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पंथक बनाम भिंडरावाले की विरासत! एक गठबंधन और पंजाब में बदल सकते हैं समीकरण, कैसे चौंका सकता है वारिस पंजाब दे? Expert View

पंजाब में अकाली दल-BJP गठबंधन की संभावना और वारिस पंजाब दे की सक्रियता से 2027 के चुनावी समीकरण कैसे बदल सकते हैं? एक्सपर्ट से समझिए पंथक सियासत का पूरा गणित.

पंथक बनाम भिंडरावाले की विरासत! एक गठबंधन और पंजाब में बदल सकते हैं समीकरण, कैसे चौंका सकता है वारिस पंजाब दे? Expert View
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पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राज्य की राजनीति में पंथक मुद्दे एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं. सवाल यह है कि सिख मतदाताओं के बीच पंथक राजनीति का कितना प्रभाव है और जरनैल सिंह भिंडरावाले की विरासत से जुड़ी राजनीति को कितना समर्थन मिल रहा है? इस सियासी लड़ाई में शिरोमणि अकाली दल, आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और अमृतपाल सिंह से जुड़ी राजनीति के अपने-अपने दांव हैं. हालांकि, पंथक राजनीति और भिंडरावाले के समर्थकों को दो अलग-अलग वोट बैंक मानना सही नहीं होगा. ऐसा इसलिए कि भिंडरावाले से जुड़ी पहचान भी व्यापक पंथक राजनीति के दायरे में आती है. ऐसे में 2027 के चुनाव में असली सवाल यह है कि सिख पहचान, धार्मिक मुद्दों और पंजाब के अधिकारों से जुड़ी राजनीति का फायदा किस पार्टी को मिलेगा?

पंजाब में सिख मतदाताओं का कितना बड़ा प्रभाव?

पंजाब की आबादी में सिख समुदाय की हिस्सेदारी करीब 58 प्रतिशत बताई जाती है. यही वजह है कि राज्य की राजनीति में सिख मतदाताओं की भूमिका बेहद अहम है. पंजाब की सीनियर जर्नलिस्ट वंदना शर्मा का कहना है, "सिख मतदाता किसी एक राजनीतिक दल या विचारधारा के साथ नहीं जुड़े हैं. इनमें अधिकांश शिरोमणि अकाली दल के ट्रेडिशनल समर्थक, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी से जुड़े मतदाता, बीजेपी समर्थक और अलग-अलग पंथक विचारधारा से जुड़े लोग शामिल हैं." धार्मिक मुद्दों को मतदान का आधार बनाने वाले सिख मतदाताओं की संख्या को लेकर 20 से 25 प्रतिशत तक का एक अनुमान सामने आया है, लेकिन इसे किसी आधिकारिक या राज्यव्यापी सर्वे का नतीजा नहीं माना जा सकता. इसलिए इस आंकड़े के आधार पर पूरे सिख वोट बैंक की राजनीतिक पसंद तय करना ठीक नहीं होगा.

पंथक राजनीति और भिंडरावाले की विरासत में क्या अंतर?

पंथक राजनीति का दायरा काफी व्यापक है. इसमें सिख धर्म और धार्मिक परंपराओं की रक्षा, श्री अकाल तख्त साहिब की मर्यादा, बेअदबी के मामलों में न्याय, बंदी सिंहों की रिहाई, सिख संस्थाओं के अधिकार और पंजाब के धार्मिक-सामाजिक हित जैसे मुद्दे शामिल हैं. इन मुद्दों को उठाने वाला हर व्यक्ति किसी एक राजनीतिक दल या विचारधारा का समर्थक हो, यह जरूरी नहीं है.

वंदना शर्मा के अनुसार जरनैल सिंह भिंडरावाले की विरासत से जुड़ी राजनीति में उनके नाम, तस्वीर और प्रतीकों का इस्तेमाल, उनके विचारों को लेकर विमर्श और सिख पहचान तथा स्वायत्तता से जुड़े कुछ अधिक तीखे राजनीतिक मुद्दे शामिल होते हैं. इस राजनीति के अलग-अलग समर्थकों की सोच भी एक जैसी नहीं है. इसलिए हर पंथक मतदाता को भिंडरावाले का समर्थक मानना गलत होगा. इसी तरह बेअदबी के खिलाफ आवाज उठाने या बंदी सिंहों की रिहाई की मांग करने वाले हर व्यक्ति को किसी खास विचारधारा से जोड़ना भी सही नहीं है.

2027 में किस पार्टी के पास कितना सियासी आधार?

पंजाब में पंथक राजनीति की जमीन पर कई दल और संगठन अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व वाला शिरोमणि अकाली दल पारंपरिक पंथक राजनीति, ग्रामीण सिख मतदाताओं और अपने पुराने संगठनात्मक आधार पर भरोसा कर रहा है.

