुनियादी अंतर है. काली म्यूनिशन्स की बुलेट मौजूदा राइफलों के जरिए इस्तेमाल किए जाने के लिए बनाई गई है, जबकि भार्गवास्त्र जैसे सिस्टम अलग लॉन्चर और मिसाइल आधारित व्यवस्था पर निर्भर करते हैं. इस तरह भारत में एंटी-ड्रोन रक्षा के लिए अलग-अलग स्तरों पर तकनीकी विकल्प विकसित किए जा रहे हैं.
किन देशों के पास है एंटी-ड्रोन बुलेट बनाने की क्षमता?
ड्रोन के बढ़ते खतरे के बीच कई देशों ने छोटे हथियारों से दागे जाने वाले विशेष गोला-बारूद पर काम शुरू किया है. रूस और यूक्रेन इस तकनीक के शुरुआती विकासकर्ताओं में शामिल हैं. इनके अलावा तुर्की और लिथुआनिया में भी इस तरह के गोला-बारूद विकसित किए गए हैं.
यूक्रेन के रक्षा तकनीकी क्लस्टर ब्रेव-1 ने होरोशॉक नाम से 5.56 एमएम एंटी-ड्रोन कारतूस विकसित किया है. इसमें गोली दागे जाने के बाद पांच छोटे प्रोजेक्टाइल में विभाजित हो जाती है. उपलब्ध विवरण के मुताबिक, इसकी प्रभावी दूरी लगभग 50 मीटर है.
रूस की रक्षा कंपनी रोस्टेक से जुड़ी कंपनी विसोकोतोचका ने म्नोगोटोचिये नाम से एंटी-ड्रोन कारतूस विकसित किया है. यह 5.45 एमएम और 7.62 एमएम कैलिबर में उपलब्ध बताया जाता है. इसके डिजाइन में गोली के हवा में तीन हिस्सों में विभाजित होने की व्यवस्था है. रूसी पक्ष की ओर से इसकी प्रभावी दूरी 300 मीटर तक बताई गई है.
तुर्की की सरकारी रक्षा कंपनी एमकेई ने भी 7.62 एमएम एंटी-ड्रोन गोला-बारूद का परीक्षण किया है. वहीं, लिथुआनिया की कंपनी ट्रिपल जी ने लातविया के सहयोग से 5.56 एमएम और 7.62 एमएम की काउंटर-ड्रोन बुलेट विकसित की हैं. इनके बारे में लगभग 100 मीटर तक की दूरी पर ड्रोन को निष्क्रिय करने की क्षमता का दावा किया गया है.
इटली और फ्रांस में भी इस क्षेत्र में काम हो रहा है. बेनेली की एएलडीए तकनीक विशेष शॉटगन कारतूस पर आधारित है. इसका इस्तेमाल छोटे ड्रोन को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है. अमेरिका में भी छोटे हथियारों से दागे जाने वाले काइनेटिक एंटी-ड्रोन गोला-बारूद के परीक्षण किए जा रहे हैं.
इन देशों में तकनीक के विकास और परीक्षण की स्थिति अलग-अलग है. इसलिए सभी को एक समान परिचालन क्षमता वाला मानना उचित नहीं होगा.
सिर्फ एक दर्जन कर्मचारियों के साथ रक्षा क्षेत्र में उतरी कंपनी
काली म्यूनिशन्स की एक और खासियत इसका छोटा आकार है. आदित्य सिंह के मुताबिक, नोएडा स्थित उनकी कंपनी में लगभग एक दर्जन कर्मचारी हैं. इसके बावजूद कंपनी ने रक्षा क्षेत्र के लिए विशेष गोला-बारूद विकसित करने का काम किया है.
कंपनी खुद को भारतीय सशस्त्र बलों के लिए अगली पीढ़ी के स्वदेशी समाधान विकसित करने वाली रक्षा और अंतरिक्ष विनिर्माण इकाई होने का दावा करती है. उसका जोर ऐसे उत्पाद विकसित करने पर है, जिन्हें मौजूदा सैन्य उपकरणों के साथ इस्तेमाल किया जा सके.
यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो 2026 में इस उत्पाद का प्रदर्शन इसी दिशा में कंपनी की पहल को सामने लाता है. कंपनी के अनुसार, उसका लक्ष्य पहले घरेलू मांग को पूरा करना और उसके बाद निर्यात बाजार में प्रवेश करना है.
मेक इन इंडिया के लिए क्या मायने रखती है यह तकनीक?
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल हथियारों का देश में निर्माण करना नहीं है, बल्कि जरूरी तकनीक और उसके उत्पादन की क्षमता भी देश में विकसित करना है. काली म्यूनिशन्स की एंटी-ड्रोन बुलेट इसी दिशा में एक निजी कंपनी की पहल है.
यदि इस गोला-बारूद की प्रभावशीलता, गुणवत्ता और बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता प्रमाणित होती है, तो यह भारतीय सुरक्षा बलों के लिए एक अतिरिक्त विकल्प बन सकता है. साथ ही, भविष्य में इसके निर्यात की संभावनाएं भी खुल सकती हैं.
हालांकि, किसी स्वदेशी रक्षा उत्पाद की सफलता का आकलन केवल उसके विकास या प्रदर्शन से नहीं किया जा सकता. इसके लिए परीक्षण के नतीजे, सुरक्षा मानक, उत्पादन क्षमता, लागत और वास्तविक परिचालन प्रदर्शन भी महत्वपूर्ण होंगे.
यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो में काली म्यूनिशन्स की मौजूदगी इस बात को रेखांकित करती है कि देश में निजी कंपनियां भी रक्षा क्षेत्र की विशिष्ट जरूरतों के लिए तकनीक विकसित कर रही हैं. अब इस उत्पाद के सामने अगली चुनौती इसकी विश्वसनीयता और बड़े पैमाने पर उपयोग की क्षमता साबित करने की होगी.




