कैसे जानें आपका इष्टदेव कौन हैं? जिनकी पूजा करने से जीवन में मिलती है सुख-शांति और सफलता
इष्टदेव की कृपा से जीवन में सुख, शांति और सफलता आती है. कुंडली में आत्मकारक ग्रह और नवमांश चार्ट के आधार पर इष्टदेव का निर्धारण किया जाता है. ऐसा मानना है कि इष्टदेव की उपासना से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है.
कुंडली में छिपा है आपके इष्टदेव का संकेत
How To Find Your Ishta Devta Using Kundli: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, हर व्यक्ति का एक इष्ट देव होता है, जिनकी कृपा जीवन में सुख, शांति और सफलता दिलाने में मदद करती है. कुंडली में आत्मकारक ग्रह और नवमांश चार्ट के आधार पर इष्टदेव का निर्धारण किया जाता है.
मान्यता है कि इष्टदेव की उपासना से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है. कठिन समय में मानसिक शक्ति मिलती है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं.
इष्टदेव क्या हैं ?
इष्ट का अर्थ होता है वांछित, अनुकूल या जिसकी इच्छा की गई हो. जाहिर है इष्टदेव वो ईश्वरीय तत्व हैं जिसका संबंध जातक विशेष से होता है और उन पर इष्टदेव की अनुकूल कृपा बनी रहती है. थोड़ी अराधना में भी ये प्रसन्न हो जाते हैं. ठीक उसी तरह जैसे बच्चों की थोड़ी सेवा से ही मां-बाप अपना पूरा स्नेह न्योछावर कर देते हैं, दूसरे लाख जतन के बावजूद वो नहीं देते जो माता-पिता दे सकते हैं.
कुंडली में इष्टदेव
कुंडली में इष्ट देवी या देवता वो महत्वपूर्ण बिंदू हैं जिनका निर्धारण भी ग्रह और नक्षत्र ही करते हैं ठीक उसी तरह जैसे स्वास्थ्य, धन, विवाहिक जीवन, सफलता-असफलता, मान प्रतिष्ठा व अन्य विषयों का करते हैं. इष्टदेव का निर्धारण आपके जन्म के समय ग्रहों की स्थिति के अनुसार होता है.
इष्टदेव का महत्व क्यों?
इष्टदेव नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा करते हैं और जीवन में सकारात्मकता भरते हैं. वे बीमारी या विपरीत परिस्थियों में मददगार होते और तरक्की को गति प्रदान करते हैं. साथ ही, कठिन स्थिति में सहनशीलता बनाए रखने में सहायक होते हैं.
कैसे जाने आपका इष्टदेव कौन हैं?
इष्टदेव का निर्धारण कुंडली में आत्मकारक ग्रह के जरिए होता है. हर किसी की कुंडली में वो ग्रह जिसकी डिग्री (1-30 डिग्री) के बीच, अन्य ग्रहों से ज्यादा होगी वो आत्मकारक ग्रह होगा. आत्मकारक ग्रह में केतु की गणना नहीं होती.
आत्मकारक ग्रह ---लग्न चार्ट (D-1) में जिसकी डिग्री सबसे ज्यादा हो (इसमें केतु की गणना नहीं होती)
लग्न D-1 में जो आत्मकारक ग्रह है उसे नवमांश D-9 में देखें कि कहां किस घर में स्थित (बैठा हुआ) है.
- नवमांश चार्ट D-9 में बैठे हुए आत्मकारक से 12वां घर (यानि एक घर पीछे) में बैठे हुए ग्रह या उसकी राशि इष्टदेव का निर्धारण करते हैं.
नवमांश में आत्मकारक से 12वें घर (यानि एक घर पीछे) में किसी भी कुंडली में तीन स्थितियां बनेंगी.
पहला- कोई ग्रह नहीं होगा. दूसरा- एक ग्रह होगा और तीसरा एक से अधिक ग्रह होंगे. पहली और दूसरी स्थिति में इष्टदेव का निर्धारण करना बेहद आसान है.
अगर कोई ग्रह नहीं है तो जो राशि है उसी के नंबर के आधार पर इष्टदेव का निर्धारण करें. सम राशि नंबर है तो देवी और विषम राशि नंबर है तो देवता इष्टदेव होंगे.
- अगर एक ग्रह बैठा है तो जो ग्रह है उससे जुड़े इष्टदेव होंगे. सम राशि में ग्रह है तो देवी इष्टदेव और विषम में है तो देवता इष्टदेव होंगे.
- एक से अधिक ग्रह होने पर षडबल में जो अधिक बलवान होगा उसी से जुड़े देवी या देवता इष्टदेव होंगे.
-राशि में भी विषम नंबर है तो देवता इष्ट और सम नंबर है तो देवी इष्ट होंगे. जैसे सूर्य मेष में हैं --- विषम राशि की वजह से राम इष्टदेव होंगे. सूर्य कर्क में हैं --- तो सम राशि में होने की वजह से मातंगी इष्ट होंगी.
इष्टदेव का निर्धारण क्यों जरूरी है?
इष्टदेव का निर्धारण हर कुंडली के लिए जरूरी है. इष्ट कुंडली में सारथी की भांति है जो न सिर्फ सही मार्ग पर आगे बढ़ाता है बल्कि बल्कि जातक की सुरक्षा और कामयाबी भी तय करते हैं. इष्ट की आप घर में तस्वीर लगा सकते हैं. क्योंकि उनकी उपासना सभी कामनाओं को पूरा करने वाली है.




