अग्रिम जमानत-3 समन फिर भी नहीं पेश-बेटा रहा फरार, ट्विशा शर्मा की सास गिरिबाला के सामने कैसे बौना बना कानून?
10 दिन से फरार चल रहे ट्विशा शर्मा के आरोपी समर्थ सिंह ने आखिरकार 22 मई 2026 को खुद को पुलिस के हवाले कर दिया, लेकिन 3 बार पूछताछ के लिए समन भेजने के बाद रिटायर्ड जज गिरिबाला पहुंची नहीं बल्कि दिखा दिया कि उनके आगे कैसे कानून बोना बन गया?
ये तो सुना ही होगा कि 'कानून के हाथ लंबे होते हैं' और 'अब का कानून अंधा नहीं है', लेकिन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में यूपी की बिटिया के साथ हो हुआ उसे लेकर सीधा सवाल भोपाल पुलिस से है कि राजधानी पुलिस इतनी लापरवाह कैसे हो सकती है? चर्चित ट्विशा शर्मा संदिग्ध मौत मामले में कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
रिटायर्ड जज गिरिबाला को तीन समन भेजने के बाद भी वो पूछताछ के लिए नहीं पहुंचीृ और उनका पुत्र समर्थ सिंह कानून की नजरों से ऐसे भागते रहा जैसे इनके लिए कानून एक 'खिलवाड़' है. और क्यों न हो? जब कानून का चोला पहनकर न्याय देने की बदौलत अपने ही घर की बहू के साथ जो अन्याय कर बैठे थे जब बात बेटे की आई तो 'सुपुत्र' को बचाने के लिए अपनी सारी ताकत लगा दी और बेटे को इधर- से उधर गुमराह करती है.
जज सास गिरिबाला के सामने कैसे बौना बना कानून?
जांच से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, ट्विशा शर्मा केस में समर्थ सिंह को तीन बार पूछताछ के लिए समन जारी किए गए, लेकिन वे जांच एजेंसियों के सामने पेश नहीं हुए. आरोप है कि समन के बावजूद लगातार अनुपस्थित रहने से जांच प्रक्रिया प्रभावित हो रही है और पुलिस अब आगे की कानूनी कार्रवाई पर विचार कर रही है.
परिवार और शिकायतकर्ताओं का कहना है कि समर्थ सिंह का 10 दिनों तक फरार रहना गंभीर सवाल खड़े करता है. उनका आरोप है कि इतने महत्वपूर्ण मामले में आरोपी का इस तरह गायब रहना कानून व्यवस्था पर सीधा सवाल है. हालांकि, दूसरी तरफ कानूनी पक्ष का कहना है कि आरोपी की ओर से अग्रिम जमानत की कानूनी प्रक्रिया अपनाई गई है, और मामला अदालत में विचाराधीन है.
जज सास गिरिबाला सिंह पर क्या हैं आरोप?
मृतका के परिवार ने आरोप लगाया है कि रिटायर्ड जज गिरिबाला सिंह ने अपने पद और संपर्कों का इस्तेमाल कर बेटे को बचाने की कोशिश की. आरोपों में कहा गया है कि अग्रिम जमानत की कोशिश की गई. जांच एजेंसियों और अधिकारियों से संपर्क के आरोप शुरुआती जांच को प्रभावित करने की कोशिश. मीडिया के सामने बचाव में बयान देकर नैरेटिव बदलने का प्रयास हालांकि, अभी तक इन सभी आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच एजेंसियों द्वारा नहीं की गई है.
कानूनी रणनीति और जमानत की प्रक्रिया
जानकारी के अनुसार, समर्थ सिंह की ओर से पहले भोपाल सत्र न्यायालय में अग्रिम जमानत याचिका दाखिल की गई थी, जिसे खारिज कर दिया गया था. इसके बाद मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा, जहां कानूनी रणनीति में बदलाव के बाद याचिका वापस लेने की स्थिति भी सामने आई.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट और जांच पर विवाद
इस केस में सबसे संवेदनशील मुद्दा पोस्टमार्टम रिपोर्ट और फॉरेंसिक जांच को लेकर है. परिवार का दावा है कि शुरुआती पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर सवाल उठे. चोटों का पूरा विवरण सामने नहीं आया. आत्महत्या या हत्या को लेकर स्पष्ट निष्कर्ष नहीं था. वहीं अब दूसरी पोस्टमार्टम और AIIMS की फॉरेंसिक टीम की जांच को बेहद अहम माना जा रहा है, जिससे मामले की दिशा बदल सकती है.
परिवार का आरोप: जांच को दबाने की कोशिश
मृतका के पिता नवनिधि शर्मा ने आरोप लगाया है कि मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने कहा कि 'हर कोई इस मामले को दबाने की कोशिश कर रहा है. रिपोर्ट खुद कह रही है कि शरीर पर कई एंटी मॉर्टम इंजरी थीं. फिर ये चोटें कैसे आईं? रिपोर्ट में यह भी नहीं लिखा कि यह आत्महत्या थी या किसी ने जबरन कर दिया. हम अदालत और सभी लोगों से फिर मांग कर रहे हैं कि दूसरा पोस्टमार्टम कराया जाए ताकि हर पहलू की जांच हो सके. मैं सिर्फ़ अपनी बेटी के लिए न्याय चाहता हूं.'
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