किसी के पिता तो किसी की बेटी की हुई मौत, फिर भी चूल्हा नहीं बुझा; छत्तीसगढ़ के मिड-डे मील रसोइयों का दर्द भरा संघर्ष
छत्तीसगढ़ की सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील बनाने वाली रसोइयां पिछले 21 दिनों से नवा रायपुर में अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं. वे ₹66 की दिहाड़ी बढ़ाकर ₹340 प्रतिदिन या ₹11,400 मासिक वेतन की मांग कर रही हैं. रसोइयों का कहना है कि महंगाई के इस दौर में इतनी कम मजदूरी में गुजारा संभव नहीं है. कई महिलाओं ने अपने प्रियजनों की मौत के दिन भी काम करने की दर्दनाक कहानी साझा की.
छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए दो वक्त का भोजन तैयार करने वाले मिड-डे मील रसोइया आज खुद भूख, कर्ज और बेबसी से जूझ रही हैं. पिछले 21 दिनों से राज्यभर की रसोइयां नवा रायपुर के टूटा स्थित नया धरना स्थल पर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर बैठी हैं. उनकी मांग सीधी और साफ है - ₹66 की अपमानजनक दिहाड़ी बढ़ाकर ₹340 प्रतिदिन या कम से कम ₹11,400 मासिक वेतन दिया जाए.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, धरना स्थल पर तंबुओं की कतारें हैं. रसोइयां बैचों में आते हैं - तीन दिन रुकते हैं और फिर उनकी जगह दूसरे ले लेते हैं. आसपास छोटे दुकानदार भी जमा हैं, जो प्रदर्शनकारियों के लिए चाय-पानी और जरूरी सामान बेच रहे हैं. यह आंदोलन छत्तीसगढ़ स्कूल मध्यान्ह भोजन रसोइया संयुक्त संघ के बैनर तले चल रहा है.
क्या बोले रसोईयों के संघ सचिव?
संघ के सचिव मेघराज बघेल (45), जो बस्तर संभाग के कोंडागांव जिले के निवासी हैं, कहते हैं, “मैं 30 साल से मिड-डे मील रसोइया हूं. अब गुजारा मुश्किल हो गया है. बच्चों की पढ़ाई पूरी कराने के लिए ₹90,000 का कर्ज लेना पड़ा. 1995 में काम शुरू किया था तो ₹15 रोज मिलते थे, आज भी सिर्फ ₹66 पर अटके हैं. यह खुला अन्याय है.” बघेल एक और गंभीर समस्या की ओर इशारा करते हैं - “अगर किसी स्कूल में बच्चों की संख्या घट जाती है, तो हमारी सेवाएं खत्म कर दी जाती हैं. ऐसा नहीं होना चाहिए.”
2003-04 में हुआ था पहला बड़ा आंदोलन
रसोइयों का संघर्ष नया नहीं है. बघेल बताते हैं कि 2003-04 में पहला बड़ा आंदोलन हुआ. छह साल तक चले विरोध के बाद दिहाड़ी ₹33 (₹1,000 महीना) हुई. फिर 2019 और 2023 में बढ़ोतरी के बाद यह ₹66 (₹2,000 महीना) तक पहुंची. “हमारी पहली मांग है कि हमें कम से कम ₹340 प्रतिदिन या ₹11,400 महीना मिले,” वे कहते हैं.
'अपने पिता की मौत के दिन भी काम पर आया'
इस आंदोलन का सबसे मार्मिक पहलू वे कहानियां हैं, जो दिल को झकझोर देती हैं. बघेल कहते हैं, “हम पर हर दिन काम करने का दबाव है. मैं अपने पिता की मौत के दिन भी काम पर गया.” इसी तरह राजनांदगांव की सुकृता चव्हाण (40) की आवाज कांप जाती है - “2024 में मेरी बेटी की मौत हुई, उस दिन भी मैंने काम किया. हमारी कितनी भी परेशानियां हों, सरकार सुनने को तैयार नहीं.”
सुकृता बताती हैं कि वे 2003 से काम कर रही हैं. “अक्टूबर से मुझे वेतन नहीं मिला. पति मजदूर हैं. दो और बेटियां हैं, उनकी पढ़ाई के लिए कर्ज लिया है. सरकार सोचती है कि हम सिर्फ दो घंटे काम करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि सुबह 10 बजे चावल धोने-साफ करने से काम शुरू होता है. दाल, चावल, सब्जी, पापड़, अचार बनाने के बाद परोसने में मदद और फिर बर्तन धोने तक दोपहर 3 बजे हो जाते हैं. स्कूल में कार्यक्रम हो तो 4 बजे तक काम चलता है.” वे जोड़ती हैं, “2013 में मैं अकेली 170 बच्चों के लिए खाना बनाती थी, अब 60 बच्चों के लिए बनाती हूं.”
हम बंधुआ मजदूरों जैसे
कांकेर के पंकज प्रामाणिक कहते हैं, “हम बंधुआ मजदूरों जैसे हैं. चुनाव आते ही हमसे खाना बनवाया जाता है, लेकिन उसका भुगतान नहीं होता. कोविड के बाद जून के आखिरी 15 दिनों का पैसा भी बंद कर दिया गया, यह कहकर कि केंद्र से 10 महीने का ही पैसा मिलता है और छुट्टियों में हमारी छुट्टी एडजस्ट हो जाती है.” महंगाई का दर्द बयां करते हुए वे कहते हैं, “अच्छे कपड़े नहीं खरीदते. टमाटर देखते हैं, खरीदते नहीं. सब कुछ महंगा होता जा रहा है.”
'मेरे बच्चों को कॉलेज छोड़ना पड़ा'
धमतरी की शकुंतला सेन का परिवार भी आर्थिक तंगी से जूझ रहा है. “मेरे 19 और 20 साल के दो बच्चों को कॉलेज छोड़ना पड़ा, क्योंकि आगे पढ़ाने के पैसे नहीं हैं. पति किसान हैं,” वे कहती हैं. वहीं कांकेर की शिप्रा तारफदार कहती हैं, “हमें आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और मितानिनों जैसी इज्जत नहीं मिलती, जबकि हमारा काम भी उतना ही जरूरी है.”
शिक्षा विभाग के अधिकारी नहीं दे रहे जवाब
सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस जवाब नहीं आया है. राजस्व और शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने टिप्पणी के अनुरोधों का जवाब नहीं दिया. हालांकि एक सरकारी सूत्र का कहना है कि “₹1,000 प्रतिमाह वेतन बढ़ाने का प्रस्ताव है, जिससे कुल वेतन ₹3,000 महीना हो जाएगा, लेकिन इस पर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है.”
छत्तीसगढ़ की मिड-डे मील रसोइयों का यह आंदोलन सिर्फ वेतन बढ़ोतरी की मांग नहीं है, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और मानवीय व्यवहार की पुकार है. जो महिलाएं रोज हजारों बच्चों को भोजन कराती हैं, वे आज खुद अपने घर का चूल्हा जलाने के लिए संघर्ष कर रही हैं. सवाल यह है कि क्या उनकी यह आवाज सरकार तक पहुंचेगी, या फिर ₹66 की दिहाड़ी में ही उनका जीवन सिमटा रह जाएगा?





