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तलाक केस में वर्जिनिटी टेस्ट पर हाईकोर्ट सख्त, खारिज की पति की याचिका, कहा- हाइमन से नहीं तय होगा कैरेक्टर

तलाक से जुड़े एक मामले में उच्च न्यायालय ने वर्जिनिटी टेस्ट की मांग पर कड़ा रुख अपनाते हुए पति की याचिका को ठुकरा दिया. अदालत ने साफ किया कि तलाक के लिए यह मांग बिल्कुल जायज नहीं है.

तलाक केस में वर्जिनिटी टेस्ट पर हाईकोर्ट सख्त, खारिज की पति की याचिका, कहा- हाइमन से नहीं तय होगा कैरेक्टर
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( Image Source:  AI SORA )
हेमा पंत
Edited By: हेमा पंत

Updated on: 28 Jan 2026 6:54 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के सामने एक ऐसा मामला आया, जिसने निजता, वैवाहिक अधिकारों और कानून की सीमाओं पर अहम सवाल खड़े कर दिए. एक पति ने अदालत से मांग की कि उसकी पत्नी का वर्जिनिटी टेस्ट, यानी कथित टू-फिंगर टेस्ट कराया जाए, क्योंकि वह शारीरिक संबंध बनाने से इनकार कर रही है.

पति का दावा था कि यह बात उसकी तलाक याचिका में लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए जरूरी है. लेकिन अदालत ने इस मांग को सिरे से खारिज करते हुए साफ कहा कि ऐसा कोई भी टेस्ट महिला की निजी गरिमा और अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है.

पति ने रखी वर्जिनिटी टेस्ट की मांग

दरअसल पति ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि उसकी पत्नी वैवाहिक संबंधों से लगातार दूरी बना रही है, जिसे उसने मानसिक उत्पीड़न बताया. उसने अदालत से अपनी पत्नी की वर्जिनिटी टेस्ट, यानी कथित टू-फिंगर टेस्ट कराने की मांग की, ताकि यह साफ हो सके कि क्या उसका अतीत में किसी के साथ शारीरिक संबंध रहा है या वह किसी असामान्य यौन घटना का सामना कर चुकी है. परिवार न्यायालय ने इस अनुरोध को खारिज कर दिया. इसके बाद पति ने उच्च न्यायालय में अपील दायर की.

हाईकोर्ट का फैसला

न्यायमूर्ति विवेक जैन की एक सदस्यीय खंडपीठ ने साफ शब्दों में कहा कि किसी महिला को इस तरह की मेडिकल जांच के लिए मजबूर करना उसके निजी दायरे पर सीधा हमला है. न्यायालय ने टिप्पणी की कि शादी के रिश्ते में झगड़ा होने से किसी व्यक्ति के बुनियादी अधिकार समाप्त नहीं हो जाते हैं. ऐसे मामलों में भी गोपनीयता का अधिकार पूरी तरह से प्रभावी रहता है.

तलाक का आधार नहीं है सिर्फ इनकार

न्यायालय ने आगे यह भी कहा कि संबंध बनाने से इंकार भर को तलाक का सही कारण नहीं माना जा सकता है. यह परिस्थिति न तो हिंदू विवाह कानून की धाराओं 11 या 12 के अंतर्गत विवाह को अवैध ठहराने का आधार है, और न ही धारा 13 के तहत विच्छेद का स्वायत्त कारण बनती है.

वैज्ञानिक आधार भी नहीं

हाईकोर्ट ने मेडिकल तथ्यों का हवाला देते हुए कहा कि हाइमन की कंडीशन से किसी महिला के सेक्सुअल लाइफ का फैसला करना सही नहीं है. कई बार शारीरिक संबंध बनाने के बाद भी हाइमन की लेयर सेफ रह सकती है, जबकि बिना किसी फिजिकल रिलेशन के बाद भी यह टूट या डैमेज हो जाती है.



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