Begin typing your search...

नेपाल की बाढ़ में चाय की वो 10 मिनट की देरी बनी जिंदगी की वजह, छत्तीसगढ़ के 5 दोस्तों ने सुनाई खौफनाक कहानी

नेपाल की भयानक बाढ़ में छत्तीसगढ़ के 5 दोस्तों की जान चाय पीने के चलते बच गए, जिसके कारण उन्हें 10 मिनट की देरी हुई. अब भारत लौटकर उन्होंने नेपाल प्रलय की कहानी सुनाई है.

Nepal Flash Flood
X

Nepal Flash Flood

( Image Source:  ANI )

नेपाल में अचानक आई बाढ़ से चारो तरफ तबाही देखने को मिली है. कई दिन बीत जाने के बाद भी मलबे से शव निकल रहे हैं. जिसमें कई भारतीय भी शामिल हैं. वहीं बहुत सारे भारतीय की जान इस प्रलय में बच गई. कभी-कभी जिंदगी और मौत के बीच महज कुछ मिनटों का फासला होता है. छत्तीसगढ़ के रायपुर के माना कैंप इलाके के रहने वाले पांच दोस्तों के लिए 26 अगस्त को नेपाल में लिया गया एक छोटा सा चाय ब्रेक ऐसी ही जिंदगी बचाने वाली घटना साबित हुआ. जिस वक्त नेपाल में अचानक आई बाढ़ ने भारी तबाही मचाई, उस समय ये पांचों दोस्त रास्ते में चाय पीने के लिए रुके हुए थे. उनका कहना है कि अगर वे 10-15 मिनट पहले वहां से निकल गए होते, तो शायद बाढ़ के बीच फंस जाते.

नारायण सेन, दिनेश ओझा, प्रेम सिंह जगत, यतेंद्र प्रकाश और दिनेश सिंह ठाकुर की उम्र 50 से 60 वर्ष के बीच है. पांचों दोस्त 21 अगस्त को रायपुर से नेपाल घूमने के लिए रवाना हुए थे और 28 अगस्त को सुरक्षित भारत लौटने में सफल रहे. इन दो दिनों के दौरान उन्होंने ऊंची जगह पर शरण ली, अपनी किराए की कार में रात गुजारी और नीचे उफनती त्रिशुली नदी को तबाही मचाते हुए देखा.

क्या थी चाय वाली पूरी कहानी?

समूह ने नेपाल पहुंचने के बाद पशुपतिनाथ मंदिर, मनोकामना मंदिर समेत कई पर्यटन स्थलों की यात्रा की योजना बनाई थी. इसके लिए उन्होंने एक कार किराए पर ली थी. 26 अगस्त की सुबह करीब 10 बजे वे नेपाल के धाडिंग जिले में एक होटल पर चाय पीने के लिए रुके. कुछ ही देर बाद उन्हें पता चला कि आगे मौजूद पुल बाढ़ में बह चुका है. सैलून चलाने वाले 53 वर्षीय नारायण सेन ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया, "हम खुशकिस्मत थे कि 26 अगस्त को जब अचानक बाढ़ आई, तब हम चाय पीने के लिए रुके थे. अगर हम 10-15 मिनट पहले निकल जाते, तो शायद फंस जाते, अगर हम वहां नहीं रुकते, तो पता नहीं क्या होता."

बाढ़ के बाद किसने की मदद?

चाय के लिए जिस होटल में पांचों रुके थे, वह एक भारतीय व्यक्ति का बताया गया है. सेन के मुताबिक, होटल मालिक ने मुश्किल वक्त में उनकी काफी मदद की और उन्हें खाना भी उपलब्ध कराया. सेन ने बताया, "वहां हमें पता चला कि आगे का पुल बाढ़ में बह गया है. होटल एक भारतीय का था, जिसने हमारी बहुत मदद की और हमें खाना भी दिया." बाढ़ के कारण आगे का रास्ता बंद होने के बाद पांचों दोस्तों ने सुरक्षित स्थान तलाशना शुरू किया और किसी तरह मालेखु में ऊंची जगह तक पहुंचने में कामयाब रहे.

कैसी बीती रात?

