विदेश से MBBS करने वाले डॉक्टरों को झटका, 1 लाख रुपये की इंटर्नशिप फीस भी नहीं होगी वापस; बिलासपुर हाई कोर्ट ने याचिकाओं को किया खारिज
विदेश से MBBS की डिग्री लेकर छत्तीसगढ़ के सिम्स बिलासपुर में इंटर्नशिप करने वाले डॉक्टरों को हाई कोर्ट से झटका लगा है. अदालत ने एक लाख रुपये की फीस वापसी और अगस्त 2022 से पहले के स्टाइपेंड की मांग खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा कि डॉक्टर 2021 के नए NMC नियमों के आधार पर यह लाभ पाने के हकदार नहीं हैं.
विदेश से MBBS की पढ़ाई पूरी करने के बाद छत्तीसगढ़ में इंटर्नशिप कर रहे डॉक्टरों को बिलासपुर हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली है. कोर्ट ने इंटर्नशिप के दौरान जमा की गई एक लाख रुपये की फीस वापस करने और भारतीय मेडिकल कॉलेजों के छात्रों के बराबर स्टाइपेंड देने की मांग वाली तीन याचिकाएं खारिज कर दी हैं. इस फैसले से उन विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट डॉक्टरों को झटका लगा है, जो फीस वापसी और अगस्त 2022 से पहले के स्टाइपेंड का भुगतान चाहते थे.
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं ने अपनी विदेशी मेडिकल डिग्री 18 नवंबर 2021 से पहले हासिल की थी. इसलिए वे राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC) के 2021 के नए नियमों के आधार पर अपनी मांग का दावा नहीं कर सकते.
यह मामला छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स), बिलासपुर में इंटर्नशिप करने वाले विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट डॉक्टरों से जुड़ा है. इन डॉक्टरों ने विदेश से MBBS की पढ़ाई पूरी की थी. इसके बाद उन्हें भारत में मेडिकल प्रैक्टिस के लिए जरूरी प्रक्रिया के तहत इंटर्नशिप करनी थी. सिम्स में इंटर्नशिप के लिए उनसे एक-एक लाख रुपये फीस जमा कराई गई थी.
डॉ. श्यामू कुमार जांगड़े और 13 अन्य डॉक्टरों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर यह रकम वापस करने की मांग की थी. इसके अलावा डॉ. छत्रेश चौधरी और डॉ. प्रणव पांडेय ने भी अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की थीं. हाई कोर्ट ने तीनों मामलों की एक साथ सुनवाई की.
NMC के निर्देशों का दिया गया हवाला
डॉक्टरों की दलील थी कि NMC ने 4 मार्च 2022 को दिशा-निर्देश और 19 मई 2022 को एक सर्कुलर जारी किया था. इसमें 18 नवंबर 2021 से पहले विदेश से मेडिकल डिग्री हासिल करने वाले छात्रों से इंटर्नशिप फीस नहीं लेने और उन्हें भारतीय मेडिकल कॉलेजों के छात्रों के बराबर स्टाइपेंड व अन्य सुविधाएं देने की बात कही गई थी.
इसी आधार पर चिकित्सा शिक्षा संचालनालय ने 5 अगस्त 2022 को आदेश जारी किया था. डॉक्टरों का कहना था कि इस फैसले के मुताबिक उनसे पहले जमा कराई गई फीस लौटाई जानी चाहिए और इंटर्नशिप में पंजीयन की तारीख से स्टाइपेंड मिलना चाहिए.
डॉक्टरों को अगस्त 2022 से स्टाइपेंड मिलना शुरू हो गया था, लेकिन इससे पहले की अवधि का भुगतान नहीं किया गया. इसी के खिलाफ वे अदालत पहुंचे थे.
सरकार ने फीस वापसी का क्यों किया विरोध?
राज्य सरकार ने कोर्ट में बताया कि इन डॉक्टरों ने साल 2015 में ही इंटर्नशिप की फीस जमा कर दी थी. सरकार के मुताबिक, 24 नवंबर 2022 को हुई बैठक में फैसला लिया गया था कि 4 मार्च 2022 के NMC सर्कुलर से पहले जिन छात्रों से फीस ली जा चुकी है, उसे वापस नहीं किया जाएगा.
सरकार ने दलील दी कि बाद में जारी दिशा-निर्देशों के आधार पर पहले जमा हो चुकी फीस लौटाने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती.
कोर्ट ने याचिकाएं क्यों खारिज कीं?
हाई कोर्ट ने पाया कि सभी याचिकाकर्ताओं ने अपनी विदेशी मेडिकल डिग्री 18 नवंबर 2021 से पहले हासिल की थी. कोर्ट ने कहा कि वे 2021 के नए नियमों के आधार पर फीस वापसी और स्टाइपेंड का दावा नहीं कर सकते. फीस लौटाने से जुड़े राज्य सरकार के 24 नवंबर 2022 के फैसले को भी रिकॉर्ड पर लिया गया.
वहीं, अगस्त 2022 से पहले के स्टाइपेंड के भुगतान के लिए डॉक्टरों की ओर से कोई दूसरा लागू नियम या विशेष निर्देश पेश नहीं किया गया. इन आधारों पर अदालत ने तीनों याचिकाएं खारिज कर दीं.
इस मामले में डॉक्टरों की ओर से अधिवक्ता विकास श्रीवास्तव और राज्य सरकार की ओर से पैनल अधिवक्ता आकांक्षा वर्मा ने पक्ष रखा.




