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दिल्ली से 15 दिन में 807 का गायब होना सिर्फ फिल्म ‘लापता’ का ‘पेड-प्रमोशन’ तो FIR क्यों नहीं की, NHRC ने पुलिस तलब क्यों की?

दिल्ली में 1 से 15 जनवरी 2026 के बीच 807 लोग लापता. महिला-लड़कियों की संख्या अधिक. NHRC ने लिया संज्ञान, दिल्ली पुलिस के दावों पर सवाल.

दिल्ली से 15 दिन में 807 का गायब होना सिर्फ फिल्म ‘लापता’ का ‘पेड-प्रमोशन’ तो FIR क्यों नहीं की, NHRC ने पुलिस तलब क्यों की?
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संजीव चौहान
By: संजीव चौहान

Updated on: 11 Feb 2026 7:08 PM IST

यह है स्कॉटलैंड स्टाइल पर काम करने का दम भरते रहने वाली दिल्ली पुलिस की कहानी के पीछे छिपी राजधानी के गुमशुदा-पीड़ितों-आश्रितों के दर्द की असहनीय हकीकत और दर्द. दिल्ली में रहने वाले उन 807 बदकिस्मत परिवारों का रिसता हुआ ज़ख्म जो अपनों को गुमशुदा यानी लापता कराए बैठे हैं. यह दर्द-चीत्कार है दिल्ली के दुखियारे परिवारों के घरों में बचे हुए उन बदकिस्मत मां-बाप, बड़े-बूढ़ों और बच्चों की चीत्कार करती मानसिक-पीड़ा का कड़वा सच देश की राजधानी दिल्ली में जिनके अपने 807 लोग जाने-अनजाने 1 जनवरी 2026 से 15 जनवरी 2026 यानी महज 15 दिन के भीतर गायब हो चुके हैं.

यह उन परिवार के लोगों के ज़ख्मों को कुरेदता सच है जो देश की राजधानी दिल्ली की भीड़ में भी खुद को तन्हा-बेसहारा महसूस कर रहे हैं अपनों के “खो-जाने” यानी गायब-गुमशुदा हो जाने के चलते. यानी दिल्ली में 15 दिन में अलग-अलग घर-परिवारों से 807 लोगों के गुमशुदा मतलब, गायब हो जाने का असहनीय दर्द. सड़े हुए सरकारी सिस्टम की बैसाखियों पर घिसटने वाले सरकारी हुक्मरान या सरकारी बाबूओं का कोई अपना इन 807 में गायब नहीं है न. तो फिर उन्हें किसी अपने के गायब या खो जाने का दर्द महसूस भी कैसे होगा.

साहब के खोये ‘कुत्ते’ का भी खौफ

दिल्ली से महज 15 दिन के अंदर ही 807 लोगों का गायब हो जाना, स्कॉटलैंड स्टाइल पर काम करने वाली दिल्ली पुलिस को बिलकुल भी असहज नहीं करता है. शायद इसलिए क्योंकि इन गुमशुदा 807 बदकिस्मतों में कोई अपना जो शामिल नहीं है. हालांकि, एक बार दिल्ली पुलिस के किसी अधिकारी के घर का पालतू-कुत्ता जब गायब हो गया था, तो दिल्ली पुलिस एड़ी-चोटी का जोर लगाकर उसे बेहद कम समय में ढूंढ़ लाई थी. क्योंकि वह पुलिस विभाग के ऐसे बड़े अफसर का कुत्ता जो था, जो अफसर मातहत पुलिस कर्मियों की ऐसी की तैसी कर सकता था.

इस तमाम बवाल को लेकर दिल्ली पुलिस का दावा है कि जो आंकड़े (807 गुमशुदा के) लीक होकर दिल्ली की खाकी के भीतर कोहराम मचाए हुए हैं, वे हैं तो दिल्ली पुलिस के ही. इसमें झूठ कुछ नहीं है. हां, दिल्ली पुलिस इन आंकड़ों को गलत तरीके से मीडिया में परोसे जाने से बेहद दुखी है. दिल्ली पुलिस को दुख-मलाल इस बात का है कि महज 15 दिन के भीतर गुम 807 लोगों की खबर को मीडिया ने गलत तरीके से उछाल दिया है.

