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Umar-Sharjeel Bail: ट्रायल शुरू कराने के बजाए जमानत-जमानत खेल रहे मोटी फीस वाले वकील, क्यों दिलाएंगे शरजील-उमर खालिद को रिहाई?

उमर खालिद .और शरजील इमाम की जमानत को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई पर यह रिपोर्ट एक अलग और तीखा नजरिया पेश करती है. वरिष्ठ वकील व पूर्व DCP एल.एन. राव का दावा है कि UAPA कानून जितना जटिल बताया जाता है, असल में मामला उतना उलझा नहीं है. उनके अनुसार, हाई-प्रोफाइल वकील ट्रायल शुरू कराने के बजाय बार-बार जमानत याचिकाओं में उलझाकर मामला खींच रहे हैं, जिससे पिछले पांच साल में भी सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी.

Umar-Sharjeel Bail: ट्रायल शुरू कराने के बजाए जमानत-जमानत खेल रहे मोटी फीस वाले वकील, क्यों दिलाएंगे शरजील-उमर खालिद को रिहाई?
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संजीव चौहान
By: संजीव चौहान

Published on: 16 Jan 2026 6:34 PM

अब से करीब 59 साल पहले बना यूएपीए (गैर कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम 1967 यानी UAPA - Unlawful Activities Prevention Act 1967) लंबे समय से दिल्ली दंगों के फेर में फंसकर जेल में कैद, शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत नहीं होने दे रहा है. जमाना यही मानकर चल रहा है. हालांकि ऐसा कतई नही है. सच इसके एकदम विपरीत है. अपने जन्म के इन 59 साल में करीब 7 बार संशोधित हो चुका यह अधिनियम आखिर है क्या? और क्या वाकई में इसी सख्त कानून के तहत शरजील इमाम व उमर खालिद जेल से बाहर खुली हवा में सांस लेने के लिए तरस रहे है?

इन्हीं तमाम सवालों और यूएपीए कानून को जानने-समझने के लिए स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर क्राइम इनवेस्टीगेशन ने नई दिल्ली में विशेष बात की इस कानून और शरजील इमाम-उमर खालिद जैसों से अक्सर अदालतों में कानूनी दांव-पेंच आजमाते रहने वाले दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के रिटायर्ड डीसीपी एल एन राव से, जोकि दिल्ली हाईकोर्ट और देश के सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ काउंसिल भी हैं.

दुनिया को सब दिखाई दे रहा है

दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल में कई दशक नौकरी करते रहने के दौरान शरजील इमाम व उमर खालिद जैसे मंझे हुए मास्टरमाइंडों से निपटते रहने के अनुभवी पूर्व डीसीपी एल एन राव कहते हैं, “शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत का मसला उतना उलझा हुआ है नहीं जितना इसे उलझा कर रखा गया है. यह मेरी निजी सोच है. साथ ही यह बात मैं एक वकील और एक पूर्व पुलिस अधिकारी दोनों के ही अनुभव और हैसियत से कह रहा हूं. इस मुकदमे पर मेरी पैनी नजर शुरू से ही बनी हुई है. जो कुछ मुझे दिखाई दे रहा है उसके मुताबिक शरजील इमाम और उमर खालिद के पैरोकार वकीलों में देश के नामी-गिरामी महंगे वकीलों की लंबी फौज शामिल है. जिनका प्रमुख उद्देश्य किसी भी ऐसे हाईप्रोफाइल मामले-मुकदमे में खुद की पब्लिसिटी और मूल उद्देश्य मोटी से मोटी ज्यादा से ज्यादा फीस वसूलना रहता है. मैं किसी वकील विशेष की बात नहीं कर रहा हूं. मैं यह वही सब बोल रहा हूं जिसे जमाना अपनी आंखों से उमर खालिद और शरजील इमाम के जमानत मैटर में देख-सुन रहा है.”

