2 बार टीम में चयन, 103.75 का औसत, फिर क्यों नहीं मिला डेब्यू का मौका... क्या गंभीर के चलते हुआ था ऐसा? कहानी भारत के अनलकी क्रिकेटर की
घरेलू क्रिकेट और इंडिया ए के लिए शानदार प्रदर्शन करने वाले धीरज जाधव को कभी टीम इंडिया के लिए इंटरनेशनल डेब्यू करने का मौका नहीं मिला था. हालांकि उनको 2 बार टीम इंडिया के लिए जरूर चुना गया था.
Gautam Gambhir
भारत में क्रिकेट की शुरुआत से ही कई शानदार खिलाड़ी देखने को मिले हैं. कपिल देव से लेकर सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर ऐसे दिग्गज रहे जिन्होंने भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. वहीं इसको एमएस धोनी से लेकर विराट कोहली और रोहित शर्मा तक ने आगे बढ़ाने का काम किया है, लेकिन कुछ खिलाड़ी ऐसे रहे हैं जिन्होंने घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन किया.
टीम इंडिया तक पहुंचे लेकिन किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया. आज हम एक ऐसे ही दिग्गज खिलाड़ी की बात करने वाले हैं, जिनको 2 बार टीम इंडिया के लिए चुना तो गया लेकिन डेब्यू करने का मौक नहीं मिला. उनके ऊपर उस वक्त गौतम गंभीर को टीम इंडिया के लिए खेलने का मौका मिला था.
कौन हैं वो दिग्गज खिलाड़ी?
साल 2003-04 का भारतीय घरेलू क्रिकेट सत्र एक ऐसे बल्लेबाज के लिए असाधारण रहा, जिसने रनों का ऐसा अंबार लगाया कि राष्ट्रीय टीम के दरवाजे उसके लिए खुलते हुए दिखाई देने लगे थे. महाराष्ट्र के बाएं हाथ के सलामी बल्लेबाज धीरज जाधव ने रणजी ट्रॉफी और दिलीप ट्रॉफी की महज 15 पारियों में 1,245 रन ठोक दिए. उनका बल्लेबाजी औसत 103.75 रहा और इस दौरान उन्होंने पांच शतक लगाए, जिनमें तीन दोहरे शतक शामिल थे. इसके बावजूद भारतीय टेस्ट टीम में जगह बनाने की दौड़ में वह गौतम गंभीर से पिछड़ गए.
जाधव का प्रदर्शन केवल घरेलू क्रिकेट तक सीमित नहीं था. इंडिया ए के साथ केन्या दौरे पर उन्होंने पाकिस्तान ए के खिलाफ फाइनल में 89 रन की बेहद महत्वपूर्ण पारी खेली और बाद में केन्या के खिलाफ नाबाद 260 रन बनाकर अपनी क्षमता का एक और प्रमाण दिया. इसके बाद वरिष्ठ भारतीय टीम के खिलाफ भी उन्होंने 113 रन बनाए, जहां उनके सामने अनिल कुंबले, हरभजन सिंह, जहीर खान और इरफान पठान जैसे गेंदबाज थे. फिर भी, जब मुंबई में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट के लिए भारतीय टीम चुनी गई, तो डेब्यू का मौका गौतम गंभीर को मिला और जाधव को बाहर बैठना पड़ा.
घरेलू क्रिकेट की यादगार पारियां कौनसी?
धीरज जाधव ने 1999-00 में महाराष्ट्र के लिए प्रथम श्रेणी क्रिकेट में डेब्यू किया था. शुरुआत में उनकी पहचान आक्रामक बल्लेबाज के रूप में नहीं, बल्कि क्रीज पर लंबे समय तक टिके रहने वाले धैर्यवान बल्लेबाज की थी. बाद में उन्होंने अपनी बल्लेबाजी में बड़ा बदलाव किया. इस बदलाव का असर 2003-04 में साफ दिखाई दिया. वह रणजी और दिलीप टूर्नामेंट में 1,000 से ज्यादा रन बनाने वाले उस सत्र के इकलौते बल्लेबाज रहे. 1,245 रन और 100 से ज्यादा का औसत उनके शानदार फॉर्म का प्रमाण था.
अपने तीन दोहरे शतकों में जाधव ने रणजी ट्रॉफी के प्लेट फाइनल में मध्य प्रदेश के खिलाफ बनाए गए 251 रन को अपना सबसे बेहतरीन प्रदर्शन माना. खास बात यह थी कि यह पारी उन्होंने ऐसे गेंदबाजों के सामने खेली, जिनमें नरेंद्र हिरवानी भी शामिल थे. हिरवानी उस सीजन में संयुक्त रूप से सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाजों में शामिल थे. जाधव की इस पारी ने न केवल उनकी बल्लेबाजी क्षमता को साबित किया, बल्कि इंडिया ए में चयन का रास्ता भी तैयार किया.