कैसे-कैसे बेतुके बहाने

इस मामले में आ रही कुछ खबरों में यह भी देखने-पढ़ने सुनने को मिल रहा है कि इन आंकड़ों का बेजा इस्तेमाल एक पिटी हुई फिल्म “लापता” के पेड-प्रमोशन के लिए किया गया है. चलिए थोड़ी देर को दिल्ली पुलिस की खुशी के लिए मान भी लिया जाए कि, किसी पिटी हुई फिल्म के पेड प्रमोशन के लिए इन आंकड़ों का इस्तेमाल किया है. तब फिर दिल्ली पुलिस ने जिसका कानून, थाना, इंस्पेक्टर एसएसओ सब अपने हैं अपनी जेब में है, की मदद से इन आंकड़ों का किसी के द्वारा पिटी हुई फिल्म का पेड प्रमोशन करने वालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करके उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया है?

डैमेज कंट्रोल में डटी पुलिस

मीडिया में इन दिल दहलाते आंकड़ों से होती दुर्गति के ‘डैमेज कंट्रोल’ के लिए दिल्ली पुलिस प्रवक्ता संजय त्यागी को अधिकृत बयान देने के लिए सामने आने पड़ा. उन्होंने कहा कि यह आंकड़े कोई नई बात या चौंकाने वाले नही हैं. गुमशुदा की इस संख्या में वे लोग भी शामिल हो सकते हैं जो गायब होने के बाद कहीं न कहीं बरामद हो चुके होंगे मगर, संबंधित परिवार या परिजनों ने, उनके बरामद हो जाने की सूचना पुलिस को नहीं दी होगी. एक तरीके से देखा जाए तो भले ही दिल्ली पुलिस के लिए इतने लोगों का राजधानी से गायब हो जाना आम-बात हो. अपनों से इस विछोह की असहनीय पीड़ा उन से घर घर जाकर पूछिए जिनके घर में अपनों के गायब हो जाने के गम में चूल्हे नहीं जल रहे होंगे. उन व्याकुल हुए पड़े बदकिस्मत मां-बाप दादा-दादी भाई-बहन से जाकर पूछिए अपनों से अचानक बिछड़ जाने का दर्द जिनके घरों में खाना तो बन रहा है. मगर निवाले मुंह चबाकर गले के नीचे भी नहीं उतारे जा रहे हों.

बेबस बिलखती मां की चित्‍कार

सोशल मीडिया पर तो एक ऐसी बदकिस्मत हलकान हुई पड़ी बेबस मां का भी वीडियो वायरल हो रहा है, जिसने अपने 16 साल के बेटे को आंखों के सामने अचानक गायब होते देखा है. जिस बच्चे ने दसवीं क्लास में टॉप किया हो. जिस बच्चे का सीसीटीवी फुटेज सोशल मीडिया पर आते-जाते दिखाई दे रहा हो. सोचिए वह मां किस कदर अपने किशोर पुत्र के बिछड़ने के दर्द में तिल-तिल रो-रोकर एक-एक लम्हा एक-एक साल सा अपने सीने पर पत्थर रखकर गुजार रही होगी. दिल्ली पुलिस के लिए भले ही यह कागजी आंकड़े भर हों. मगर दर्द तो उन्हीं को होगा न जिनके अपने लाख तलाशने के बाद भी नहीं मिल रहे हैं.

खून के रिश्तों से पूछो उनका दर्द

गुमशुदा हुए लोग अपने घर वापस आ गए. इसका जिक्र करना कौन सी बड़ी खबर है. खबर तो वही है न जिनके अपने खोए हुए लौटकर आए ही नही हैं. जिनके अपने खो चुके हैं उनके लिए वे अपने खोए हुए खून का रिश्ता हैं. उनके लिए अपना कोई खोकर दूर जा चुका दिल्ली पुलिस का “आंकड़ा” भर नहीं है न. तब फिर जिनका अपना दूर जा चुका है. वे लोग वे परिवार क्यों न बिलबिलाएं और बिलखें. और दिल्ली पुलिस का इन 807 में अपना तो कोई खून का रिश्ता खोया नहीं है न. तो भला दिल्ली पुलिस बिलबिलाए या बिलखे भी क्यों? जख्म और जख्म से रिसते हुए खून की पीड़ा तो घायल को ही होती है न डॉक्टर (दिल्ली पुलिस ) अगर मरीज (गुमशुदा लोगों के परिवार) के साथ रोने लगेगा, तब तो फिर हो गया इलाज और चल गई डॉक्टरी.

