बेटी की शादी, दामाद को चमकाना और पार्टी पर कब्जा... मायावती का ऐसे बढ़ा आकाश और अशोक सिद्धार्थ से टकराव, EXCLUSIVE
बेटी की शादी के बाद दामाद को आगे करने की जिद में अशोक सिद्धार्थ मायावती की हिट लिस्ट में आए. आकाश आनंद की वापसी से BSP में वर्चस्व की जंग तेज हुई और पार्टी पर कब्जे की कोशिश नाकाम हो गई.
बहुजन समाज पार्टी (BSP) में मायावती और अशोक सिद्धार्थ के बीच आई दरार को सिर्फ एक राजनीतिक फैसले की कहानी मानना शायद अधूरा होगा. इसके पीछे एक ऐसा पारिवारिक रिश्ता भी है, जिसने वक्त के साथ पार्टी के भीतर के समीकरण ने बदल दिए. यह रिश्ता है अशोक सिद्धार्थ की बेटी डॉ. प्रज्ञा सिद्धार्थ और मायावती के भतीजे आकाश आनंद की शादी का. वरिष्ठ पत्रकार हेमंत तिवारी के मुताबिक, यही शादी आगे चलकर मायावती और सिद्धार्थ के बीच बढ़ती खटास की अहम कड़ी बनी.
शादी हुई, रिश्ता मजबूत हुआ या शक की शुरुआत?
शादी के वक्त शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही रिश्ता आगे चलकर बसपा के सत्ता-समीकरण में इतनी बड़ी भूमिका निभाएगा. शुरुआत में अशोक सिद्धार्थ पर मायावती का भरोसा कायम रहा. वह संगठन में अहम जिम्मेदारियां संभालते रहे और पार्टी के भीतर उनकी हैसियत मजबूत बनी रही.
लेकिन पार्टी के भीतर उनका विरोध करने वाले लोगों को यह रिश्ता पसंद नहीं आया. तिवारी के मुताबिक, सिद्धार्थ के विरोधी धीरे-धीरे उनके कामकाज, फैसलों और संगठन में उनकी भूमिका को लेकर सवाल मायावती तक पहुंचाते रहे. आरोपों की इस फेहरिस्त में निजी हित साधने और पार्टी के कुछ पदाधिकारियों की कथित गतिविधियों पर सवाल उठाना भी शामिल था.
सिद्धार्थ की सबसे बड़ी ताकत ही उनके खिलाफ कैसे गई?
अशोक सिद्धार्थ को बसपा के संगठन में काफी प्रभावशाली माना जाता था. उन्हें कई राज्यों का प्रभारी बनाया गया और पार्टी के अलग-अलग हिस्सों में उनकी पहुंच बनी. तिवारी का कहना है कि इसी वजह से उन्हें यह जानकारी भी रहती थी कि संगठन में कौन क्या कर रहा है और कहां गड़बड़ी की शिकायतें सामने आ रही हैं.
सिद्धार्थ की ओर से ऐसी गतिविधियों पर सवाल उठाए जाने की बात कही जाती है. लेकिन यही सक्रियता उनके विरोधियों को नागवार गुजरने लगी. धीरे-धीरे उनके खिलाफ एक ऐसा गुट तैयार होने लगा, जो उनकी भूमिका को लेकर मायावती के सामने अपनी शिकायतें रखता था.
फिर कहानी में आया आकाश आनंद का राजनीतिक उभार
इसी बीच आकाश आनंद का राजनीतिक कद बढ़ने लगा. बसपा में वह मायावती के बाद नई पीढ़ी के प्रमुख चेहरे के तौर पर उभरे. पार्टी के कार्यक्रमों से लेकर संगठनात्मक गतिविधियों तक उनकी मौजूदगी बढ़ती गई. लेकिन यहां एक और रिश्ता सबकी नजर में था- आकाश आनंद, अशोक सिद्धार्थ के दामाद थे.
हेमंत तिवारी के मुताबिक, बसपा के अंदर सिद्धार्थ के विरोधियों ने इसी रिश्ते को राजनीतिक चश्मे से देखना शुरू किया. उनका आरोप था कि सिद्धार्थ अपने दामाद आकाश को पार्टी में लगातार मजबूत कर रहे हैं और उन्हें शीर्ष नेतृत्व में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं.
'दामाद को चमकाने' का नैरेटिव कैसे बना?
यहीं से वह कहानी शुरू होती है, जिसने आगे चलकर मायावती और सिद्धार्थ के रिश्ते को प्रभावित किया. सिद्धार्थ विरोधी गुट की ओर से यह धारणा बनाई गई कि वह पार्टी के हित से ज्यादा आकाश आनंद के राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित हैं.
आरोप यहां तक लगाया गया कि आकाश को मजबूत करके सिद्धार्थ अप्रत्यक्ष रूप से पार्टी में अपना प्रभाव बनाए रखना चाहते हैं. यानी दामाद का राजनीतिक कद बढ़े और उसके साथ ससुर का प्रभाव भी कायम रहे.
