राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्रियों तक, TOP-5 की सुरक्षा और काफिले पर होता है कितना खर्च, अब कटौती जरूरी या मजबूरी?
राष्ट्रपति से मुख्यमंत्री तक VIP सुरक्षा और काफिलों पर हर साल कितना खर्च होता है? जानिए क्यों अब सुरक्षा खर्च में कटौती की चर्चा तेज है.
मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध और वैश्विक तनाव के बीच भारत सरकार भी सुरक्षा और सरकारी खर्चों को लेकर सतर्क नजर आ रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही पेट्रोल, डीजल और डॉलर क्राइसिस को ध्यान में रखते हुए वीआईपी सुरक्षा और सरकारी तामझाम में कटौती के संकेत दिए हैं, जिसके बाद कई राज्य सरकारों ने भी मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के काफिलों को छोटा करने तथा गैरजरूरी खर्च घटाने की घोषणा की है.
ऐसे समय में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल और मुख्यमंत्रियों की सुरक्षा पर होने वाले भारी खर्च को लेकर बहस तेज हो गई है. देश के इन शीर्ष संवैधानिक पदों की सुरक्षा में SPG कमांडो, Z+ सिक्योरिटी, बुलेटप्रूफ वाहन, एंटी-ड्रोन सिस्टम और हाईटेक निगरानी तंत्र शामिल होते हैं, जिन पर हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं. सवाल यह है कि आखिर किस पद की सुरक्षा पर सबसे ज्यादा पैसा खर्च होता है और मौजूदा हालात में इसमें कितनी कटौती संभव है.
दरअसल, भारत में राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों तक, देश के शीर्ष संवैधानिक पदों की सुरक्षा व्यवस्था दुनिया की सबसे हाईटेक और बहुस्तरीय सुरक्षा प्रणालियों में गिनी जाती है. इन पदों पर बैठे लोगों की सुरक्षा केवल व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और संवैधानिक स्थिरता से भी जोड़कर देखा जाता है. यही वजह है कि इनके लिए कमांडो यूनिट, बुलेटप्रूफ वाहन, एडवांस सर्विलांस सिस्टम, एंटी-ड्रोन टेक्नोलॉजी और मल्टी-लेयर सिक्योरिटी ग्रिड का इस्तेमाल किया जाता है.
केंद्र सरकार के वार्षिक वित्तीय विवरण 2025-26 (Annual Financial Statement of The Central Government For 2025-2026), GovernmentBudget.com और टीओआई की रिपोर्ट्स के अनुसार, इन संवैधानिक पदों की सुरक्षा पर हर साल हजारों करोड़ रुपये प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से खर्च होते हैं. हालांकि, सरकार हर पद की सुरक्षा लागत अलग मद में सार्वजनिक नहीं करती, क्योंकि इसका बड़ा हिस्सा गृह मंत्रालय, SPG, इंटेलिजेंस ब्यूरो, राज्य पुलिस और राष्ट्रपति सचिवालय जैसे विभागों के बजट में शामिल रहता है.
राष्ट्रपति की सेफ्टी पर कितना खर्च?
भारत के राष्ट्रपति को सर्वोच्च संवैधानिक पद प्राप्त है, इसलिए उनकी सुरक्षा व्यवस्था बेहद व्यापक होती है. राष्ट्रपति भवन की सुरक्षा राष्ट्रपति बॉडीगार्ड (PBG), दिल्ली पुलिस, सेना और विशेष सुरक्षा इकाइयों के संयुक्त समन्वय से संचालित होती है. राष्ट्रपति के काफिले में बुलेटप्रूफ लिमोजिन, एंटी-माइन वाहन, जैमर सिस्टम और एस्कॉर्ट कमांडो शामिल रहते हैं.
राष्ट्रपति भवन परिसर में फेस रिकग्निशन कैमरे, इलेक्ट्रॉनिक एक्सेस कंट्रोल, स्नाइपर पॉइंट और हाई-रिजॉल्यूशन सर्विलांस सिस्टम लगाए गए हैं. विदेश यात्राओं या राष्ट्रीय आयोजनों के दौरान सुरक्षा में NSG और IB भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं.
2025-26 के बजट दस्तावेजों में “President, Vice President and Governors” शीर्षक के तहत ₹125 करोड़ से अधिक का प्रावधान किया गया था. इसमें सुरक्षा के अलावा स्टाफ, आवास, यात्रा और प्रशासनिक खर्च भी शामिल हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक वास्तविक सुरक्षा लागत इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि कई सुरक्षा खर्च गोपनीय श्रेणी में रखे जाते हैं.
उपराष्ट्रपति की सिक्योरिटी कैसी?
देश के दूसरे सर्वोच्च संवैधानिक पद यानी उपराष्ट्रपति को आमतौर पर Z+ सुरक्षा दी जाती है. उनकी सुरक्षा CRPF, दिल्ली Police और इंटेलिजेंस एजेंसियों की निगरानी में होती है. उपराष्ट्रपति निवास और संसद के दौरान अतिरिक्त सुरक्षा परतें लगाई जाती हैं. सुरक्षा तंत्र में बुलेटप्रूफ वाहन, एस्कॉर्ट यूनिट, क्विक रिएक्शन टीम, CCTV नेटवर्क और एडवांस कम्युनिकेशन सिस्टम शामिल रहते हैं. संसद सत्र या बड़े सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान उनके रूट को अस्थायी रूप से सील किया जाता है.
