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Uknown Facts: नीदरलैंड के लोग क्यों नहीं लगाते पर्दे? क्या है खुली खिड़कियों का राज

जहां दुनिया के कई हिस्सों में अंधेरा होते ही घरों को बाहर की नजरों से बचा लिया जाता है, वहीं नीदरलैंड में ऐसा नहीं होता है. वहां के लोग अपने घरों की खिड़कियों में पर्दे नहीं लगाते हैं.

Uknown Facts: नीदरलैंड के लोग क्यों नहीं लगाते पर्दे? क्या है खुली खिड़कियों का राज
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( Image Source:  AI SORA )
हेमा पंत
Edited By: हेमा पंत

Updated on: 10 Feb 2026 12:43 PM IST

अगर आप यूरोप में शाम ढले किसी डच मोहल्ले से गुजरेंगे, तो एक चीज़ आपको तुरंत चौंका देगी. घरों की लाइटें जल चुकी हैं, लोग सोफे पर बैठे हैं, कोई डिनर कर रहा है, कोई टीवी देख रहा है और यह सब सड़क से साफ दिखाई देता है. पहली नज़र में लगता है जैसे पूरा इलाका “ओपन हाउस” पार्टी दे रहा हो.

जहां कई देशों में अंधेरा होते ही परदे गिरा दिए जाते हैं, वहीं नीदरलैंड में खिड़कियां अक्सर खुली रहती हैं. तो क्या लोग सच में चाहते हैं कि राह चलते लोग उनकी जिंदगी देखें? कहानी इससे कहीं ज्यादा मजेदार है. चलिए जानते हैं आखिर क्यों नीदरलैंड के लोग पर्दों का नहीं करते इस्तेमाल.

घूरना मना है

सबसे पहले यह जान लें कि अगर खिड़कियां खुली हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप उनके घरों के अंदर झांकने लगे. चलते-चलते एक झलक पड़ जाए, ठीक है. मगर खड़े होकर अंदर झांकते रहना? बिल्कुल सही नहीं माना जाता है. यानी डच लोग अपनी प्राइवेसी को समझते हैं, बस वे उसे दीवारों से नहीं, बिहेवियर से तय करते हैं.

क्लाइमेट है कारण

नीदरलैंड में साल के कई महीने सूरज मेहमान जैसा रहता है. यानी कम दिखता है. ऐसे में जितनी रोशनी मिले, उतनी अंदर आने देना समझदारी है. घर उजला लगे, मूड बेहतर हो. यह वजह दिन में तो समझ आती है, पर दिलचस्प बात यह है कि रात में भी परदे अक्सर खुले मिलते हैं.

कलविनिज़म से जुड़ा है कनेक्शन

अक्सर इस आदत को पुराने धार्मिक प्रभाव से जोड़ा जाता है. माना जाता है कि सादगी और ईमानदारी को महत्व देने वाली सोच ने लोगों को खुलेपन की तरफ बढ़ाया- परदे खुले, जिंदगी खुली. मैसेज सीधा: “देख लो, सब सामान्य है.” हालांकि आज का नीदरलैंड काफी मॉडर्न और सेक्युलर है, फिर भी यह पारदर्शिता वाला कल्चर कहीं न कहीं लोगों के व्यवहार में बचा रह गया है.

वर्ल्ड वॉर

दूसरी कहानी वर्ल्ड वॉर से जुड़ी है. उस समय रात में घरों की रोशनी बाहर न दिखे, इसके सख्त नियम थे. मोटे परदे, ढंकी खिड़कियां-सब मजबूरी थी. युद्ध खत्म हुआ तो लोगों ने राहत की सांस ली और रोशनी को खुलकर बाहर आने दिया. कुछ लोग मानते हैं कि परदे खोलना आज़ादी का छोटा सा जश्न बन गया.

क्या है असली वजह?

शायद यह इतिहास, आदत, डिज़ाइन, और समाज का भरोसा कई वजहों का मिक्स है. डच लोग अपने घर को किले की तरह बंद नहीं करते, बल्कि मोहल्ले का हिस्सा मानते हैं. तो अगली बार अगर किसी डच खिड़की से आपको डिनर टेबल दिख जाए, मुस्कुरा कर आगे बढ़ जाइए. याद रखिए- देखना ठीक, टकटकी लगाना नहीं!

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