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Chaitra Navratri 2026: बिना ‘लंगूर’ क्यों अधूरी मानी जाती है कन्या पूजा? भैरव बाबा से जुड़ा है संबंध

नवरात्रि के दौरान होने वाला कन्या पूजन बेहद पवित्र माना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसमें ‘लंगूर’ को शामिल किए बिना पूजा अधूरी मानी जाती है? यह परंपरा सिर्फ एक रिवाज नहीं, बल्कि गहरी धार्मिक मान्यता से जुड़ी हुई है.

Chaitra Navratri 2026: बिना ‘लंगूर’ क्यों अधूरी मानी जाती है कन्या पूजा? भैरव बाबा से जुड़ा है संबंध
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( Image Source:  ANI )
हेमा पंत
Edited By: हेमा पंत3 Mins Read

Updated on: 25 March 2026 2:04 PM IST

चैत्र नवरात्रि का समय हिंदू धर्म में बेहद खास माना जाता है. नौ दिनों तक मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है और अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है. इस दिन घरों में छोटी-छोटी कन्याओं को देवी का रूप मानकर उनकी पूजा की जाती है, उन्हें भोजन कराया जाता है और उपहार दिए जाते हैं. लेकिन इस पूजा में एक और खास परंपरा देखने को मिलती है.

कन्याओं के साथ एक छोटे लड़के को भी बैठाया जाता है, जिसे ‘लंगूर’ कहा जाता है. मान्यता है कि बिना लंगूर के कन्या पूजन अधूरा होता है. ऐसे में चलिए जानते हैं आखिर इस ‘लंगूर’ का क्या महत्व है और इसे क्यों शामिल किया जाता है.

‘लंगूर’ कौन होता है?

कन्या पूजन में कन्याओं के साथ एक छोटे लड़के को भी बैठाया जाता है, जिसे ‘लंगूर’ कहा जाता है. यह परंपरा सिर्फ एक रीति नहीं, बल्कि गहरी धार्मिक मान्यता से जुड़ी हुई है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह बालक ‘भैरव बाबा’ का प्रतीक माना जाता है. भैरव बाबा को मां दुर्गा का रक्षक और उनका परम भक्त माना जाता है. इसलिए कन्याओं के साथ ‘लंगूर’ को बैठाना इस पूजा को पूर्णता प्रदान करता है.

भैरव बाबा से जुड़ा है संबंध

मान्यता है कि जहां मां दुर्गा की पूजा होती है, वहां भैरव बाबा की उपस्थिति भी आवश्यक मानी जाती है. भैरव बाबा को शक्तिशाली और रक्षक देवता के रूप में पूजा जाता है, जो देवी के सभी स्वरूपों की रक्षा करते हैं. इसी कारण कन्या पूजन में ‘लंगूर’ को बैठाकर भैरव बाबा का आह्वान किया जाता है. इससे पूजा अधिक फलदायी और संपूर्ण मानी जाती है.

कुछ जगहों पर गणेश जी का भी प्रतीक

कई घरों में कन्याओं के साथ दो लड़कों को बैठाया जाता है. इनमें से एक को भैरव बाबा का रूप और दूसरे को भगवान गणेश का प्रतीक माना जाता है. भगवान गणेश को हर शुभ कार्य की शुरुआत में पूजनीय माना जाता है, इसलिए उन्हें भी इस पूजा में शामिल किया जाता है ताकि सभी कार्य बिना किसी विघ्न के पूरे हों.

कन्या पूजन से मिलती है विशेष कृपा

धार्मिक मान्यता है कि जो भक्त पूरे श्रद्धा भाव से नवरात्रि के नौ दिनों तक व्रत और पूजा करते हैं और अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन करते हैं, उन्हें मां दुर्गा का विशेष आशीर्वाद मिलता है. कन्या पूजन सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि नारी शक्ति और दिव्य ऊर्जा का सम्मान करने का प्रतीक है. वहीं ‘लंगूर’ को शामिल करने की परंपरा इस पूजा को संतुलन और पूर्णता प्रदान करती है. कन्या पूजन में ‘लंगूर’ को बैठाने की परंपरा के पीछे गहरी धार्मिक मान्यता छिपी हुई है. यह न सिर्फ भैरव बाबा की उपस्थिति का प्रतीक है, बल्कि यह बताता है कि हर पूजा में संतुलन और सभी दिव्य शक्तियों का समावेश जरूरी है. इस तरह, कन्या पूजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, श्रद्धा और परंपरा का सुंदर संगम है, जो पीढ़ियों से चला आ रहा है.

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