Bankipur: 9 महीने में प्रशांत किशोर कैसे बन गए जीरो से हीरो? जानिए PK के कमबैक की पूरी कहानी
2025 में 0 सीट और 236 उम्मीदवारों की जमानत जब्त होने के बाद 9 महीने में प्रशांत किशोर ने बांकीपुर उपचुनाव जीतकर कैसे किया बड़ा राजनीतिक कमबैक? जानिए पूरी कहानी.
हार के जीतने वाले को बाजीगर कहते हैं...करीब नौ महीने पहले तक बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी जन सुराज को लेकर एक ही सवाल पूछा जा रहा था. क्या उनकी राजनीतिक पारी शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई? वजह भी बड़ी थी. 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज ने 243 में से 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन नतीजा ऐसा आया जिसने पार्टी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया. एक भी सीट नहीं मिली, वोट शेयर सिर्फ 3.34 फीसदी रहा और 236 उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा सके. राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे बिहार की हालिया राजनीति की सबसे बड़ी चुनावी असफलताओं में से एक माना.
लेकिन राजनीति का इतिहास बताता है कि कई बार सबसे बड़ी हार ही सबसे बड़ी वापसी की नींव बनती है. बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने ठीक यही कहानी लिखी. भाजपा के तीन दशक पुराने मजबूत गढ़ में उतरकर प्रशांत किशोर ने न सिर्फ अपनी पहली चुनावी जीत दर्ज की, बल्कि जन सुराज को भी पहली बार विधानसभा तक पहुंचा दिया. यह जीत केवल एक सीट जीतने की कहानी नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीति का संकेत मानी जा रही है.
हार के बाद नहीं छोड़ा बिहार, लगातार जनता के बीच रहे
2025 की करारी हार के बाद कई लोगों को लगा था कि प्रशांत किशोर सक्रिय राजनीति से दूरी बना लेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. चुनाव हारने के बाद उन्होंने न तो संगठन को कमजोर होने दिया और न ही बिहार छोड़कर राष्ट्रीय राजनीति की ओर रुख किया. इसके बजाय उन्होंने पूरे राज्य में लगातार जनसंपर्क अभियान जारी रखा. गांवों, कस्बों और शहरों में बैठकों का सिलसिला चलता रहा. छात्रों, युवाओं, शिक्षकों, किसानों और छोटे कारोबारियों से मुलाकात कर उन्होंने स्थानीय मुद्दों को समझने की कोशिश की. पार्टी का संगठन भी बूथ स्तर तक मजबूत करने पर काम करता रहा. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यही वह दौर था जब जन सुराज ने चुनाव लड़ने से ज्यादा संगठन खड़ा करने पर ध्यान दिया और इसका असर उपचुनाव में दिखाई दिया.
पूरे बिहार से हटकर एक सीट पर लगाया पूरा जोर
विधानसभा चुनाव में जन सुराज लगभग पूरे राज्य में चुनाव लड़ रही थी. संसाधन और संगठन दोनों बिखरे हुए थे. लेकिन बांकीपुर उपचुनाव में रणनीति पूरी तरह बदल दी गई. इस बार पूरी ताकत केवल एक सीट पर केंद्रित की गई. कार्यकर्ताओं से लेकर प्रचार अभियान तक, सब कुछ बांकीपुर पर फोकस रहा. इससे पार्टी का पूरा संगठन एक लक्ष्य पर काम करता नजर आया.
क्यों चुना भाजपा का सबसे मजबूत गढ़?
बांकीपुर को बिहार में भाजपा की सबसे सुरक्षित सीटों में गिना जाता है. 1995 से लगातार यह सीट भाजपा के पास रही. पहले नवीन सिन्हा और बाद में नितिन नवीन ने इस सीट पर पार्टी का दबदबा कायम रखा. 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने यहां करीब 63 प्रतिशत वोट हासिल किए थे. ऐसे में किसी नए दल के लिए यहां से चुनाव लड़ना भी बड़ा जोखिम माना जा रहा था.
लेकिन प्रशांत किशोर ने इसी सीट को चुना. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनका उद्देश्य केवल विधायक बनना नहीं था, बल्कि यह संदेश देना था कि यदि बदलाव की राजनीति करनी है तो सबसे मजबूत राजनीतिक गढ़ को चुनौती देनी होगी.
इन नौ महीनों में बिहार का राजनीतिक माहौल कैसे बदला?
