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संविधान में लाल किले का जिक्र तक नहीं, फिर हर 15 अगस्त को PM यहीं क्यों फहराते हैं तिरंगा?

संविधान में लाल किले का जिक्र नहीं, फिर 15 अगस्त को PM यहीं से तिरंगा क्यों फहराते हैं? जानिए 1947 की पहली सुबह से बनी इस ऐतिहासिक परंपरा की पूरी कहानी.

संविधान में लाल किले का जिक्र तक नहीं, फिर हर 15 अगस्त को PM यहीं क्यों फहराते हैं तिरंगा?
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हर साल 15 अगस्त नजदीक आते ही देश के लोगों की नजरें लाल किले पर टिक जाती हैं. प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर पर पहुंचते हैं, तिरंगा फहराते हैं, राष्ट्रगान होता है और फिर देश को संबोधित करते हैं. लेकिन क्या संविधान में कहीं लिखा है कि प्रधानमंत्री को स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से ही तिरंगा फहराना होगा? जवाब है- नहीं. तो फिर लाल किला ही देश की आजादी का सबसे बड़ा मंच कैसे बन गया? इस स्टोरी के जरिए जानें सबकुछ.

15 अगस्त 1947 को लाल किले पर क्या हुआ था?

इस कहानी की शुरुआत संविधान से नहीं, बल्कि 15 अगस्त 1947 से होती है. भारत को ब्रिटिश शासन से आजादी मिली और जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. रक्षा मंत्रालय के आधिकारिक Rashtraparv पोर्टल के मुताबिक, उसी दिन नेहरू ने दिल्ली के लाल किले के लाहौरी गेट के ऊपर राष्ट्रीय ध्वज फहराया था. इसके बाद हर स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री द्वारा लाल किले से ध्वजारोहण और राष्ट्र को संबोधित करने की परंपरा बनती चली गई.

यहां पर गौर फरमाने वाली बात यह है कि लाल किले से स्वतंत्रता दिवस का पहला ध्वजारोहण 1950 में संविधान लागू होने से पहले ही हो चुका था. जबकि भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ. इसलिए लाल किले की भूमिका किसी संवैधानिक आदेश से नहीं, बल्कि आजादी के शुरुआती राष्ट्रीय समारोह से बनी.

लाल किला ही आजादी का प्रतीक क्यों बना?

लाल किला सिर्फ एक ऐतिहासिक इमारत नहीं था. शाहजहां के दौर से यह दिल्ली में सत्ता का प्रमुख प्रतीक रहा. यूनेस्को के मुताबिक, लाल किला लंबे समय तक सत्ता का प्रतीक रहा और बाद में ब्रिटिश सैन्य कब्जे का भी गवाह बना.

1857 के विद्रोह ने लाल किले को भारतीय प्रतिरोध के इतिहास से और जोड़ दिया. बहादुर शाह जफर और दिल्ली के विद्रोह का अध्याय इसी किले से जुड़ा रहा. विद्रोह के बाद ब्रिटिश सेना ने लाल किले पर कब्जा किया और इसके बड़े हिस्से का सैन्य इस्तेमाल किया.

1940 के दशक में आजाद हिंद फौज के अधिकारियों के मुकदमे यानी INA Trials ने लाल किले को स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति से जोड़ दिया. लाल किले में हुए इन मुकदमों ने देशभर में राजनीतिक और जनभावना को प्रभावित किया.

यानी जब भी हम- संविधान में लाल किले का जिक्र तक नहीं, फिर हर 15 अगस्त को PM यहीं क्यों फहराते हैं तिरंगा, का जवाब ढूंढते हैं तो लाल किले से जुड़ी तीन बड़ी ऐतिहासिक परतें सामने आती हैं. पहला मुगल सत्ता, दूसरा 1857 का संघर्ष और तीसरा INA का ट्रायल. यही वजह है कि 1947 में इसी जगह स्वतंत्र भारत का तिरंगा फहराना इसलिए बेहद शक्तिशाली प्रतीक बन गया.

