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कौन थे तपोमूर्ति श्रीनीलकंठवर्णी? जिनकी दिल्ली के अक्षरधाम में 108 फीट की प्रतिमा हुई स्थापित, जानिए खासियत

दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में 108 फीट ऊंची नीलकंठवर्णी प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा भव्य वैदिक विधि से संपन्न हुई. इस आयोजन में दुनियाभर से संतों की मौजूदगी में विश्व शांति और मानवता का संदेश दिया गया.

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( Image Source:  ANI )
रूपाली राय
Edited By: रूपाली राय4 Mins Read

Published on: 26 March 2026 3:15 PM

दिल्ली के विश्व प्रसिद्ध स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर में आज गुरुवार को एक बहुत ही खास और पवित्र कार्यक्रम हुआ. यहां 108 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा कर दी गई. यह प्रतिमा तपोमूर्ति श्रीनीलकंठवर्णी की है, जो भगवान स्वामीनारायण के उस रूप को दर्शाती है जब उन्होंने बचपन में बहुत कठिन तपस्या की थी. इस प्राण-प्रतिष्ठा को वैश्विक BAPS संस्था के प्रमुख ब्रह्मस्वरूप महंतस्वामी महाराज ने मंत्रोच्चार और वैदिक विधि के साथ संपन्न किया.

यह प्रतिमा पूरी तरह पंचधातु (पांच प्रकार की धातुओं) से बनाई गई है. यह दुनिया की सबसे पहली और सबसे बड़ी ऐसी मूर्ति है जो भगवान स्वामीनारायण की कठिन तपस्या को दिखाती है. इस भव्य आयोजन में सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया समेत दुनिया के कई देशों से 300 से ज्यादा संत और महंत शामिल हुए.

प्रतिमा की खास बातें

यह विशाल प्रतिमा 8 फीट ऊंचे तल पर स्थापित की गई है. इसे बनाने में पूरे एक साल का समय लगा. मुख्य रूप से कांस्य धातु का इस्तेमाल किया गया है. इसकी तैयारी में अक्षरधाम मंदिर के अनुभवी शिल्पी संतों के साथ-साथ करीब 50 कारीगरों और कई स्वयंसेवकों ने भी अपनी मेहनत दी. यह प्रतिमा भगवान स्वामीनारायण के नीलकंठवर्णी रूप को दिखाती है. उन्होंने मुक्तिनाथ (पुलहाश्रम) में लगभग 4 महीने तक एक पैर पर खड़े होकर बहुत कठिन तपस्या की थी. इस मूर्ति के माध्यम से लोगों को तप, त्याग, करुणा, सुहृद्भाव, मैत्री, मानव सेवा, भक्ति और उपासना जैसे उच्च मूल्यों को याद दिलाया जा रहा है.

तपोमूर्ति श्रीनीलकंठवर्णी कौन हैं?

भगवान स्वामीनारायण महज 11 साल की छोटी उम्र में ही घर-परिवार छोड़कर निकल पड़े थे. उसके बाद अगले 7 सालों तक वे पूरे भारत में घूमते रहे और लोगों के कल्याण के लिए काम करते रहे. इस यात्रा के दौरान उन्होंने 12 हजार किलोमीटर से भी ज्यादा की पैदल यात्रा की. उन्होंने हिमालय की ऊंची चोटियों, बद्रीनाथ-केदारनाथ, कैलाश-मानसरोवर, नेपाल के मुक्तिनाथ, कामाख्या देवी मंदिर, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम, नासिक, पंढरपुर, द्वारका जैसे देश के लगभग सभी प्रमुख तीर्थ स्थानों को अपनी चरणधूलि से पवित्र किया. इन 7 सालों की इस कठिन आध्यात्मिक यात्रा के दौरान उन्होंने ‘नीलकंठ वर्णी’ नाम धारण किया था.

महाउत्सव का शुभारंभ

इस प्रतिष्ठा के महा उत्सव का शुभारंभ कल बुधवार को श्रीनीलकंठवर्णी विश्व शांति महायज्ञ से हुआ था. अक्षरधाम मंदिर के विशाल प्रांगण में षोडशोपचार पूजन सहित पूरे वैदिक अनुष्ठान बड़े ही भव्य तरीके से किए गए. इस अवसर पर ब्रह्मस्वरूप महंतस्वामी महाराज ने पूरी दुनिया में एकता, शांति और सद्भाव की कामना की. उन्होंने उन जगहों पर चल रहे युद्धों के जल्दी खत्म होने की प्रार्थना की. उन्होंने सफेद कबूतर छोड़कर विश्व शांति का सुंदर संदेश भी दिया. यह प्रतिमा न सिर्फ एक मूर्ति है, बल्कि भगवान स्वामीनारायण के त्याग, तपस्या और मानव कल्याण के संदेश को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का एक जीवंत माध्यम है. यह अक्षरधाम मंदिर को और भी भव्य और पवित्र बनाने वाली एक यादगार घटना साबित होगी.

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