दूसरी ओर, अमृतपाल सिंह और उनसे जुड़े वारिस पंजाब दे की राजनीति में सिख पहचान, धार्मिक प्रतीकों और पंजाब के अधिकारों से जुड़े मुद्दे प्रमुखता से उठते रहे हैं. ज्ञानी हरप्रीत सिंह से जुड़ा अकाली दल (पुनर सुरजीत) भी पंथक राजनीति में अपनी अलग जगह बनाने की कोशिश कर रहा है. सिमरनजीत सिंह मान का शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) भी इसी राजनीतिक धारा का एक दावेदार है.

इनके अलावा आम आदमी पार्टी की रणनीति शासन, कल्याणकारी योजनाओं और मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व के इर्द-गिर्द है. कांग्रेस ग्रामीण और शहरी मतदाताओं के साथ सिख और हिंदू समुदायों के बीच अपना आधार बनाए रखने की कोशिश कर रही है. वहीं, बीजेपी का जोर शहरी और हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के साथ सिख समुदाय में राजनीतिक विस्तार पर है.

2022 चुनावों के नतीजे पंथक राजनीति से क्या मिले थे संकेत?

पंजाब के पिछले चुनावों के नतीजे बताते हैं कि धार्मिक पहचान और पंथक मुद्दे प्रदेश की राजनीति में अहम माने जाते हैं, लेकिन चुनावी जीत केवल इन्हीं के आधार पर तय नहीं होती. 2022 के विधानसभा चुनाव में माझा क्षेत्र की 25 सीटों में से आम आदमी पार्टी ने 16 सीटें जीती थीं. कांग्रेस को सात और शिरोमणि अकाली दल को एक सीट मिली थी. इससे साफ हुआ कि पारंपरिक राजनीतिक आधार के बावजूद मतदाता शासन, नेतृत्व और दूसरे स्थानीय मुद्दों के आधार पर भी अपना फैसला लेते हैं.

2024 के लोकसभा चुनाव में अमृतपाल सिंह ने खडूर साहिब सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत दर्ज की. इस जीत ने उन्हें पंजाब की राजनीति में एक अहम चेहरा बना दिया और पंथक राजनीति में उनकी भूमिका को लेकर चर्चा तेज कर दी. वहीं, 2015 की बेअदबी की घटनाओं और उसके बाद हुई राजनीतिक उठापटक ने शिरोमणि अकाली दल की पारंपरिक पंथक छवि को नुकसान पहुंचाया. अब इसी राजनीतिक जगह पर कई दल और संगठन अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं.

पंथक वोटों का बंटवारा किसे पहुंचा सकता है फायदा?

2027 के विधानसभा चुनाव में पंथक राजनीति का मुकाबला केवल शिरोमणि अकाली दल और आम आदमी पार्टी के बीच सीमित नहीं रहने वाला है. सुखबीर सिंह बादल का शिरोमणि अकाली दल, अमृतपाल सिंह से जुड़ा वारिस पंजाब दे, ज्ञानी हरप्रीत सिंह से जुड़ा अकाली दल (पुनर सुरजीत) और सिमरनजीत सिंह मान का शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) अलग-अलग स्तर पर पंथक राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं.

अगर इन दलों और संगठनों के बीच पंथक मतों का बंटवारा होता है, तो इसका असर दूसरे राजनीतिक दलों के चुनावी समीकरण पर भी पड़ सकता है. हालांकि, इसका सीधा फायदा किसे मिलेगा, यह सीटों पर उम्मीदवारों, स्थानीय समीकरणों और चुनाव के समय मतदाताओं की प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा. कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भी इस बंटवारे से पैदा होने वाली राजनीतिक स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश कर सकती हैं.

क्या भिंडरावाले की विरासत युवाओं पर असर डाल रही है?

पंजाब की राजनीति में एक अहम सवाल यह भी है कि जरनैल सिंह भिंडरावाले की तस्वीरों, प्रतीकों और उनसे जुड़े विमर्श के प्रति युवाओं का आकर्षण कितना है. क्या यह केवल धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा मामला है या इसका असर चुनावी पसंद पर भी पड़ रहा है? इसका जवाब किसी एक घटना, रैली या सोशल मीडिया पर दिखने वाली लोकप्रियता से नहीं दिया जा सकता.

क्या पंथक राजनीति तय करेगी 2027 का सत्ता समीकरण?

2027 के चुनाव में पंथक राजनीति एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती है, लेकिन इसे सत्ता का अकेला निर्णायक मानना जल्दबाजी होगी. बेअदबी, बंदी सिखों की रिहाई, धार्मिक संस्थाओं की मर्यादा और सिख पहचान जैसे मुद्दों के साथ बेरोजगारी, नशा, खेती, कानून-व्यवस्था और सरकार के कामकाज का भी मतदाताओं पर असर पड़ेगा.

असली लड़ाई इस बात की होगी कि कौन-सी पार्टी धार्मिक और राजनीतिक मुद्दों को जनता की रोजमर्रा की समस्याओं से जोड़कर भरोसा हासिल कर पाती है. ऐसे में पंथक वोटों का बंटवारा, भिंडरावाले की विरासत को लेकर राजनीतिक दावेदारी और युवा मतदाताओं का रुख 2027 के चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकता है.

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