वरिष्ठ पत्रकार तिवारी के मुताबिक, यही बात धीरे-धीरे मायावती के सामने रखी गई. दावा किया गया कि सिद्धार्थ पार्टी को मजबूत करने के बजाय आकाश को 'चमकाने' में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं.
यह आरोप सही था या पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी का हिस्सा, इसका अलग-अलग पक्षों से अलग-अलग आकलन हो सकता है. लेकिन तिवारी का दावा है कि इस धारणा ने मायावती की सोच को प्रभावित किया.
क्या मायावती के 'कॉकस' ने सिद्धार्थ के खिलाफ माहौल बनाया?
बसपा में मायावती के आसपास रहने वाले लोगों की भूमिका को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है. पत्रकार तिवारी का कहना है कि सिद्धार्थ के विरोधियों ने इसी घेरे के जरिए अपनी बात मायावती तक पहुंचाई.
उनका दावा है कि मायावती के आसपास सक्रिय लोगों ने यह धारणा मजबूत की कि सिद्धार्थ आकाश आनंद को आगे बढ़ाकर संगठन में अपना प्रभाव कायम रखना चाहते हैं. यही वह बिंदु था जहां पारिवारिक रिश्ता धीरे-धीरे राजनीतिक शक में बदलने लगा.
सतीश चंद्र मिश्रा की भूमिका पर भी उठे सवाल
इस पूरे घटनाक्रम में सतीश चंद्र मिश्रा का नाम भी सामने आता है. तिवारी के मुताबिक, संभव है कि मायावती के आसपास सक्रिय उस समूह में मिश्रा की भी भूमिका रही हो, जिसने सिद्धार्थ के खिलाफ नकारात्मक धारणा बनाने में योगदान दिया.
हालांकि, यह एक दावा है और असल सवाल यही है कि मायावती तक सिद्धार्थ के खिलाफ जो बातें पहुंचीं, उनमें किसकी कितनी भूमिका थी.
जिस पर कभी सबसे ज्यादा भरोसा, वही निशाने पर कैसे?
अशोक सिद्धार्थ की कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है. तिवारी के मुताबिक, मायावती ने ही उन्हें संगठन में लगातार बड़ी जिम्मेदारियां दीं. वह महासचिव बने, राज्यसभा पहुंचे और विधान परिषद के सदस्य भी रहे. कई राज्यों की जिम्मेदारी संभालने के कारण संगठन में उनकी पहुंच और प्रभाव काफी व्यापक था. यानी कभी सिद्धार्थ मायावती के भरोसे के केंद्र में थे. लेकिन समय के साथ तस्वीर बदलती गई.
हेमंत तिवारी के अनुसार यह दौर एक तरफ आकाश आनंद का राजनीतिक उभार था, दूसरी तरफ उनके ससुर सिद्धार्थ की संगठन में मजबूत पकड़. दोनों के रिश्तों को जोड़कर पार्टी के भीतर एक ऐसा नैरेटिव बना, जिसमें सिद्धार्थ पर अपने दामाद को आगे बढ़ाने और उसके जरिए पार्टी में प्रभाव बनाए रखने के आरोप लगने लगे.
असली टकराव आकाश से या सिद्धार्थ से?
वरिष्ठ पत्रकार तिवारी के मुताबिक, इस पूरी कहानी का सबसे अहम पहलू यही है कि मायावती की नाराजगी को सिर्फ आकाश आनंद से जोड़कर देखना सही तस्वीर नहीं देता. उनके अनुसार, असली टकराव अशोक सिद्धार्थ की भूमिका और उनके बारे में मायावती के मन में बनी धारणा को लेकर था.
और यही वह मोड़ है जहां बेटी की शादी से शुरू हुआ पारिवारिक रिश्ता, दामाद के राजनीतिक उभार से जुड़ा और आखिरकार पार्टी के भीतर सत्ता-समीकरण का सवाल बन गया.
सिद्धार्थ के विरोधियों ने जो तस्वीर मायावती के सामने रखी, उसमें दामाद आकाश आनंद का बढ़ता कद और ससुर अशोक सिद्धार्थ का संगठनात्मक प्रभाव एक-दूसरे से जुड़ा हुआ दिखाई दिया. तिवारी के दावों के मुताबिक, इसी धारणा ने उस नेता को मायावती की नजरों में कमजोर कर दिया, जो कभी उनके सबसे भरोसेमंद और ताकतवर सहयोगियों में गिना जाता था.
यानी बसपा की इस अंदरूनी कहानी में शादी सिर्फ एक पारिवारिक घटना नहीं रही- वह आगे चलकर पार्टी के भीतर बदलते रिश्तों और शक्ति-संतुलन की अहम कड़ी बन गई.