विधानसभा चुनाव और उपचुनाव के बीच बिहार की राजनीति में कई बड़े मुद्दे उभरकर सामने आए. भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक के आरोप, शिक्षा व्यवस्था को लेकर बढ़ती नाराजगी, युवाओं का पलायन, रोजगार की कमी और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विवाद लगातार चर्चा में रहे. इन मुद्दों ने खासकर शहरी और शिक्षित युवाओं के बीच सरकार के खिलाफ असंतोष पैदा किया. इसी दौरान राष्ट्रीय स्तर पर छात्रों और युवाओं के आंदोलन भी चर्चा में रहे. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इन घटनाओं का असर बिहार के युवाओं पर भी पड़ा और चुनावी विमर्श बदलने लगा.
शिक्षा और रोजगार को बनाया सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा
प्रशांत किशोर ने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान विकास, शिक्षा और रोजगार को सबसे आगे रखा. उन्होंने बार-बार कहा कि बिहार के लाखों युवाओं को अच्छी पढ़ाई और नौकरी के लिए राज्य से बाहर जाना पड़ता है. उन्होंने दावा किया कि यदि शिक्षा व्यवस्था मजबूत होगी और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, तभी बिहार का भविष्य बदलेगा. यह संदेश खासकर पहली बार मतदान करने वाले और पढ़े-लिखे युवाओं के बीच असरदार साबित हुआ.
विपक्ष की कमजोरी का भी मिला लाभ
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस दौरान विपक्ष के पारंपरिक दल कई अहम मुद्दों पर उतने आक्रामक नहीं दिखे, जितनी उम्मीद की जा रही थी. छात्रों से जुड़े मुद्दों और रोजगार जैसे सवालों पर प्रशांत किशोर लगातार सक्रिय रहे. इससे सरकार से नाराज लेकिन पारंपरिक विपक्ष से भी निराश मतदाताओं का एक वर्ग जन सुराज की ओर झुकता दिखाई दिया.
भाजपा को उम्मीदवार बदलना भी पड़ा
उपचुनाव के दौरान भाजपा को भी अप्रत्याशित परिस्थितियों का सामना करना पड़ा. पार्टी के घोषित उम्मीदवार अभिषेक कुमार सिन्हा ने व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए नामांकन वापस ले लिया. इसके बाद भाजपा को नए उम्मीदवार के साथ चुनाव लड़ना पड़ा. हालांकि पार्टी ने पूरी ताकत झोंकी, लेकिन उम्मीदवार बदलने की चर्चा पूरे चुनाव अभियान के दौरान बनी रही.
क्या जन सुराज को मिला दोनों बड़े दलों के वोटों का फायदा?
मतदान के विस्तृत आंकड़े सामने आने के बाद ही पूरी तस्वीर स्पष्ट होगी, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत किशोर को भाजपा और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) दोनों के पारंपरिक वोट बैंक से कुछ समर्थन मिला. विशेष रूप से शहरी, शिक्षित और युवा मतदाताओं का एक वर्ग बदलाव के पक्ष में दिखाई दिया. यही वर्ग चुनाव परिणाम में निर्णायक साबित हुआ.
यह सिर्फ एक सीट की जीत नहीं
बांकीपुर उपचुनाव का परिणाम केवल एक विधायक चुनने तक सीमित नहीं माना जा रहा. यह जन सुराज की पहली चुनावी जीत है और प्रशांत किशोर की पहली प्रत्यक्ष चुनावी सफलता भी. राजनीतिक दृष्टि से यह संदेश भी गया कि बिहार में अब तीसरे राजनीतिक विकल्प की संभावना को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
आगे की राह कितनी आसान होगी?
हालांकि एक उपचुनाव के आधार पर पूरे राज्य की राजनीति का आकलन करना जल्दबाजी होगी, लेकिन बांकीपुर के नतीजों ने यह जरूर दिखाया है कि जन सुराज अब केवल एक चुनावी प्रयोग नहीं रही. यदि पार्टी संगठन को इसी तरह मजबूत करती है, स्थानीय मुद्दों पर लगातार सक्रिय रहती है और शिक्षा, रोजगार तथा सुशासन को अपना प्रमुख एजेंडा बनाए रखती है, तो आने वाले विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है.
हार से जीत तक की कहानी
प्रशांत किशोर की इस जीत का सबसे बड़ा संदेश यही है कि चुनावी हार हमेशा राजनीतिक अंत नहीं होती. नौ महीने पहले जिस पार्टी के खाते में 0 सीट थी और जिसके 236 उम्मीदवार जमानत तक नहीं बचा पाए थे, वही पार्टी आज बिहार विधानसभा में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में सफल हुई है. बांकीपुर का परिणाम बताता है कि संगठन पर लगातार काम, जनता के बीच सक्रिय मौजूदगी और मुद्दा आधारित राजनीति कई बार चुनावी गणित को पूरी तरह बदल सकती है. यही वजह है कि इस उपचुनाव को बिहार की राजनीति में एक बड़े राजनीतिक कमबैक के रूप में देखा जा रहा है.




