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IVF तकनीक से बिहार में पैदा हुई हाई-प्रोडक्शन साहीवाल बछिया, दूध क्रांति की ओर बड़ा कदम

बिहार में पहली बार IVF तकनीक से साहीवाल नस्ल की बछिया पैदा कर वैज्ञानिकों ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है.

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( Image Source:  ANI )
रूपाली राय
Edited By: रूपाली राय5 Mins Read

Updated on: 28 March 2026 8:58 AM IST

भारत को दूध के उत्पादन में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने के प्रयासों में एक बहुत बड़ी और खुशखबरी मिली है. बिहार के डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय की इकाई कृषि अनुसंधान केंद्र, पीपराकोठी ने यह उपलब्धि हासिल की है. विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVD) तकनीक का इस्तेमाल करके देश की मौसम और जलवायु में अच्छी तरह रहने वाली, ज्यादा दूध देने वाली उच्च नस्ल की साहीवाल बछिया पैदा की है. यह पूर्वी भारत में आईवीएफ तकनीक से साहीवाल नस्ल की बछिया पैदा करने की पहली सफलता है.

इस सफलता को भारत की दुग्ध उत्पादन रणनीति में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है. अब तक किसान ज्यादा दूध के लिए मुख्य रूप से विदेशी नस्लों की गायों (जैसे होलस्टीन फ्रेसियन और जर्सी) पर निर्भर थे. लेकिन अब सरकार और वैज्ञानिक स्वदेशी (देशी) नस्लों पर ज्यादा जोर दे रहे हैं, खासकर उन नस्लों पर जो भारत के बदलते मौसम और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल हों. यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने IVF तकनीक की मदद से कुल चार साहीवाल बछियां पैदा की हैं. इनमें से तीन बछियां पीपराकोठी स्थित देशी नस्ल संवर्धन के उत्कृष्टता केंद्र में और चौथी बछिया चकिया गौशाला में जन्मी है.

देसी नस्लों का तेज विकास होगा

विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पी. एस. पांडेय ने बताया कि पिछले कई दशकों से भारतीय किसान दूध उत्पादन के लिए विदेशी नस्लों की गायों पर ही भरोसा करते आए हैं. लेकिन अब स्थिति बदल रही है. विदेशी नस्लों की गायों में कई समस्याएं आने लगी हैं. जैसे:

वे भारत के गर्म मौसम में ज्यादा बीमार पड़ जाती हैं

गर्भधारण करने में मुश्किल होती है

जलवायु परिवर्तन के कारण उनका दूध उत्पादन प्रभावित हो रहा है

दूसरी ओर, देशी नस्लें जैसे साहीवाल भारत की गर्मी, नमी और बदलते मौसम को बहुत अच्छी तरह सहन कर सकती हैं. ये नस्लें कम बीमार पड़ती हैं और उनके दूध की गुणवत्ता भी बहुत अच्छी होती है.

आईवीएफ तकनीक से 'क्लाइमेट-स्मार्ट' गाय तैयार

कुलपति डॉ. पी. एस. पांडेय ने कहा कि विश्वविद्यालय किसानों को जलवायु-अनुकूल (क्लाइमेट-स्मार्ट) गाय उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रहा है. आईवीएफ तकनीक से पैदा होने वाली ये साहीवाल बछियां गर्मी अच्छी तरह सहन कर सकेंगी, कम बीमार पड़ेंगी और ज्यादा दूध देंगी. इससे किसानों को दो फायदे होंगे:

  1. ज्यादा दूध उत्पादन
  2. कम खर्च और कम परेशानी

देशी गाय का दूध ज्यादा पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक

डेयरी वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार ने बताया कि देशी नस्लों की गायें A2 प्रकार का दूध देती हैं. जो बहुत अच्छा और स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है. विदेशी नस्लें (जैसे HF और जर्सी) मुख्य रूप से A1 दूध देती हैं, जो कुछ लोगों में पाचन संबंधी समस्याएं, गैस, ब्लोटिंग और अन्य परेशानियां पैदा कर सकता है.

A2 दूध के फायदे:

  • पचने में बहुत आसान होता है
  • पोषण से भरपूर होता है
  • इसमें प्रोलाइन अमीनो एसिड होता है, जो हानिकारक BCM-7 पेप्टाइड बनने से रोकता है
  • कैल्शियम, विटामिन D और ओमेगा-3 फैटी एसिड ज्यादा मात्रा में होता है
  • मस्तिष्क के विकास और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) को बढ़ाने में मदद करता है

किसानों के लिए आर्थिक फायदा

डेयरी वैज्ञानिक डॉ. कृष्ण मोहन कुमार ने बताया कि आईवीएफ तकनीक किसानों के लिए बहुत फायदेमंद है. इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि अगर मां की नस्ल कोई भी हो (चाहे फ्रीजियन या जर्सी), लेकिन आईवीएफ से पैदा होने वाला बछड़ा या बछिया पूरी तरह शुद्ध साहीवाल नस्ल का होता है. मतलब एक ही पीढ़ी में उच्च गुणवत्ता वाली देसी नस्ल तैयार हो जाती है. इस पूरे शोध कार्य में डॉ. प्रमोद कुमार, डॉ. कृष्ण मोहन कुमार और डॉ. आर. के. अस्थाना की टीम ने मेहनत की है.

भविष्य की योजना

विश्वविद्यालय अब इस आईवीएफ तकनीक को आम किसानों तक पहुंचाने की योजना बना रहा है. अगर यह तकनीक सफलतापूर्वक किसानों तक पहुंच गई, तो देश के दुग्ध उद्योग में एक नई क्रांति आ सकती है. किसान कम खर्च में ज्यादा दूध उत्पादन कर सकेंगे और भारत दूध के क्षेत्र में मजबूती से आत्मनिर्भर बन सकेगा.

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