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अगर आप भी लक्षण दिखने के बाद AI से पूछते हैं बीमारी, तो हो जाएं सावधान! जानें क्या कहती है नई रिसर्च

अगर आप भी लक्षण दिखते ही तुरंत एआई से पूछते हैं कि आपको क्या हुआ है, तो इस आदत को दूर कर लें, क्योंकि यह आपकी परेशानी बढ़ा सकता है. नई रिसर्च में खुलासा हुआ है कि एआई से बीमारी पूछना गलत हो सकता है.

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( Image Source:  AI SORA )
हेमा पंत
Edited By: हेमा पंत

Updated on: 10 Feb 2026 5:29 PM IST

सिर दर्द हो या अचानक थकान, आजकल कई लोग तुरंत एआई से पूछ लेते हैं कि आखिर बीमारी क्या है. जवाब फटाफट मिल जाता है. इसलिए उस पर भरोसा करना आसान लगता है. लेकिन नई रिसर्च चेतावनी दे रही है कि एआई की सलाह हर बार सही नहीं होती, और इस पर आंख बंद करके यकीन करना आपकी सेहत के लिए जोखिम भरा हो सकता है.

हाल ही में ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के साइंटिस्ट्स ने एक रिसर्च की, जिसमें ऑक्सफ़ोर्ड इंटरनेट इंस्टीट्यूट और नफ़ील्ड डिपार्टमेंट ऑफ़ प्राइमरी केयर हेल्थ साइंसेज़ की टीमें शामिल थीं. नई स्टडी में खुलासा हुआ कि एआई कॉन्फिडेंस से जवाब जरूर देता है, पर हर बार सही हो, यह जरूरी नहीं. इसलिए असली खतरा यही है.

क्या कहती है नई रिसर्च?

इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने 1,300 लोगों को अलग-अलग हेल्थ कंडीशन दीं, जैसे तेज सिरदर्द या डिलीवरी के बाद की थकान. कुछ लोगों ने सलाह के लिए एआई का सहारा लिया, जबकि बाकी ने कहा कि वह डॉक्टर के पास जाएंगे. नतीजों में पाया गया कि चैटबॉट्स से मिली जानकारी कभी सही, कभी भ्रामक थी. लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो गया कि किस पर भरोसा करें.

क्या है समस्या?

एआई अक्सर संभावित बीमारियों की लिस्ट दे देता है. लेकिन उनमें से असली समस्या कौन-सी है, यह तय करना मरीज पर छोड़ देता है. यहीं गड़बड़ हो सकती है. बिना मेडिकल ट्रेनिंग वाला व्यक्ति अंदाज़ा लगाता है और गलत फैसला ले सकता है.

सवाल पूछने का तरीका

हम डॉक्टर को भी सारी बातें एक साथ नहीं बताते. कभी कुछ भूल जाते हैं, कभी ठीक से समझा नहीं पाते. एआई के साथ भी यही होता है. सवाल थोड़े अलग ढंग से पूछा जाए, तो जवाब पूरी तरह बदल सकता है. यानी रिजल्ट स्थिर नहीं, बल्कि बदलते रहते हैं. चैटबॉट्स का टोन बहुत कॉन्फिडेंट होता है. पढ़कर लगता है कि जवाब पक्का है. लेकिन रिसर्चर्स कहते हैं कि अंदर की जानकारी उतनी मजबूत नहीं होती जितनी बाहर से दिखती है. यही वजह है कि लोग बिना सोचे-समझे उस पर यकीन कर लेते हैं.

बढ़ता इस्तेमाल, बढ़ती चिंता

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, मेंटल हेल्थ यूके के सर्वे में सामने आया कि अब हर तीन में से एक से अधिक व्यक्ति अपनी मेंटल हेल्थ और वेलबिंइंग के लिए किसी न किसी रूप में एआई बेस्ड सोर्स का सहारा ले रहा है. आजकल बड़ी संख्या में लोग मानसिक सेहत से लेकर सामान्य बीमारियों तक के लिए एआई टूल्स का उपयोग कर रहे हैं. सुविधा जरूर है, पर खतरा भी साथ आता है, क्योंकि मशीन इंसान की जटिलताओं को हमेशा सही तरह नहीं समझ पाती.

क्या करें?

एआई से शुरुआती जानकारी लेना गलत नहीं, लेकिन उसे आखिरी सच मान लेना जोखिम भरा है. अगर लक्षण गंभीर हैं, लंबे समय से बने हुए हैं, या समझ नहीं आ रहे, तो अच्छे डॉक्टर से मिलना ही सबसे सेफ रास्ता है. टेक्नोलॉजी मदद कर सकती है, मगर इलाज का फैसला अभी भी इंसानी समझ ही बेहतर करती है.

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