बेतुकी बहसों में 5 साल गुजर गए

‘जब से शरजील इमाम और उमर खालिद दिल्ली दंगों के आरोप में गिरफ्तार होकर जेल में बंद हैं (करीब पांच साल से) तभी से उनकी जमानत की हर तारीख पर सिवाए शोर और तमाशे के कुछ नहीं होता है. सुप्रीम कोर्ट से जमानत अर्जी रद्द होने के बाद दो चार दिन मीडिया में शोर-शराबा मचता है. पीड़ित परिवार भी अपनी अपनी आपबीती कह-सुन और सुनाकर ठंडे होकर घर में बैठ जाते हैं. इस उम्मीद के साथ कि वकील साहब अब उनके अपनों को जमानत (शरजील और उमर) दिलाने के लिए कोर्ट में अगली तारीख पर जबरदस्त बहस करेंगे. तब शायद जमानत मिल जाए. यह सब होते करते देख लीजिए कैसे 5 साल का लंबा वक्त गुजर चुका है.’

वकीलों के मकड़जाल में फंसे मुलजिम!

मैं अगर एक वकील और पूर्व पुलिस अफसर होने के अपने अनुभव से बयान करूं या जो महसूस कर रहा हूं उसके मुताबिक, “शरजील इमाम और उमर खालिद के मुकदमे को उनके पैरोकार बड़े-बड़े नामी-गिरामी वकीलों ने जमानत-जमानत के बेतुके खेल में उलझा कर रख दिया है. होना यह चाहिए कि इन पैरौकार वकीलों को जमानत-जमानत का बेतुका खेल खेलने की जगह सीधे-सीधे अदालत में ट्रायल शुरू करवाने पर जोर देना चाहिए. मगर ट्रायल अगर शुरू हो जाएगा तब फिर पैरोकार वकीलों को जमानत की हर तारीख पर मिलने वाली मोटी फीस या कहूं कि पगार का रास्ता बंद हो जाएगा. इसलिए इन दोनो ही मुलजिमों के वकील अदालतों में जमानत-जमानत खेल कर तारीख पर पेश होने की अपनी मोटी फीस लेकर घर चले जाते हैं. और यह दोनों (शरजील व उमर खालिद) फिर से उसी जेल में बंद रहने को मजबूर हो जाते हैं, जिसमें वे बीते पांच साल से कैद पड़े हैं. अगर वास्तव में इनके पैरोकार वकील पेशे के प्रति ईमानदार हैं और वे वास्तव में अपने मुवक्किलों का भला चाहते हैं तो फिर वे इनकी जमानत पर बहसें करने के बजाए सीधे-सीधे कोर्ट से अपील क्यों नहीं करते कि ट्रायल शुरू किया जाए. फिर चाहे सजा हो या फिर बहाली.”

पांच साथियों को जमानत बाकी दो...

स्टेट मिरर हिंदी से खास बातचीत में दिल्ली उच्च न्यायालय और देश के सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ क्रिमिनल लॉयर एल एन राव कहते है, “मैं अगर मुलजिमों का पैरोकार वकील होऊं तो यूएपीए जैसे सख्त कानून में अपनी मुवक्किलों की जमानत की अर्जी पर अर्जी कदापि अदालतों में न लगाऊं. मैं तो सीधे-सीधे सुप्रीम कोर्ट या संबंधित अदालत से ट्रायल शुरू करने का आग्रह ही करूंगा. यही सही रास्ता भी है. यूएपीए अधिनियम कोई हल्का-फुल्का कानून नहीं है कि जिसे कोई भी वकील अपने तिकड़मी दिमाग या वकालत के बलबूते जैसे चाहे मुवक्किलों के फेवर में घुमा-फिरा लेगा.

हां इतना जरूर है कि अगर यह कानून सख्त है तो कहीं न कहीं सही भी है. भले ही शरजील इमाम और उमर खालिद को पांच साल से जमानत न मिल रही हो. मगर इसी कानून में गिरफ्तार इनके पांच अन्य साथियों मोहम्मद सलीम ख़ान, मीरान हैदर, शिफ़ा उर रहमान, गुलफ़िशा फ़ातिमा तथा शादाब अहमद को सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस अरविंद कुमार-जस्टिस एनवी अंजारिया की डबल बेंच ने जमानत पर रिहा भी किया है. इस दलील के साथ कि जमानत पर रिहा किए जा रहे पांच अभियुक्तों की तुलना में उमर ख़ालिद व शरजील इमाम की भूमिकाएं दिल्ली दंगों के मामले में अलग हैं.”

