30 साल, 30 दिन और 3 किरदार चित्त! बांकीपुर से बिहार की राजनीति का नया ट्रेलर Out
बांकीपुर का रण सिर्फ एक उपचुनाव नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति का नया ट्रेलर है. जहां बीजेपी का अभेद्य माने जाने वाला गढ़ इस बार लड़खड़ा गया. वहीं पार्टी के बड़े रणनीतिकारों की सियासी गणित भी धराशाई हो गई.
थोड़ा सब्र तो रखो हम भी मैदान में आएंगे,
माहौल क्या होता है वो हम बांकीपुर में बताएंगे!
माहौल शुरू से ही था. तभी तो कोई भागा. निजी वजहों का हवाला देकर. कोई लाया गया बांकीपुर का बाहुबली बताकर. गढ़ के रण में बीजेपी के सरदार फिसल गए. नाक नीची हो गई और छाती सिकुड़ के छुआरा. किंग मेकर को भी लगा दाल ऐसे नहीं, किंग बनकर ही गलेगी. तभी तो कुछ ही महीनों में बाकी सीटों पर ध्यान देंगे वाला वाक्य भूलकर बांकीपुर के रण में साफा बांध उतरना पड़ा.
जनता भी गजब है. न जीने देती है न मरने. भौकाल तो कत्तई मचाने नहीं देती. कोई भी थोड़ा इधर उधर बेकायदा होगा, उसे कायदा सिखा दिया जाता है. तभी तो परदे के पीछे के खिलाड़ी के लिए सावन का पहला सोमवार धमाकेदार हो गया. जन सुराज पार्टी वाले प्रशांत किशोर का बांकीपुर में टावर गड़ गया. और बीजेपी के बॉस का उखड़ गया.
करीब तीन दशक तक पिता-पुत्र के प्रभाव वाली इस सीट पर प्रशांत किशोर ने ऐसा राजनीतिक शोर खड़ा किया कि तीन बड़े नेताओं की रणनीति पर सवाल उठ गए. पहला उनका, जो कायस्थ बहुल इस सीट को छोड़कर दिल्ली में जम गए (नितिन नवीन ). दूसरा उनका- जिनके पीछे 25 के विधानसभा चुनाव से पीके लालटेन लेकर पड़े हैं (सम्राट चौधरी). और तीसरा उनका, जिनका चुनाव चिन्ह (लालटेन) उनके हाथ में था (तेजस्वी यादव).
बांकीपुर का संदेश साफ है. मुखौटा लगाकर माहौल नहीं बनाने दिया जाएगा. जिसे चुना गया है, उसे ही चमकने दिया जाएगा. उसके नाम पर किसी और को नहीं. तभी तो 16वें राउंड तक कमल वाले तकरीबन 10 हजार वोटों से पीछे नजर आए. भले ही बांकीपुर के नाम वोटिंग परसेंटेज कम रहने का ताज हो पर बाई इलेक्शन के परिणाम ने बिहार की राजनीति का सियासी संवाद जरूर बदल दिया है. जैसा शोर 8-9 महीने पहले था, अब वैसा ही ज़ोर दिखाई देने वाला है.
नतीजों ने जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर को बड़ी राजनीतिक बढ़त दी. साथ ही यह संदेश दिया कि बिहार की राजनीति में अब उन्हें सिर्फ चुनावी रणनीतिकार नहीं, बल्कि गंभीर राजनीतिक खिलाड़ी के तौर पर भी देखा जाएगा. बांकीपुर समेत पूरे सूबे में जहां उनका सियासी कद बढ़ा, वहीं बीजेपी नेतृत्व के लिए यह नतीजा बड़ा झटका साबित हुआ. परिणामों ने साथ ही साथ यह भी इशारा दे दिया कि अब बिहार की सियासत बदलने वाली है.
तभी तो शाम के ठीक चार बजते ही सम्राट चौधरी को लेकर प्रशांत किशोर ने बीजेपी को सीधा और सख्त राजनीतिक संदेश दे दिया. उन्होंने कहा कि बिहार का मुख्यमंत्री ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जिसका चरित्र बेदाग हो. अगर राज्य की कमान किसी आपराधिक छवि वाले नेता के हाथों में होगी, तो बिहार कभी विकास की रफ्तार नहीं पकड़ पाएगा. उनका तंज सिर्फ चेहरे पर नहीं, बल्कि उस पूरी राजनीति पर था जो जाति, समीकरण और मुफ्त योजनाओं के सहारे सत्ता बचाने की कोशिश करती रही है.
हालांकि खुद को लेकर भी उन्होंने बड़े-बड़े दावे करने से परहेज किया. उन्होंने साफ कहा, मेरे विधायक बनने से बांकीपुर तीन महीने में बैंगलोर नहीं बन जाएगा. लेकिन भरोसा दिलाया कि महज तीन महीनों में काम करने का फर्क साफ दिखाई देने लगेगा. नौकरीपेशा, शिक्षित और राजनीतिक रूप से जागरूक माने जाने वाले बांकीपुर ने इस उपचुनाव में एक बड़ा संदेश दिया है. मतदाताओं ने जता दिया है कि अब वे किसी बड़े नाम या परंपरागत राजनीतिक विरासत के पीछे नहीं बल्कि बदलाव, जवाबदेही और विकास की राजनीति के साथ खड़े होना चाहते हैं. भले ही इस बदलाव और जवाबदेही को सांसद मीसा भारती लोमड़ी करार दें.
खैर, अब चाहे कोई ये बोले- काश नीतीश का चेहरा लेकर लड़े होते या कोई ये बोले कि काम जेन जी ने खराब कर दिया. पर असलियत यही है कि प्रशांत किशोर ने बांकीपुर के रण से जो तीर चलाए हैं, वो एकदम सटीक लगे हैं और उसके घाव जल्दी नहीं सूखने वाले.