क्या PM के लिए लाल किला संवैधानिक रूप से जरूरी है?

यहां सबसे बड़ा भ्रम दूर करना जरूरी है. संविधान में ऐसा कोई नियम नहीं है कि प्रधानमंत्री को हर 15 अगस्त को लाल किले से ही तिरंगा फहराना होगा. अनुच्छेद 75 प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की संवैधानिक व्यवस्था बताता है, लेकिन ध्वजारोहण के स्थान का निर्धारण नहीं करता. इसलिए, इसे संवैधानिक बाध्यता कहना गलत होगा. सही तथ्य यह है कि 15 अगस्त 1947 की ऐतिहासिक शुरुआत बाद में राष्ट्रीय परंपरा और राजकीय प्रोटोकॉल में बदल गई.

रक्षा मंत्रालय का पोर्टल् Rashtraparv के अनुसार स्वतंत्रता दिवस के आधिकारिक समारोह में प्रधानमंत्री का लाल किले पहुंचना, ध्वजारोहण, राष्ट्रगान, 21 तोपों की सलामी और राष्ट्र के नाम संबोधन शामिल होता है. रक्षा मंत्रालय के कार्यक्रम में भी लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का संबोधन इसी स्थापित परंपरा के हिसाब से तय हुआ है.

क्या फ्युचर में पीएम किसी दूसरी जगह से झंडा फहरा सकते हैं?

सैद्धांतिक रूप से लाल किले को अनिवार्य करने वाला कोई विशेष संवैधानिक प्रावधान नहीं है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जगह बदलना सामान्य प्रशासनिक फैसला होगा. 1947 से लगातार लाल किले की प्राचीर स्वतंत्रता दिवस की राष्ट्रीय स्मृति का हिस्सा बन चुकी है. यूनेस्को भी लाल किले को भारतीय सत्ता के इतिहास और स्वतंत्रता के उत्सव से जोड़ता है.

इसलिए यदि कभी मुख्य समारोह का स्थान बदला जाता है, तो वह सिर्फ एक लोकेशन बदलना नहीं होगा. इससे 1947 से चली आ रही राष्ट्रीय परंपरा और स्वतंत्रता की सार्वजनिक स्मृति में बदलाव आएगा.

15 अगस्त लाल किला और 26 जनवरी का मंच अलग क्यों है?

15 अगस्त और 26 जनवरी दोनों राष्ट्रीय पर्व हैं, लेकिन दोनों का महत्व अलग है. 15 अगस्त भारत की स्वतंत्रता का दिन है. इस दिन प्रधानमंत्री लाल किले से राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं और देश को संबोधित करते हैं. वहीं, 26 जनवरी को संविधान लागू होने और भारत के गणराज्य बनने की याद में मनाई जाती है. इस दिन राष्ट्रपति की भूमिका प्रमुख होती है और गणतंत्र दिवस का मुख्य समारोह कर्तव्य पथ पर परेड के साथ होता है. इसलिए दोनों मौकों के मंच और समारोह अलग हैं.

तो हर 15 अगस्त लाल किले पर तिरंगा क्यों फहराया जाता है?

संविधान ने लाल किले को नहीं चुना, इतिहास ने चुन दिया. 15 अगस्त 1947 को नेहरू द्वारा लाल किले से पहली बार तिरंगा फहराने के बाद यह परंपरा लगातार आगे बढ़ी. इससे कई ऐतिहासिक पड़ाव जुड़े. यही वजह है कि संविधान में लाल किले का नाम न होने के बावजूद, 15 अगस्त की सुबह वहां लहराता तिरंगा सिर्फ ध्वजारोहण नहीं होता- वह स्वतंत्र भारत की उस पहली सुबह की याद है, जब एक गुलाम देश ने अपनी संप्रभुता का ऐलान किया था.

नरेंद्र मोदीएक्सप्लेनर
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