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पति मानता था मां-बाप की बात, तो पत्नी बुलाती थी 'पालतू चूहा', अब हाईकोर्ट ने भी लगाई तलाक पर मुहर

अक्सर पति-पत्नी के बीच मजाक या एक-दूसरे को नाम से पुकारना आम बात मानी जाती है. लेकिन छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले ने यह साबित कर दिया कि हर नाम मजाक नहीं होता, कभी-कभी यह रिश्ते की डोर तोड़ भी सकता है. मामला रायपुर की फैमिली कोर्ट से शुरू हुआ और हाईकोर्ट तक पहुंचा, जहां पत्नी द्वारा पति को 'पालतू चूहा' कहने को मानसिक क्रूरता माना गया और शादी को खत्म करने का आदेश दिया गया.

पति मानता था मां-बाप की बात, तो पत्नी बुलाती थी पालतू चूहा, अब हाईकोर्ट ने भी लगाई तलाक पर मुहर
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( Image Source:  Meta AI: Representative Image )
हेमा पंत
Edited By: हेमा पंत3 Mins Read

Updated on: 16 Oct 2025 6:41 PM IST

पति-पत्नी के रिश्ते में तकरार आम है, लेकिन कभी-कभी जुबान से निकले शब्द रिश्तों की नींव हिला देते हैं. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक ऐसा ही मामला सामने आया, जहां पत्नी ने अपने पति को 'पालतू चूहा कहकर ताना मारा क्योंकि वह अपने मां-बाप की बात मानता था. कोर्ट ने इसे मानसिक क्रूरता मानते हुए शादी पर तलाक की मुहर लगा दी.

अदालत ने साफ कहा कि भारतीय सामाजिक संदर्भ में पति-पत्नी में से किसी को भी अपने माता-पिता से अलग रहने के लिए मजबूर करना या बार-बार अपमानित करना, वैवाहिक जीवन में गंभीर चोट पहुंचाता है.

क्या था मामला?

पति ने अदालत में बताया कि उसकी पत्नी उसे लगातार माता-पिता के खिलाफ भड़काती थी. वह चाहती थी कि वह अपने परिवार से अलग होकर सिर्फ उसके साथ रहे. जब पति ने मना किया तो पत्नी अक्सर झगड़ालू हो जाती और यहां तक कि गर्भावस्था के दौरान खुद को नुकसान पहुंचाने की भी कोशिश की. पति का कहना था कि पत्नी ने मैसेज में उसे माता-पिता का “पालतू चूहा” कहा था. उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी बुजुर्गों का सम्मान नहीं करती थी और संयुक्त परिवार में तालमेल बिठाने से इनकार कर देती थी.

अदालत में पेश हुए सबूत

पति ने अपने दावों को साबित करने के लिए परिवार के सदस्यों की गवाही और पत्नी के भेजे गए मैसेज अदालत में पेश किए. वहीं, पत्नी ने भी यह माना कि उसने पति को मैसेज भेजा था, जिसमें लिखा था कि अपने माता-पिता को छोड़कर मेरे साथ रहो.' फैमिली कोर्ट ने 2019 में पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए शादी खत्म कर दी. इसके बाद पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील की.

हाईकोर्ट का फैसला

3 सितंबर को जस्टिस राजनी दूबे और जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की डिवीजन बेंच ने पत्नी की अपील खारिज कर दी. अदालत ने कहा कि भारतीय सामाजिक परिप्रेक्ष्य में किसी पति से यह कहना कि वह अपने माता-पिता को छोड़ दे, मानसिक क्रूरता है. साथ ही, पत्नी का लंबे समय तक मायके में रहना और केवल 2011 में थोड़े समय के लिए ससुराल आना परित्याग (डेज़र्शन) की कानूनी शर्त को पूरा करता है. अदालत ने न सिर्फ फैमिली कोर्ट के तलाक के आदेश को बरकरार रखा, बल्कि पत्नी की वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना की याचिका भी खारिज कर दी. हालांकि, अदालत ने पति को पत्नी को 5 लाख रुपये स्थायी भरण-पोषण (अलिमनी) देने का आदेश दिया.

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