बाढ़ के बाद हालात इतने भयावह थे कि समूह ने अपनी कार में ही रात बिताई. नीचे त्रिशुली नदी उफान पर थी और चारों तरफ बाढ़ की तबाही का मंजर दिखाई दे रहा था. पुलिस हेड कांस्टेबल 55 वर्षीय दिनेश सिंह ठाकुर ने बताया कि जब बाढ़ आई, तब वे अपने दोस्तों के साथ पशुपतिनाथ मंदिर से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर थे. उन्होंने बताया "होटल में चाय पीते समय हमने देखा कि लोग अचानक बेचैन होने लगे। बाद में हमें बाढ़ से हुई तबाही के बारे में पता चला. हमने सुना कि पूरे गांव, इमारतें, दफ्तर और पनबिजली परियोजनाएं तबाह हो गई थीं."

बाढ़ की स्थिति कुछ संभलने के बाद ठाकुर और उनके दोस्तों ने त्रिशुली नदी के आसपास के इलाके का दौरा कर तबाही को करीब से देखा. ठाकुर ने कहा, "हमने जो देखा, उसे शब्दों में बयान करना बहुत मुश्किल है. हम भगवान शिव का नाम जपते रहे और हमें लगता है कि उनके आशीर्वाद ने हमारी रक्षा की." उन्होंने कहा, "वहां बिजली और पानी नहीं था, लेकिन प्रशासन और पुलिस ने हमारी मदद की. उन्होंने हमें बताया कि हम एक ऊंची जगह पर हैं और हमें चिंता नहीं करनी चाहिए."

कैसे परिवार के साथ जुड़े रहे?

आपदा के बीच भी पांचों दोस्तों ने भारत में अपने परिवारों से संपर्क बनाए रखा. उन्होंने इंटरनेट सेवा का इस्तेमाल करते हुए परिजनों को अपनी स्थिति की जानकारी दी. समूह ने अपनी लोकेशन साझा करने के लिए भारत सरकार की ओर से उपलब्ध कराई गई हेल्पलाइन का भी इस्तेमाल किया. ठाकुर ने कहा, "वहां इंटरनेट सेवा ठीक से काम कर रही थी, इसलिए हम अपने परिवारों के संपर्क में रहे और घबराए नहीं." इस संपर्क की वजह से भारत में उनके परिवारों को भी लगातार उनकी स्थिति की जानकारी मिलती रही.

नेपाल से निकलने में कितने दिन लगे?

26 अगस्त को आई आपदा के बाद पांचों दोस्त तुरंत नेपाल से बाहर नहीं निकल सके. उन्हें सुरक्षित स्थान पर रुकना पड़ा और हालात सामान्य होने का इंतजार करना पड़ा. आखिरकार 28 अगस्त को वे नेपाल से निकलने में सफल हुए और इसके बाद अपने घर लौट आए.

क्या था यादगार पल?

आपदा के बीच इस समूह के लिए एक भावुक और यादगार पल भी आया. रक्षा बंधन के मौके पर स्थानीय महिला सुरक्षाकर्मियों ने पांचों दोस्तों की कलाई पर राखी बांधी. ठाकुर ने बताया कि वे राखी के त्योहार के बाद यात्रा से लौटने वाले थे और उनकी बहनों ने उन्हें पहले ही राखियां दे दी थीं.

सिलाई की दुकान चलाने वाले दिनेश ओझा ने कहा कि नेपाल में देखी गई तबाही का असर लंबे समय तक उनके मन में रहेगा. उन्होंने कहा, "हम जो कुछ भी देखा उसे कभी नहीं भूल पाएंगे। कई लोग अपने लापता परिवार के सदस्यों की तलाश में बेताब थे. हम अपनी कार में सोए, लेकिन ठीक से सो नहीं पाए. हमेशा यह डर बना रहता था कि कहीं एक और बाढ़ न आ जाए."

अब तक कितने लोगों की हुई मौत?

रविवार सुबह तक सामने आई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, बुधवार को आई अचानक बाढ़ के कारण नेपाल में मरने वालों की संख्या 734 तक पहुंच गई थी. वहीं, तिब्बत में चीनी अधिकारियों ने अब तक 16 लोगों की मौत की पुष्टि की है. नेपाल और तिब्बत में करीब 3,000 लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं. इनमें लगभग 2,426 लोग नेपाल में और 554 लोग तिब्बत के ग्यिरोंग काउंटी में लापता हैं.

अगला लेख