हालांकि, उपराष्ट्रपति की सुरक्षा पर होने वाले खर्च का अलग आंकड़ा सार्वजनिक नहीं होता, लेकिन यह राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति सचिवालय और गृह मंत्रालय के संयुक्त बजट में शामिल रहता है. सुरक्षा व्यवस्था में टेक्नोलॉजी अपग्रेड और मानव संसाधन पर लगातार खर्च बढ़ रहा है.
प्रधानमंत्री की सुरक्षा सबसे महंगी क्यों?
प्रधानमंत्री की सुरक्षा को देश की सबसे उन्नत सुरक्षा व्यवस्था माना जाता है. प्रधानमंत्री को SPG यानी Special Protection Group सुरक्षा मिलती है. SPG में हजारों विशेष रूप से प्रशिक्षित कमांडो तैनात रहते हैं, जो प्रधानमंत्री के हर कार्यक्रम और यात्रा की निगरानी करते हैं.
प्रधानमंत्री के काफिले में बुलेटप्रूफ BMW 7 Series, Range Rover Sentinel, जैमर वाहन, एंटी-ड्रोन सिस्टम और एयर सिक्योरिटी सपोर्ट शामिल होता है. किसी भी दौरे से पहले एडवांस सिक्योरिटी लायजनिंग (ASL) की जाती है, जिसमें SPG, IB, राज्य पुलिस और स्थानीय प्रशासन मिलकर सुरक्षा प्लान तैयार करते हैं.
2026-27 के बजट में प्रधानमंत्री कार्यालय, मंत्रिपरिषद और कैबिनेट सचिवालय के लिए करीब ₹1,102 करोड़ का आवंटन किया गया. इसके अलावा SPG, इंटेलिजेंस ब्यूरो और एयर सिक्योरिटी से जुड़े खर्च अलग हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर प्रतिदिन 1.6 करोड़ों रुपये खर्च होते हैं.
आंतरिक सुरक्षा के लिए IB का बजट भी 2026-27 में बढ़ाकर करीब ₹6,782 करोड़ किया गया, जिसका एक हिस्सा VIP सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा संचालन पर खर्च होता है.
राज्यपालों पर कितना खर्च?
राज्यपालों को राज्यों का संवैधानिक प्रमुख माना जाता है, इसलिए उन्हें भी उच्च स्तरीय सुरक्षा उपलब्ध कराई जाती है. आमतौर पर राज्यपालों को Z या Z+ कैटेगरी की सुरक्षा मिलती है. यह सुरक्षा राज्य पुलिस, विशेष सुरक्षा बल और इंटेलिजेंस यूनिट्स द्वारा संभाली जाती है. राजभवनों में मल्टी-लेयर सिक्योरिटी सिस्टम, CCTV निगरानी, गार्ड पोस्ट और कंट्रोल्ड एंट्री सिस्टम लगाए जाते हैं. राज्यपालों के काफिले में पायलट कार, एस्कॉर्ट वाहन और रिजर्व पुलिस बल तैनात रहता है.
राज्यपाल सुरक्षा का पूरा खर्च संबंधित राज्य सरकारें उठाती हैं. बड़े और संवेदनशील राज्यों में यह खर्च सालाना कई करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है. नक्सल या आतंकवाद प्रभावित राज्यों में अतिरिक्त सुरक्षा इंतजामों के कारण खर्च और बढ़ जाता है.
CM की सेफ्टी पर भी करोड़ों का खर्च
देश के मुख्यमंत्रियों की सुरक्षा का स्तर उनके खतरे के आकलन और राजनीतिक प्रोफाइल पर निर्भर करता है. कई मुख्यमंत्रियों को Z+ या NSG सुरक्षा भी प्रदान की जाती है. उनकी सुरक्षा में राज्य पुलिस, ATS, STF और इंटेलिजेंस विंग शामिल रहते हैं.
मुख्यमंत्री आवासों को हाई-सिक्योरिटी जोन की तरह विकसित किया जाता है, जहां बायोमेट्रिक एंट्री, ड्रोन निगरानी, बुलेटप्रूफ कंट्रोल रूम और स्पेशल कमांडो यूनिट तैनात रहती हैं. उनके काफिले में दर्जनों वाहन, जैमर यूनिट, एम्बुलेंस और क्विक रिस्पॉन्स टीम शामिल होती है. विशेषज्ञों के अनुसार बड़े राज्यों में एक मुख्यमंत्री की सुरक्षा पर सालाना ₹15 करोड़ से ₹50 करोड़ तक खर्च हो सकता है. चुनाव, दंगे, आतंकी अलर्ट या बड़े राजनीतिक आयोजनों के दौरान यह खर्च और बढ़ जाता है.
भारत में VIP सुरक्षा व्यवस्था पर होने वाला कुल खर्च हर साल हजारों करोड़ रुपये तक पहुंचता है. हालांकि राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों से सरकार इन खर्चों का पूरा ब्योरा सार्वजनिक नहीं करती, लेकिन बजट दस्तावेज और सुरक्षा ढांचे की झलक यह दिखाती है कि देश के शीर्ष संवैधानिक पदों की सुरक्षा पर सरकार लगातार भारी निवेश कर रही है.