किसी भी पुलिस को अखरेगा ही

दिल्ली पुलिस ही क्या..देश के किसी भी राज्य की पुलिस होगी, उसे यह खलेगा-शर्मसार करेगा ही कि उसके इलाके से महज 15 दिन में 807 लोग गायब हो गए. इस आंकड़े में भी 500 से ज्यादा तादाद तो सिर्फ और सिर्फ महिला-लड़कियों की ही है. जोकि और भी दिल दहलाने वाली संख्या है. बाकी बचे पुरुष और बालक. और फिर जो भी हो गुमशुदा तो गुमशुदा हैं. इनके बीच महिला पुरुष लड़का और लड़की, उम्र-लिंग का फर्क करने की बेईमानी क्यों की जाए. देखना यह जरूरी है कि 15 दिन में देश की उस राजधानी दिल्ली से 807 लोग गायब हो गए, जिस दिल्ली में बैठी देश की हुकूमत किसी को भी पलक झपकते हिला डालने की कुव्वत रखती है. और ऐसी ताकतवर हुकूमत से अगर कोई नहीं डरता या हिल सकता है तो वह है दिल्ली पुलिस. क्योंकि अगर दिल्ली पुलिस को हुकूमत का जरा भी खौफ हो या दिल में गुमशुदा लोगों के पीड़ित परिवार वालों से झूठी हमदर्दी भी होती तो, खाकी पहने दिल्ली पुलिस अपनी खाल बचाने के लिए कम से कम यह तो कभी न कहती कि... गुमशुदा लोगों के इन सही आंकड़ों का गलत इस्तेमाल किया गया है किसी पिटी हुई फिसड्डी फिल्म “लापता” का पेड प्रमोशन करने के लिए.

आंकड़े दिल्ली पुलिस के हैं.. वरना

सोचिए कि क्या कोई इतना घटिया काम करने की हिमाकत भी कर सकता है कि “लापता” जैसी पिट चुकी फिल्म के पेड-प्रमोशन के लिए, गायब हुए 807 लोगों के चौंकाने वाले आंकड़ों को ही इस्तेमाल कर जाए. वह भी स्कॉटलैंड स्टाइल पर काम करने वाली दिल्ली पुलिस के रहते हुए. जिसके नाम से ही अपराधियों और शरीफों की रुह फनाह होती हो. गनीमत यह रही कि मीडिया में लीक हुए 15 दिन में 807 लोगों के गायब होने का आंकड़ा दिल्ली पुलिस की अधिकृत बेवसाइट पर मौजूद बताया जाता है. और इस तथ्य को दिल्ली पुलिस भी मानती है कि आंकड़े सही हैं. अगर किसी खबरनवीस ने यह आंकड़ा कहीं से पत्रकारिता का धर्म निभाने के फेर में फंसकर लीक करवाया होता तो, अब तक दिल्ली पुलिस उसको न मालूम कैसे कैसे कितने खंडन-रीज्वाइंडर भेजकर निपटा या निपटवा चुकी होती.

NHRC से पुलिस कैसे पीछा छुड़ाएगी

चलिए छोड़िए गुमशुदा लोगों के आंकड़े दिल्ली पुलिस के है. और इन गुमशुदा लोगों के लिए किसी भी स्तर से सिवाय मुकदमा या सूचना कानूनी पुलिसिया दस्तावेजों में दर्ज करने के दिल्ली पुलिस की और कोई इससे ज्यादा जिम्मेदारी भी नहीं बनती है. यह भी मान लो दिल्ली पुलिस की खुशी के लिए. तब फिर सवाल यह पैदा होना लाजिमी है कि जब दिल्ली पुलिस सही है तो फिर राष्ट्रीय मानवाधिकर आयोग यानी एनएचआरसी ने दिल्ली पुलिस को ‘स्वत: संज्ञान’ लेकर क्यों तलब कर लिया है? एनएचआरसी ने दिल्ली पुलिस से एक सप्ताह के अंदर इन चौंकाने वाले आंकड़ों के बाबत जवाब दाखिल करने को कहा है. क्या अब दिल्ली पुलिस एनएचआरसी में भी यही लिखकर अपनी जान छुड़ाने की जुर्रत करेगी कि, इन आंकड़ों को मीडिया में इस्तेमाल गलत तरीके से किया गया है किसी पिटी हुई फिल्म का पेड-प्रमोशन के लिए. उम्मीद है कि एनएचआरसी जैसी राष्ट्रीय स्वायत्त संस्था तो कदापि दिल्ली पुलिस की इस बेतुकी-बे-सिर पैर की दलील को शायद कतई “भाव” ही न दे. एनएचआरसी में तो दिल्ली पुलिस को सीधे-सीधे किसी मजबूत जवाब के साथ ही पहुंचना होगा. क्योंकि एनएचआरसी किसी गुमशुदा पीड़ित परिवार का रिश्तेदार या मीडिया नहीं है. एनएचआरसी वह संस्था है जो दिल्ली पुलिस से भी सवाल करने की संवैधानिक ताकत अपने पास रखती है.

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