इंडिया ए के लिए कैसा था प्रदर्शन?
2004 में इंडिया ए का केन्या दौरा बाद में एमएस धोनी के अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत से पहले उनके शानदार प्रदर्शन के लिए याद किया गया. धोनी ने इस दौरे पर विस्फोटक बल्लेबाजी की और जल्द ही भारतीय टीम के लिए अपनी दावेदारी मजबूत कर ली. गौतम गंभीर ने भी प्रभाव छोड़ा, लेकिन जाधव ने अपने प्रदर्शन से यह सुनिश्चित किया कि यह दौरा सिर्फ धोनी और गंभीर की कहानी बनकर न रह जाए. ट्राई वनडे सीरीज में जाधव ने 257 रन बनाए. पाकिस्तान ए के खिलाफ फाइनल में उनकी पारी महत्वपूर्ण रही.
पाकिस्तान ए ने 210 रन का लक्ष्य दिया था. भारतीय ए की शुरुआत अच्छी नहीं रही और गंभीर महज 24 रन बनाकर आउट हो गए, जबकि धोनी भी 44 रन के स्कोर पर पवेलियन लौट गए. इसके बाद जाधव ने पारी को संभाला और लक्ष्य का पीछा करने की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली. उन्होंने 112 गेंदों में सात चौकों और एक छक्के की मदद से 89 रन बनाए. वह उस समय आउट हुए जब भारतीय टीम जीत की स्थिति में पहुंच चुकी थी. डकवर्थ-लुईस पद्धति के आधार पर इंडिया ए ने मुकाबला छह विकेट से जीत लिया और जाधव को फाइनल का प्लेयर ऑफ द मैच चुना गया.
कब आया था भारतीय टीम का बुलावा?
टेस्ट टीम में तत्काल चयन नहीं हुआ, लेकिन नागपुर टेस्ट में भारत की करारी हार के बाद परिस्थितियां बदल गईं. ऑस्ट्रेलिया ने भारत को 342 रन से हराकर 35 सालों में पहली बार भारत में टेस्ट सीरीज जीती. इसके बाद सेलेक्टर्स ने कई बदलाव किए. आकाश चोपड़ा, युवराज सिंह, पार्थिव पटेल और अजीत अगरकर को टीम से बाहर कर दिया गया. मुंबई में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ अंतिम टेस्ट के लिए गौतम गंभीर, धीरज जाधव, दिनेश कार्तिक और शिव शंकर पॉल को टीम में शामिल किया गया. आकाश चोपड़ा के बाहर होने के बाद वीरेंद्र सहवाग के साथ पारी की शुरुआत करने के लिए एक स्थान खाली था. लेकिन इस मौके पर सेलेक्टर्स का भरोसा गंभीर पर गया. जहां गंभीर ने डेब्यू किया और जाधव को बाहर बैठना पड़ा.
दूसरी बार कब मिला मौका?
अगस्त 2005 में जाधव को एक बार फिर भारतीय टेस्ट टीम में शामिल किया गया. सचिन तेंदुलकर टेनिस एल्बो की सर्जरी से उबर रहे थे और उन्हें लगा कि वह अभी पूरी तरह फिट नहीं हैं. भारत को जिम्बाब्वे में दो टेस्ट मैच खेलने थे. तेंदुलकर के हटने के बाद चयनकर्ताओं ने उनकी जगह जाधव को टीम में शामिल किया. यह जाधव के लिए एक साल से भी कम समय में दूसरा मौका था, जब उन्हें भारतीय टेस्ट टीम का हिस्सा बनाया गया.
जिम्बाब्वे दौरे पर भी जाधव की किस्मत नहीं बदली. वीरेंद्र सहवाग और गौतम गंभीर ने सलामी जोड़ी के रूप में अपनी जगह बनाए रखी. भारत ने दोनों टेस्ट मैच जीते और जाधव को फिर प्लेइंग इलेवन में जगह नहीं मिली. इस तरह जिस बल्लेबाज ने 2003-04 में 103.75 के औसत से 1,245 रन बनाए, तीन दोहरे शतक लगाए, इंडिया ए के लिए पाकिस्तान ए के खिलाफ मैच जिताऊ 89 रन बनाए और केन्या के खिलाफ नाबाद 260 रन ठोके, वह टेस्ट क्रिकेट के बेहद करीब पहुंचकर भी अंतरराष्ट्रीय डेब्यू नहीं कर सका.