क्या है मामला-मुकदमा?

जिक्र जब यूएपीए जैसे सख्त कानून की जद में फंसे दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को पांच साल से जमानत न मिलने का हो तब यह भी बताना जरूरी है कि उमर खालिद और शरजील समेत सभी सात अभियुक्तों के खिलाफ साल 2019 में सीएए (नागरिकता संशोधन क़ानून) विरोध प्रदर्शनों की आड़ लेकर, फरवरी 2020 में देश की राजधानी दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा भड़काने का षडयंत्र रचने का आरोप है. तभी से जेल में बंद पड़े शरजील इमाम और उमर खालिद की दलील रही है कि वे पांच साल से ज़्यादा समय से जेल में हैं, फिर भी ट्रायल शुरू नहीं हुआ है. अनलॉफुल एंड ऐक्टिविटिज प्रिवेंशन एक्ट यानी यूएपीए में लंबे समय से जेल में बंद पड़े उमर ख़ालिद के ख़िलाफ़ दो अलग-अलग मुकदमे दर्ज हुए थे. एफआईआर नंबर 101/2020, 24 फरवरी 2020 को उत्तर पूर्वी दिल्ली में दर्ज कराया गया. जिसमें उमर खालिद के ऊपर दिल्ली में दंगा कराने, पत्थरबाजी और बमबाजी करने-कराने, दो धर्मों के बीच नफरत फैलाने, पुलिस पर हमला करने और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने-पहुंचवाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए.”

क्या है UAPA और इसका इतिहास?

यूएपीए कानून पर बात करते हुए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ क्रिमिनल लॉयर एल एन राव कहते हैं, “यह कानून भारत में गैर-कानूनी और आतंकवादी गतिविधियों की रोकथाम के उद्देश्य से अब से करीब 59 साल पहले साल 1967 में बना था. ताकि इस कानून के जरिए देश की संप्रभुता-अखंडता को चुनौती देने वाली विध्वंसकारी ताकतों से कानूनन निपटा जा सके और इन पर नियंत्रण पाया जा सका. तब यह कानून देश में अलगाववादी ताकतों से निपटने के लिए बनाया गया था.

इसके बाद इसमें 1969, 1972, 1986, 2004, 2008, 2012 और अब तक अंतिम बार साल 2019 में कुल जमा 7 संशोधन भी हो चुके हैं. भारत की संसद ने जब POTA (पोटा कानून) को वापस लिया तब इसी यूएपीए को संशोधन के बाद और भी ज्यादा सख्त कहिए या फिर मजबूत कर दिया गया. साल 2019 में संशोधन के दौरान इसमें सुधार किया गया कि सरकार बिना किसी मुकदमे के भी इस अधिनियम के तहत किसी को आतंकवादी के रूप में नामित करके 180 दिन तक कैद में बंद रख सकती है.

जमानत-जमानत खेलना बंद करें

जहां तक सवाल फिर वही कि आखिर इसी अधिनियम के तहत बंद पड़े शरजील इमाम और उमर खालिद को बीते पांच साल से जमानत क्यों नहीं मिल पा रही है. तो इस सवाल के जवाब में मैं तो यही कहूंगा कि जब तक मुलजिम पक्ष के वकील यूएपीए कानून में बंद अपने मुवक्किलों की जमानत-जमानत का खेल खेलते रहेंगे, तब तक न तो मुलजिमों को जमानत मिलने की जल्दी संभावनाएं बनती दिखाई दे रही हैं. और ट्रायल तो वैसे भी शुरू कराने पर किसी भी पैरोकार वकील का जोर है ही नहीं. ऐसे में बचाव पक्ष के वकीलों को इस मुकदमे में अपने मुवक्किलों की जमानत से पहले ट्रायल शुरू करवाने की दरखास माननीय उच्च न्यायालय से करनी चाहिए.”

स्टेट मिरर स्पेशल
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